Tuesday, July 17, 2012

उत्तर वनवास का दूसरा संस्करण


मित्रो, एक छोटी-सी सूचना साझा करना चाहता हूं। अभी थोड़ी देर पहले मेरे मित्र, प्रकाशक देश निर्मोही का फोन आया कि उत्तर वनवास का दूसरा संस्करण प्रकाशित हो गया है। उत्तर वनवास का पहला संस्करण 6 फरवरी 2010 को पुस्तक मेले में लोकार्पित हुआ था। महज ढाई वर्ष में दूसरा संस्करण आ जाना निश्चित ही मेरे लिए खुशी की बात है। यह सब आप मित्रों और पाठकों के स्नेह से ही संभव हुआ है। हर पीढ़ी के रचनाकारों ने इसे जिस तरह अहमियत दी है, उससे मन कृतज्ञता से भरा हुआ है।
 इस अवसर पर, गत दो वर्षों में विभिन्न स्थानों पर प्रकाशित
-प्ररसारित कुछ टिप्पणियों से कुछ वाक्य साझा कर सबके प्रति आभार व्यक्त करना चाहता हूं।


नामवर सिंह ( पब्लिक एजेंडा )
मैं एक सांस में इस उपन्यास को पढ़ गया। लगभग डेढ़ सौ पृष्ठों का यह उपन्यास इतना बांधे हुए था। बार-बार श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी की याद आ रही थी। उपन्यास में व्यंग्य का सटीक प्रयोग हुआ है। कोई वाक्य ऐसा नहीं है, जिस पर अवध की विशिष्ट संस्कृति की छाप न हो। और सबसे खास पक्ष है इसका विन्यास। विषय-वस्तु का विस्तार आपातकाल से लेकर रामजन्मभूमि विवाद और आज की राजनीति तक है। ...उत्तर वनवास' इस दौर में लिखे गए उपन्यासों में नए ढांचे, नई कथादृष्टि वाली एक उल्लेखनीय कृति है।

राजेंद्र यादव ( लोकार्पण वक्तव्य )
यह उपन्यास एक पत्रकार और कवि का लिखा हुआ है। इनकी भाषा में जहां पत्रकारिता की चुटकी है, विवरण हैं, वहीं कविता का स्पर्श भी जगह-जगह मिलता है। जिस तैयारी से अरुण आदित्य आए हैं, मेरा ख्याल है कि दुनिया के बहुत बड़े बड़े उपन्यासकार चाहे वे हैमिंग्वे हों, चाहे सामरसेट मॉम हों, सारे लोग पत्रकार ही थे, मैं समझता हूं कि यह उनके लिए संभावनाओं का एक नया क्षेत्र है।

संजीव ( अन्यथा )
अरुण ने कहानी से नहीं, कविता से उपन्यास में पदार्पण किया है, लेकिन भाषा की विरल व्यंजनाओं को जिस तरह साधा है, जिस तरह फ्लैश  बैक, स्वप्न, डायरी, कविता, बिम्बों और फंतासियों का बहुविध प्रयोग किया है, वह उनके अन्दर छुपी संभावनाओं को दर्शाता  है। अलबत्ता अरुण भी सायास शैल्पिक और भाषिक  रचाव के मोह से मुक्त नहीं हैं। धनात्मक पक्ष इसकी ताकत बनता है और ऋणात्मक पक्ष उनके फैलावों के हाथ बांधे रखता है।

मदन कश्यप ( बया )
अरूण आदित्य के पास बहुत ही ताक़तवर भाषा है। वे एक नई तरह की कथा भाषा अर्जित करते हैं, जिसमें मानस की चौपाइयों के साथ-साथ अन्य कविताओं का भी सटीक प्रयोग है,लेकिन वह इस हद तक काव्यात्मक नहीं है जो कथाप्रवाह में व्यवधान पैदा करे। पूर्ववर्ती कवि-कथाकारों की तरह वे भी बड़ी सजगता से अपनी कथाभाषा को काव्य भाषा से अलग करते हैं और उसकी शर्तों पर ही कलात्मक उत्कर्ष देने का प्रयत्न करते हैं। यहां ऐसा कथारस है जो नई पीढ़ी के कथाकारों में दुर्लभ है। यह सिफ काशीनाथ सिंह में मिलता है और उसका विस्तार स्वयं प्रकाश, संजीव, उदय प्रकाश और अखिलेश जैसे कथाकारों में दिखाई देता है।

रजनी गुप्त ( कथाक्रम )
उपन्यास के पन्ने पन्ने पर बिखरा पड़ा है- भाषिक सौन्दर्य और यही उपन्यास की सबसे बड़ी खूबी है। शब्दों का जादुई इस्तेमाल करने की कला में माहिर कथाकार कहीं फंतासी के जरिए तो कहीं कल्पनालोक का नये ढंग से प्रयोग करते हुए जीवंतता को सृजित करता है।

हरे प्रकाश उपाध्याय (हिंदुस्तान)
इसमें भारतीय राजनीति में आपातकाल से लेकर सांप्रदायिक उफान तक की उथल-पुथल को रेखांकित किया गया है। चूंकि वे कवि और पत्रकार दोनो  हैं, इसलिए इसमें भाषिक स्तर पर कहीं-कहीं कविता का ठाठ और कंटेट के स्तर पर पत्रकारीय एप्रोच दिखाई पड़ता है। कहीं पत्रकारीय हड़बड़ी तो कहीं कवि की मौज इस उपन्यास में शुरू से अंत तक मौजूद है।

उत्तर वनवास के दूसरे संस्करण की बधाई के बड़े हकदार इसके प्रकाशक देश निर्मोही हैं। उन्हें बधाई देना चाहें तो उन्हें aadhar_prakashan@yahoo.com  पर मेल कर सकते हैं।

Friday, May 25, 2012

स्मृतिशेष भगवत रावत


दुनिया का सबसे कठिन काम है जीना
और उससे भी कठिन उसे, शब्द के
अर्थ की तरह
रच कर दिखा पाना

 -भगवत रावत
 जीवन को शब्द के अर्थ की तरह रच कर दिखाने वाले, हम सब के प्यारे कवि भगवत रावत नहीं रहे । आज २५ मई २०२१२ को उन्होंने भोपाल में अंतिम सांस ली। उनपर लमही पत्रिका ने एक महत्वपूर्ण विशेषांक निकाला था। जिसमें मेरा भी एक आलेख है। इस समय कुछ नया लिखने की मनःस्थिति नहीं बन रही है, इसलिए उन्हें श्रद्धांजलिस्वरूप उसे ही साझा कर रहा हूं। इस आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।


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Friday, January 20, 2012

ऐसी एक कविता



जिसे टेडी बियर की तरह उछाल-उछाल
खेल सके एक बच्चा
जिसे बच्चे की किलकारी समझ
हुलस उठे एक मां

जो प्रतीक्षालय की किसी पुरानी काठ-बेंच की तरह
इतनी खुरदरी हो, इतनी धूलभरी
कि उसे गमछे से पोछ नि:संकोच
दो घड़ी पीठ टिका सके कोई लस्त बूढ़ा पथिक

जो रणक्षेत्र में घायल सैनिक को याद आए
मां के दुलार या प्रेयसी के प्यार की तरह
जो योद्धा की तलवार की तरह हो धारदार
जो धार पर रखी हुई गर्दन की तरह हो
खून से सनी, फिर भी तनी
पता नहीं कब लिख सकूंगा ऐसी एक कविता
आज तक तो नहीं बनी।

- अरुण आदित्य

शुक्रवार की साहित्य वार्षिकी से साभार

Tuesday, August 30, 2011

एन जी ओ का पइसा बोला




मैं भी अन्ना

गलियां बोलीं, मैं भी अन्ना, कूचा बोला, मैं भी अन्ना!

सचमुच देश समूचा बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना!


भ्रष्ट तंत्र का मारा बोला, महंगाई से हारा बोला!
बेबस और बेचारा बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना!

जोश बोला मैं भी अन्ना, होश बोला मैं भी अन्ना!

युवा शक्ति का रोष बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना!


साधु बोला मैं भी अन्ना, योगी बोला मैं भी अन्ना!
रोगी बोला, भोगी बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना!


गायक बोला, मैं भी अन्ना, नायक बोला, मैं भी अन्ना!
दंगों का खलनायक बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना!

कर्मनिष्ठ कर्मचारी बोला, लेखपाल पटवारी बोला!

घूसखोर अधिकारी बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना!


मुंबई बोली मैं भी अन्ना, दिल्ली बोली मैं भी अन्ना!
नौ सौ चूहे खाने वाली, बिल्ली बोली, मैं भी अन्ना!

डमरू बजा मदारी बोला, नेता खद्दरधारी बोला!

जमाखोर व्यापारी बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना!


हइया बोला मैं भी अन्ना, हइशा बोला मैं भी अन्ना!
एन जी ओ का पइसा बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना!

दायां बोला, मैं भी अन्ना, बायां बोला, मैं भी अन्ना!

खाया, पिया, अघाया बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना!

निर्धन जन की तंगी बोली, जनता भूखी नंगी बोली
हीरोइन अधनंगी बोली, मैं भी अन्ना ,
मैं भी अन्ना!

नफरत बोली मैं भी अन्ना, प्यार बोला मैं भी अन्ना!
हंसकर भ्रष्टाचार बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना!


- अरुण आदित्य
( साभार : अमर उजाला, २८ अगस्त २०११)

Thursday, May 26, 2011

मदन कश्यप : ऐसा बहुत कम होता है मेरे साथ


धर्म और सांप्रदायिकता के बीच नए रामचंद्र की कथा

मदन कश्यप
चर्चित कवि, पत्रकार और संस्कृतिकर्मी

उपन्यास को खत्म करने के बाद मुंह से बस एक शब्द निकला-अद्भुत! ऐसा बहुत कम होता है मेरे साथ। वैसे भी मैं कथा साहित्य का अच्छा पाठक नहीं हूं। मेरे अध्ययन औररुचि के क्षेत्र दूसरे हैं कविता, विचार, इतिहास और समाज विज्ञान के अलावा थोड़ा-बहुत राजनीति। मैं कथा में भी इन्हीं चीजों को ढूंढ़ता हूं और अक्सर निराशा हाथ लगती है। इस दृष्टि से हिंदी की तुलना में कुछ अन्य भारतीय भाषाओं के उपन्यास मुझे ज्यादा आश्वस्त करते हैं। फिर भी 'उत्तर वनवास' पढ़ा क्योंकि एक गोष्ठी में इस पर कुछ बोलना था और उसके लिए पढऩा जरूरी था। शुरुआत एक आशंका के साथ की इसलिए कि अरुण आदित्य को मैं अब तक केवल एक कवि के रूप में ही जानता था। कविता के अलावा उनकी कुछ समीक्षाएं भी पढ़ रखीं थी और उनकी समझ और विश्लेषण का कायल था। वे पेशे से पत्रकार हैं तो इस नाते सामाजिक मुद्दों पर लिखीं उनकी कुछ टिप्पणियां भी पढ़ी थीं। लेकिन यह उपन्यास है और इसके पहले अरुण की कहानी भी नहीं पढ़ी थी कि उसके आधार पर कोई धारणा बनाता। जहां तक मुझे मालूम है उन्होंने अब तक कोई कहानी लिखी भी नहीं है। सृजनात्मक गद्य की यह पहली किताब है उनकी। फिर भी एक बार जब शुरू कर दिया तो अंत करके ही छोड़ा। ऐसा कथारस है जो नई पीढ़ी के कथाकारों में दुर्लभ है। यह सिफ काशीनाथ सिंह में मिलता है और उसका विस्तार स्वयं प्रकाश, संजीव, उदय प्रकाश और अखिलेश जैसे कथाकारों में दिखाई देता है। नई पीढ़ी का कथा लेखन एक अंधी-सुरंग में फंसा हुआ दिखाई दे रहा है।
दरअसल नए लेखकों के पास विचार तो हैं, मगर प्रतिबद्घता की कमी के कारण दृष्टि बहुत साफ नहीं है। कुछ नए अनुभव हैं लेकिन व्यापक जीवन अनुभव और इतिहास के प्रवाह के बीच उन्हें व्यवस्थित करने की कुशलता अभी नहीं आई है। इतिहास दृष्टि ,विश्वदृष्टि, और वर्ग चेतना के स्तर पर भी कुछ धुंध है। ऐसे में वे कथ्य को अधिक-से-अधिक काव्यात्मक बनाने की कोशिश करते हैं, जिससे कथारस का लोप हो जाता है और कहानी (उपन्यास भी) प्राय: अपठनीय हो जाती है। ऐसे कठिन दौर में इधर अनामिका के उपन्यास दस द्वारे का पींजरा और अरुण आदित्य के 'उत्तर वनवास' को पढ़कर ऐसा लगा कि सुरंग तो है, मगर अंधी सुरंग नहीं। उससे पार निकलना केवल संभव है बल्कि उसके पार उजास की एक दुनिया भी है जिसकी झलक दिख रही है। ऐसी कुछ कहानियाँ भी हैं, लेकिन कहानियों और कहानीकारों की चर्चा अभी उचित नहीं है।
मैं इस लंबी वक्तव्युनमा टिप्पणी के लिए माफी चाहता हूं मगर इसके बगैऱ 'उत्तर वनवास' पर कुछ लिखना मेरे लिए संभव नहीं था।... यह कवि पत्रकार-कवि अरुण आदित्य की पहली कथा कृति है, मगर इसमें वह कच्चापन नहीं है जो प्राय: किसी पहली कृति में होता है। नयापन जरूर है। कविता की भाषा आलोचना की विश्लेषण क्षमता और पत्रकारिता के समय-समाज को देखने के नजरिए का जैसा संतुलित और सृजनात्मक उपयोग कथाकार ने किया है, वह दुर्लभ है। उपन्यास की कथावस्तु अत्यंत परिचित और इसीलिए सामान्य है। मध्य उत्तर प्रदेश का एक गांव जहां जाने के लिए नदी पर पुल तक नहीं था। आज़ादी के बाद भी सामंती व्यवस्था कायम थी और शक्तिशाली ब्राह्मणों और राजपूतों के दो पाटों के बीच गाँव के पिछड़े-दलित पिस रहे थे। ऊंची जातियों के गरीबों की भी अपनी व्यथा-कथा थी। ज़ुल्मियों की संख्या कम ही थी, मगर जुल्म का फैलाव बहुत ही व्यापक और गहरा था। इसी बीच, गाँव-गाँव में रामजन्मभूमि विवाद के माध्यम से सांप्रदायिकता का प्रवेश होता है। फिर बाबरी मस्जिद के विध्वंश के बाद सांप्रदायिकता का जो सैलाब आता है उसमें नए मानवीय मूल्य ही नहीं, धार्मिक और नैतिक मूल्य भी डूब जाते हैं। उपन्यास का अंत नंदीग्राम जाने की ओर इशारा करते हुए होता है।
इस प्रकार, हम देखते हैं कि बाबरी मस्जिद विध्वंश से लेकर नंदीग्राम मार्च तक के लंबे कालखंड की राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल को १६० पृष्ठों में समेटने का उपक्रम किया गया है। ऐसे में इस कृति के एक पत्रकारीय रपट बन जाने का ख़तरा था। जैसा कि पत्रकारों के कथा-लेखन केसाथ अक्सर होता भी है। मगर अरुण ने कथानायक रामचंद्र के चरित्र को कुछ इस रूप में विकसित किया है कि उसके पलुहने केसाथ-साथ कथावस्तु का भी अपरिचयकरण होता चलता है और यह चिरपरिचित कथा एक महत्वपूर्ण कृति बन जाती है। रामचंद्र का चरित्र निरूपण अद्भुत है। कभी-कभी वह मेटाफर या रूपक लगता है, कथा में ऐसे संकेत मिलते हैं, मगर उसका चरित्र इतना जीवंत, रोचक और ग्रामीण जीवन की विसंगतियों और जटिलताओं से इस तरह आबद्घ है कि रूपक से ज्यादा उसका वजूद प्रभावित करने लगता है।
सवर्णों के सबसे गरीब परिवार में पैदा हुआ रामचंद्र सबसे पहले तो इस बात के लिए पिट जाता है कि पाँचवी की परीक्षा में वह अव्वल आता है और गाँव के जमींदार का,जो लोकतंत्र का मुखिया है,बेटा कुँवर साहब दूसरे स्थान पर खिसक जाता है। यहीं से रामचंद्र का नैतिक और सामाजिक संघर्ष शुरू होता। अंतत: कुंवर के कारण ही उसे गाँव छोडऩा पड़ता है। शहर में वह एक मठ में शरण लेता है, वहाँ अपने रामायण ज्ञान और कथावाचन की प्रभावी शैली केचलते केवल गुरू जी का प्रिय शिष्य बन जाता है, बल्कि सत्ता की ओर अग्रसर सांप्रदायिक दल में भी शामिल हो जाता है। वह प्रखर प्रवक्ता है और बड़ी संख्या में लोगों को आकर्षित कर लेता है जिसके चलते उसे पार्टी का काफी ऊँचा पद मिल जाता है। रामचंद्र रामायणी के रूप में उसकी कीर्ति फैल जाती है।
लेकिन रामचंद्र रामायणी जब नैतिक और धार्मिक आधार पर सांप्रदायिकता की राजनीति का विरोध करते हैं तो पार्टी में उन्हें अपमानित होना पड़ता है। उन्हें दुख इस बात से होता है कि गुरू जी उनका बचाव नहीं करते। इस तरह,उपन्यासकार ने धर्म के सामाजिक उपयोग और राजनीतिक इस्तेमाल के बीच की टकराहट को अच्छी तरह रखा है और सांप्रदायिकता की राजनीति की पोल खोली है।
इस उपन्यास की विशेषता यह है कि इसमें कथानक रामचंद्र रामायणी के चरित्र के विकास को सरल रेखीय ढ़ंग से नहीं प्रस्तुत किया गया है बल्कि छोटी-छोटी रोचक घटनाओं के माध्यम से उसे निरूपित किया गया है। ये घटनाएँ अपनी रोचकता के कारण नहीं, उस जीवन दृष्टि के कारण प्रभावित करतीं है जिसे वे निर्मित कर रही होती हैं। रामचरित मानस की चौपाइयों का ऐसा सृजनात्मक प्रयोग ता हिंदी की किसी आधुनिक कथाकृति में देखने को नहीं मिला। मार्मिकता, क्रूरता और विसंगति को उभारने के लिए इनकी प्रासंगिकता नए सिरे से रेखांकित होती है। रामचंद्र के जीवन में एक छोटा-सा प्रसंग प्रेम का भी आया था जब प्रयाग में कथा बाँचते हुए उनकी नजर एक युवती से मिली थी। वहाँ वाटिका प्रसंग लाकर लेखक ने उसे एक गहराई दी है। लेकिन नयनों से नयनों का वह संभाषण आगे नहीं बढ़ पाया और रामचंद्र के कलेजे में एक हूक बन कर अटक गया।
रामचंद्र के मित्र थे वामपंथी कवि सत्यबोध। तीखी वैचारिक बहसों के बावजूद दोनों एक दूसरे की ईमानदारी और निष्ठा का आदर करते थे। आखिऱी बार सबकुछ का त्याग करके रामचंद्र जब अपने गुरूदेव का आश्रम छोड़ कर निकलते हैं तो उन्हें सत्यबोध मिल जाते हैं और वे स्वप्न की तलाश में सत्यबोध के पीछे चल पड़ते हैं। यह सच्चाई नहीं, बल्कि लेखक का सपना है मगर कथा के अंत में इतने विश्वसनीय ढंग से आया है कि कहीं से भी रूमानी अंत जैसा नहीं लगता। सपने में सच जैसी विश्वसनीयता पैदा करना कला की सबसे बड़ी सफलता होती है,जो बहुत कम कृतियों को मिल पाती है।
अरूण आदित्य के पास बहुत ही ताक़तवर भाषा है। वे एक नई तरह की कथा भाषा अर्जित करते हैं, जिसमें मानस की चौपाइयों के साथ-साथ अन्य कविताओं का भी सटीक प्रयोग है,लेकिन वह इस हद तक काव्यात्मक नहीं है जो कथाप्रवाह में व्यवधान पैदा करे। पूर्ववर्ती कवि-कथाकारों की तरह वे भी बड़ी सजगता से अपनी कथाभाषा को काव्य भाषा से अलग करते हैं और उसकी शर्तों पर ही कलात्मक उत्कर्ष देने का प्रयत्न करते हैं। इसके चलते उन्हें केवल इस उपन्यास में ही सफलता नहीं मिली है, बल्कि इसके माध्यम से उन्होंने एक नई उम्मीद भी जगाई है। आवरणिका पर वरिष्ठ कथाकार संजीव ने ठीक लिखा है कि नई पीढ़ी के सामने उपन्यास लेखन को लेकर जो ढेर सारी चुनौतियाँ थीं,उनका जबाव लेकर आया है अरूण आदित्य का यह उपन्यास।
(साहित्यिक पत्रिका बया के जनवरी-मार्च 2011 अंक में प्रकाशित)
........................

उपन्यास : उत्तर वनवास
प्रकाशक : आधार प्रकाशन, एससीएफ- 267
सेक्टर-16, पंचकूला-134113 (हरियाणा)
मोबाईल - 09417267004
मूल्य : 200 रुपए

Friday, February 25, 2011

कविता के कुछ पते

मेरी कविता के कुछ पतेः  दो  कवितायें अनुनाद पर ।  चार  कवितायें समय संकल्प पर। पांच कविताएं समालोचलन  पर। कुछ और कवितायें सुनहरी कलम  पर पढ़ सकते हैं।

Tuesday, February 8, 2011

भगवत रावत का देश राग




जिस देश में भगवत रहते हैं...

अरुण आदित्य

गहिरी नदी अगम बहै धरवा, खेवन-हार के पडिग़ा फन्दा।
घर की वस्तु नजर नहि आवत,
दियना बारिके ढूँढ़त अन्धा

कबीर की इन पंक्तियों से इस लेख की शुरुआत होने ही जा रही थी कि अचानक ब्रेख्त की कुछ काव्य-पंक्तियां मन में कौंध उठीं। और एक द्वंद्व छिड़ गया कि कबीर से शुरू करूं या ब्रेख्त से? और मेरे द्वंद्व का आनंद लेते हुए कबीर और ब्रेख्त की सतरें ठेठ लखनवी अंदाज में 'पहले आप-पहले आप' करने लगीं। पर अंतत: दोनों को इस बात का एहसास हो गया कि उनमें से किसी का भी ठिकाना लखनऊ में नहीं है, इसलिए 'पहले आप' के लखनवी लटके का कोई मतलब नहीं है; और इस बात पर सहमति हो गई कि इस भगवत-चर्चा का शुभारंभ कबीर के साथ और समाहार ब्रेख्त की कविता के साथ होगा। अब जब कबीर की इन पंक्तियों से लेख शुरू हो ही चुका है, तो आइए इसके पक्ष में कुछ तर्क भी देख लिए जाएं। मसलन भगवत रावत का कविता-समय भी ठीक वैसा ही है, जिसमें देश (राष्ट्र नहीं) गहरी नदी की अगम धार में फंसा हुआ है, और खेवनहार फंदों में कसे हुए हैं। यह ठीक वही देश-काल तो है जिसमें अंधा समाज दीये की रोशनी में चीजों को ढूंढऩे का उपक्रम कर रहा है। और कबीर की तरह ही भगवत रावत की कविता भी कभी चीख-चीखकर और कभी कान में फुसफुसा कर यही कहना चाहती है कि भैया इस अंधेरे समय में तुम्हें दीये से पहले दृष्टि की जरूरत है। खुली आंखें चाहिए जिनसे आसपास का अंधेरा ही नहीं, भविष्य के स्वप्न भी देखे जा सकें।
भगवत रावत का नया कविता -संग्रह 'देश एक राग है' पढ़ते हुए यह बात एक बार फिर साफ हो जाती है कि उनकी कविता प्रेक्षाभाव-मात्र की कविता नहीं है। हालांकि अपने अनेक समकालीनों और परवर्ती कवियों की तरह भगवत भी एक कुशल प्रेक्षक की तरह सूक्ष्म-विवरणों तक जाते हैं, परंतु विवरणों में विचरते हुए वे सभ्यता-समीक्षा के अपने मूल कर्म को नहीं भूलते। यही वजह है कि उनकी कविता एक ऐसे प्रिज्म की तरह है, जो एक रंग का दिखने वाले प्रकाश के सातों रंगों को खोलकर प्रत्यक्ष कर देती है। वहां शुरुआत में प्रेम का बैंगनी रंग है तो अंतिम छोर पर क्रांति का लाल रंग भी है। और इन्हीं के बीच उदासी का पीला और सपनों का आसमानी रंग भी है। उनकी काव्य-दृष्टि ढलते हुए सूरज में भी उम्मीद का बिंब तलाश लेती है-
चुपचाप शांति से देखो यह दृश्य
वह निस्तेज नहीं हो रहा

ढल रहा है
किसी और जगह की सुबह के लिए
(सूरज ढल रहा है, पृष्ठ 38 ,पेपर बैक संस्करण)
इतने अंधेरे समय में उम्मीद की यह आश्वस्ति कहां से आती है? जाहिर है कि इस उम्मीद का उत्स वही ढाई अक्षर हैं, तमाम पोथियों के बजाय जिन्हें पढ़कर आदमी बकौल कबीर पंडित हो जाता है। जी हां, यह प्रेम की ही ताकत है-
तुम हो तो है इस तरह एक और सुबह पाने की उम्मीद की नींद।
(तुम हो तो , पृष्ठ 39 पेपर बैक संस्करण)

भगवत रावत की एक कविता है 'डायरी' जिसकी अंतिम पंक्तियां हैं- सच पूछो तो कवि की कविताएं ही होती हैं उसकी असली डायरी। दूसरे कवियों के बारे में यह कितना सच है, नहीं कहा जा सकता, लेकिन भगवत की अपनी कविता वास्तव में एक डायरी ही है, जिसमें उन्होंने अपने मन और जीवन को शब्द-दर-शब्द दर्ज किया है। हालांकि यह कवि की निजी डायरी है, लेकिन इसमें दर्ज सपने, आकांक्षाएं, कमजोरियां, हंसी, आंसू, प्रेम, नफरत आदि सिर्फ उनके ही नहीं, बल्कि इस देश की उस आम आबादी के हैं, जिसे भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से प्यारे देशवासियो कह कर संबोधित करते हैं।
इस संग्रह को पढ़ते हुए यह विश्वास एक बार फिर दृढ़ होता है कि भगवत रावत की कविता एक बेहतर दुनिया का ब्लू प्रिंट है। इस ब्लू प्रिंट में उन छोटे-छोटे लोगों के छोटे-छोटे सपनों के लिए भी पर्याप्त जगह मुकर्रर है जो इस पृथ्वी को अपनी पीठ पर कच्छपों की तरह धारण किए हुए हैं और जिन्हें रत्ती भर भी अंदेशा नहीं है कि उन्हीं की पीठ पर टिकी हुई है यह पृथ्वी। पूंजीवाद के साथ कदमताल करते साम्राज्यवाद के बूटों तले रौंदी जा रही मानवता की पुकार इस संग्रह की अनेक कविताओं में सुनी जा सकती है। इस कविता के एक छोर पर संवेदना है तो दूसरे छोर पर अदम्य युयुत्सा भी है। दरअसल कवि की ज्ञानात्मक संवेदना ही इस कविता को युयुत्सु बनाती है। प्रतिपक्ष में चाहे भूमंडलीकरण के नाम पर खेल रहा खलमंडल हो, या धर्म के नाम पर अधर्म का तेजाब बांटता कमंडल, भगवत रावत चुनौती को चुनौती की भाषा में ही प्रस्तुत करते हैं, बुझौती की भाषा में नहीं। खुलकर कहने में यकीन करते हैं और जहां जरूरी समझते हैं, नाम लेने से भी परहेज नहीं करते। जॉर्ज बुश से लेकर नरेंद्र मोदी तक को वे नाम लेकर ही पहचानते हैं। भगवत जानते हैं कि नाम लेने में खतरा है, पर वे यह भी जानते हैं कि खतरा उठाए बिना न मानवता बचाई जा सकती है और न ही कविता। खासकर ऐसे समय में जबकि मनुष्यता जैसे पद का भी अपहरण हो चुका है और उसी के नाम पर तमाम मनुष्यता विरोधी काम हो रहे हैं।
मनुष्यता को बचाने उन्होंने हिरोशिमा पर बम डाला मनुष्यता को बचाने उन्होंने वियतनाम उजाड़ डाला।
(उनकी मनुष्यता, पृष्ठ 29 पेपर बैक संस्करण)
जाहिर है कि जालिम-जुबानों से बार-बार दोहराए जाने के बाद मनुष्यता जैसे पद भी अपना अर्थ खोने लगते हैं। ऐसे में भगवत रावत जैसा सजग कवि शब्दों का नया अर्थ रचने की चुनौती को कैसे अस्वीकार कर सकता है। उसे पता है कि यह चुनौती कठिन है, पर इसके बिना बचाव नहीं है-
दुनिया का सबसे कठिन काम है जीना
और उससे भी कठिन उसे, शब्द के
अर्थ की तरह
रच कर दिखा पाना

जो रचता है वह मारा नहीं जा सकता

(वह मारा नहीं जा सकता, पृष्ठ 69 पेपर बैक संस्करण)
संग्रह की शीर्षक कविता देश एक राग है एक ऐसी सिंफनी है जिसमें वादी, संवादी और विवादी सुर आपस में उलझे हुए हैं। इनकी उलझन देखकर ही यह समझा जा सकता है कि देश-राग और राष्ट्र-राग में अलग-अलग सुर क्यों लगते हैं और राष्ट्रवादी हुए बिना भी देशभक्त कैसे हुआ जा सकता है।
आज भी बड़े शहरों से मेहनत मजदूरी करके
जब
अपने-अपने घर-गांव लौटते हैं लोग
तो एक दूसरे से
यही कहते हैं
कि वे अपने देस जा रहे हैं

वे अपने पशुओं-पक्षियों, खेतों-खलिहानों
नदियों-तालाबों,
कुओं-बावडिय़ों, पहाड़ों-जंगलों
मैदानों-रेगिस्तानों
बोली-बानियों, पहनावों-पोशाकों, कान-पान
रीति-रिवाज
और नाच-गानों से इतना प्यार करते हैं
कि कुछ न होते हुए गांठ में
भागे चले जाते हैं हजारों मील ट्रेन में सफर करते
बीड़ी फूंकते हुए वे सच्चे देशभक्त हैं वे नहीं जानते राष्ट्रभक्त कैसे हुआ जाता है।
(देश एक राग है: पृष्ठ 11 पेपर बैक संस्करण)
भगवत जानते हैं कि राष्ट्रवाद आगे बढ़ता है तो साम्राज्यवाद की सीमा को छूने लगता है और पीछे हटता है तो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की गोद में चैन तलाशता है। जबकि देश-प्रेम अपने जल-जंगल-जमीन, पशु-पक्षी-पर्यावरण के नजदीक ले जाता है। इस एक कविता को पढ़कर भगवत रावत की राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक समझ, उनके तंज और रंज, शब्दों के खेल और शिल्प की सुघड़ता, सब की एक सुंदर बानगी मिल जाती है।
दिल्ली को केंद्र में रखकर लिखी गई लंबी कविता का शीर्षक 'कहते हैं कि दिल्ली की है कुछ आबो-हवा और' सुनकर मिर्जा गालिब की बहुचर्चित पंक्ति 'कहते हैं कि गालिब का है अंदाजे बयां और' की याद आती है। यह कविता गालिब से क्षमा याचना के साथ ही शुरू होती है। लेकिन इस कविता में जो दिल्ली है, वह गालिब की दिल्ली नहीं है। वह अमीर खुसरो, निजामुद्दीन औलिया की दिल्ली भी नहीं है। यह दिल्ली फकत एक शहर नहीं एक सर्वग्राही सत्ता का रूपक है। जिसकी ठसक दिल्ली से बाहर वालों के लिए एक कसक है। यह कविता विभिन्न कोणों से दिल्ली का एक्स-रे चित्र खींचती है। और यह बता देती है कि मुहावरे में भले ही हो, वास्तविकता में दिल्ली देश का दिल नहीं है-
दिल्ली को केंद्र मानकर कैसे भी नाप-जोखकर खींचा जाए कोई वृत्त उसमें समाएगा नहीं पूरा देश या तो वह छोटा पड़ जाएगा या दूसरे देशों की सीमाओं में चला जाएगा।
(कहते हैं कि दिल्ली की है कुछ ... पृष्ठ 117 पेपर बैक संस्करण)
अपने देश-राग का रंग जमाने के लिए भगवत पुरखों की संगत भी बिठा लेते हैं। अब देखिए न, उन्होंने अपनी एक कविता का शीर्षक ही चचा गालिब की एक काव्य-पंक्ति को बना दिया- नींद क्यों रात भर नहीं आती। और गालिब के इस सवाल का जवाब ढूंढ़ते हुए भगवत रावत दुखिया दास कबीर के पास पहुंच जाते हैं।
नींद का न आना जागते रहना ही नहीं होता वह तो अकेला दुखिया दास कबीर था जो सारी-सारी रात जागता था और रोता था मैं तो सचमुच आजादी की नींद सोना चाहता था
आजादी की नींद और आजादी के स्वप्न की तलाश में भगवत रावत सिर्फ गालिब और कबीर ही नहीं, विजय तेंदुलकर, मेधा पाटकर, मुक्तिबोध तक को याद करते हैं। यही नहीं, सात समंदर पार के कवि टी एस इलियट तक के पास जाते हैं और उनकी कविता के एक पात्र जे. अल्फ्रेड प्रूफ्रॉक को उसके देश-काल से अपने देश-काल में खींच लाते हैं। 'जे. अल्फ्रेड प्रूफ्रॉक से एक बातचीत' शीर्षक कविता में भगवत रावत अत्यंत सहज तरीके से यह बता देते हैं कि इलियट ने पाश्चात्य सभ्यता की जिन पतनशील प्रवृत्तियों की ओर इशारा किया था, वे हमारी 'महान भारतीय संस्कृति' में किस कदर घुस आई हैं।

और अंत में ब्रेख्त
जैसा कि शुरू में ही करार हो चुका है कि इस लेख का समाहार ब्रेख्त की काव्य पंक्तियों के साथ होगा। तो सुधी पाठक गण! प्रस्तुत हैं वे पंक्तियां जिन्हें आप अनेक बार पढ़ चुके होंगे, पर इस बार पढऩे के लिए नहीं, लडऩे के लिए पढ़ें-
क्या अंधेरे वक्त में भी गीत गाए जाएंगे हां, अंधेरे के बारे में भी गीत गाए जाएंगे।
मेरे कबीर की तरह क्या आप को भी लग रहा है कि इस लेख की शुरुआत इन्हीं पंक्तियों के साथ होनी चाहिए थी?

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लखनऊ से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका लमही ने भगवत रावत पर एक महत्वपूर्ण अंक प्रकाशित किया हैप्रस्तुत टिप्पणी उसी अंक से
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देश एक राग है (कविता संग्रह), कवि : भगवत रावत, प्रकाशक : परिकल्पना प्रकाशन , डी-68, निराला नगर, लखनऊ-226020, मूल्य : 150 रुपए (सजिल्द), 80 रुपए (पेपर बैक)

Friday, December 24, 2010

पढ़िए उदय प्रकाश का मन



कवि-कथाकार उदय प्रकाश से यह बातचीत गत वर्ष जून में रेकार्ड की गई थी। उन्हें मिले सार्क सम्मान के बहाने हरियाणा साहित्य अकादमी की पत्रिका हरिगंधा के लिए यह बातचीत की गई थी। हरिगंधा का उपरोक्त अंक छप कर आने तक गोरखपुर का वह बहुचर्चित विवाद शुरू हो गया था, जो कई महीनों तक हिंदी साहित्य जगत में छाया रहा। उस दुखद प्रसंग के बाद हाल ही में साहित्य अकादमी पुरस्कार का सुखद संदर्भ भी जुड़ गया है। इन तमाम संदर्भों के साये में इस बातचीत से शायद कोई नया पाठ खुलकर सामने आए...

अच्छी रचना बहुत धीमी आवाज में बोलती है

उदय प्रकाश से अरुण आदित्य की बातचीत


पाठकों की कमी के इस संकटपूर्ण दौर में भी उदय प्रकाश एक ऐसे कहानीकार हैं, पाठक जिनकी रचनाओं का इंतजार करते हैं। पर कहानीकार से भी पहले वे एक बड़े कवि हैं। और कवि से भी पहले संवेदनशील मनुष्य हैं। उनकी संवेदना मनुष्यमात्र के प्रति ही नहीं घास, फूल, ओस और तितली के प्रति भी है। 'तिरिछ', 'पाल गोमरा का स्कूटर', 'और अंत में प्रार्थना', 'वारेन हेस्टिंग्स का सांड', 'पीली छतरी वाली लड़की', 'मोहनदास' जैसी चर्चित कथाकृतियों के अलावा उनके चार कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। 'सुनो कारीगर', 'अबूतर-कबूतर' और 'रात में हारमोनियम' के बाद उनका चौथा कविता संग्रह 'एक भाषा हुआ करती है', हाल ही में आया है। वे बहुपठित, बहुअनुवादित और बहुप्रशंसित लेखक हैं। और बहुविवादित भी। मोहनदास सहित उनकी कई कृतियों पर फिल्में भी बनी हैं। उन्होंने खुद भी कई महत्वपूर्ण डाक्यूमेंटरी फिल्में बनाई हैं। उदय प्रकाश को पाठकों ने जितना प्यार दिया है, हिंदी के साहित्यिक समाज से उन्हें उतनी ही शिकायत है। इसी प्यार और शिकायतों के बीच ही आप उस उदय प्रकाश को खोज सकते हैं, जो कलम का मजदूर तो है, मगर जिसकी कलम मजबूर नहीं है। जो सीतापुर से वैशाली तक अपने स्वाभिमान की गठरी में किसी को हाथ नहीं लगाने देता, बदले में कितना ही नुकसान क्यों न उठाना पड़े। पिछले साल जब उन्हें सार्क साहित्यकार सम्मान मिला तो इसी बहाने हरियाणा साहित्य अकादमी की पत्रिका हरिगंधा के (तत्कालीन ) संपादक देश निर्मोही ने उन पर एक विशेष खंड प्रकाशित करने की योजना बनाई। हमने उदय जी से पूछा, 'हरिगंधा के लिए एक बातचीत करनी है, किस समय आना ठीक रहेगा?' उदय जी अपनी चिरपरिचित हंसी हंस पड़े और हंसते हुए ही कहा, 'फ्रीलांसिंग करके घर चलाने में बहुत समय इधर-उधर भटकना पड़ता है, लेकिन इतना भी व्यस्त नहीं रहता हूं कि मित्रों को समय लेकर मिलना पड़े। जब मरजी हो चले आओ।' मैंने कहा, 'परसों सुबह आ जाता हूं।' और तीसरी सुबह हम वैशाली, गाजियाबाद स्थित उनके आवास पर मौजूद थे। उदय जी उसी उत्साह से मिले जैसे कि वे हर बार मिलते हैं। बात शुरू हुई तो बात से बात निकलती चली गई।

शुरुआत पुराने शहडोल और आज के अनूपपुर जिले के उस गांव से करते हैं, जहां उदय प्रकाश का जन्म हुआ। बचपन में कब आपको लगने लगा था कि कोई रचनाकार आपके भीतर कुलबुला रहा है? क्या आप सामान्य बच्चों से कुछ अलग थे?

कोई अद्वितीयता तो नहीं, लेकिन यह बात जरूर थी कि दूसरों से कुछ तो अलग था। जैसे, अकेलापन पहले भी अच्छा लगता था। और अपनी उम्र के बच्चों के बजाय बड़ी उम्र के बच्चों और बूढ़ों के साथ बातचीत में मैं ज्यादा सहज हो पाता था। जहां तक गांव की बात है, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा पर वह बहुत छोटा सा गांव है। नाम है सीतापुर। बहुत पिछड़ा इलाका है, जिसको सिंगल क्रॉप एरिया कहते हैं। एक फसली बलुहा जमीन है वहां। समृद्ध क्षेत्र नहीं है। 1972 में बिजली आई उस क्षेत्र में। उससे पहले हम लोगों की सारी पढ़ाई-लिखाई ढिबरी, लालटेन और कंदील की रोशनी में हुई। पुल नहीं बना था तो नदी में नाव और डोंगियां चलती थीं। जाहिर है कि बारिश में नदी भी पार करनी पड़ती थी। कई गांव थे जो बरसात में बिलकुल कट जाते थे। जंगल था। प्रकृति के बीच में रहना था। हमारे यहां बंदर थे, हिरन थे। तरह-तरह की चिडिय़ां, वन्य प्राणी सब बचपन के अनुभवों में शामिल थे। अब अगर मैं कहूं कि हमारे घर में शेर के बच्चे पले, या कहूं कि हाथी था हमारे घर पर, तो यह शहर के बच्चों को अटपटा लगेगा जो इन जानवरों को सिर्फ कॉमिक्स या किताबों में देख पाते हैं।
लिखने का सिलसिला ऐसे शुरू हुआ... जैसा कि मैं पहले भी बता चुका हूं, मेरी मां भोजपुर क्षेत्र की थीं। मिर्जापुर के पास विजयपुर नाम की जगह है। उस समय कम उम्र में शादी हो जाती थी। जब वे आईं तो अपने साथ एक कॉपी लाई थीं। उसमें मिर्जापुर और उस इलाके के गाने लिखे हुए थे। मां की हैंडराइटिंग बहुत सुंदर थी। वे छोटे-छोटे चित्र बनाती थीं। क्रोशिया, कढ़ाई-बुनाई का काम बड़ी कलात्मकता से करती थीं। वे गाती बहुत अच्छा थीं। वे अकसर गांव की स्त्रियों से घिरी रहती थीं। मां के आने के बाद गांव की स्त्रियों में बड़ा बदलाव आया। मैंने मां की उसी कॉपी को देखकर ही कविता लिखना शुरू की और चित्र बनाना भी उस कॉपी से ही सीखा। बहुत छोटी उम्र में मैं चित्र बनाने लगा था और कविता भी जब शुरू की तो छह सात साल का रहा होऊंगा। मेरी बहनों को मेरी तब की कविताएं याद हैं। पढऩे लिखने का संस्कार था घर में। पिताजी लगभग सारी पत्रिकाएं मंगाते थे। साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, कल्पना, बहुत सी पत्रिकाएं जो अब नहीं हैं.. अवंतिका, ज्योत्सना वगैरह। बच्चों की पत्रिकाएं भी आती थीं। पुरानी किताबें बहुत थीं। महाभारत वगैरह तो थी हीं, एक विचित्र किताब थी जिसके बारे में बताता हूं तो लोगों को ताज्जुब होता है। उसका नाम था 'करि कल्प लता'। वह हाथियों के बारे में थी। जैसे वात्स्यायन के काम-सूत्र में पद्मिनी, शंखिनी वगैरह के वर्गीकरण के आधार पर स्त्रियों के स्वभाव का वर्णन किया गया गया है, उसी तरह 'करि कल्प लता' में हाथियों के लक्षणों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां थीं। मुझे बहुत रोचक लगती थी वह किताब। मेरे गांव के पास से जब हाथियों के झुंड निकलते थे तो मैं उस किताब में दिए गए लक्षणों के आधार पर उनके स्वभाव का अंदाजा लगाता था। हाथी बड़ा मानवीय लगता था मुझे। हमारे घर का जो हाथी था, उसका नाम था भगवंता। सरगुजा और छत्तीसगढ़ का वह क्षेत्र जो आज नक्सलवाद और सल्वा जुडुम से प्रभावित है, वहां घने जंगल थे। आगे चलकर यह जंगली इलाका असम से जुड़ जाता था। यहां से वहां तक हाथियों का अभ्यारण्य था। सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी में जसपुर हाथियों का बहुत बड़ा ब्रीडिंग सेंटर था। जो लोग हाथियों को खरीदने जाते थे, उनके लिए ऐसा कोई शास्त्र या मैनुअल जरूरी था जिसके आधार पर वे अच्छे हाथी की पहचान कर सकें। अब वह किताब हमारे घर में नहीं है। मैं तो खैर बहुत बचपन में गांव से चला आया। जब मां की मृत्यु हुई मैं बारह साल का था और जब सोलह साल का था तो पिता की मृत्यु हो गई। दोनों की मृत्यु कैंसर से हुई। मां की मृत्यु के बाद ही मैंने घर छोड़ दिया था। तब से आप सब जानते है कितनी कठिनाइयों से मैंने जिंदगी जी है। बहुत संघर्ष करना पड़ा, लेकिन पेंटिंग और कविता का साथ लगातार बना रहा।

आपके सृजन में उस नदी की भी भूमिका रही है, जिसमें बाढ़ आने से तिब्बत जैसी कविता की भूमिका लिखी गई?

हां, यह तो उसी समय की बात है, जब मेरी मां थी। मेरे बचपन का अनुभव था वह। वह जो समय था पचास-साठ के दशक का, बड़ी दुविधा असमंजस और टकराहटों का समय था। मैं इतना छोटा था कि मुझे नहीं पता था कि तिब्बत का भारत से क्या संबंध है। अनूपपुर छोटा सा जंक्शन था, जहां एक ही लाइन थी। मेरी एक कविता भी है अनूपपुर जंक्शन। वहां से ट्रेन बदली जाती थी सरगुजा के लिए। जो तिब्बती शरणार्थी आते थे, उनका एक हिस्सा अनूपपुर में उतर जाता था। वहां से दूसरी ट्रेन लेता था। बरसात के दिनों में दूसरी ट्रेन कई-कई दिनों तक रद्द हो जाती थी, तो वे वहीं रुके रहते थे। और वे कई बार हमारे गांव की तरफ से गुजरते थे। बचपन से ही मुझे लामाओं से बहुत गहरा लगाव रहा। और बाद में बुद्ध भी बहुत आकर्षित करने लगे। बौद्ध धर्म में हम सबकी एक अलग तरह की आस्था है। यह लिबरेट करता है, जातिवाद से मुक्त करता है। और उसके पीछे जो अहिंसा है, वह बहुत सारे दूसरे दर्शनों, जो करुणापूर्ण हैं, से जोड़ती है। इसकी तुलना में हिंदू धर्म को लेकर शुरू से ही मेरे मन में संदेह रहा कि यह हिंदू धर्म है या ब्राह्मणवाद है। बाद में जब देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय और भगवत शरण उपाध्याय वगैरह को पढ़ा तो स्पष्ट होने लगा कि ब्राह्मण ग्रंथों, स्मृतियों, कर्मकांडों की जो परंपरा है वह उपनिषदों के विरोध में है। जबकि महावीर और बुद्ध दोनों का दर्शन उपनिषदों से निकला हुआ है। इसलिए आश्चर्य नहीं होता कि ज्योतिबा फुले से लेकर अंबेडकर तक ने बुद्ध में ही मुक्ति का मार्ग क्यों देखा। तिब्बत मेरी चेतना में अहिंसा और बौद्ध दर्शन का केंद्र था। अगर वेटिकन सिटी अक्षत रह सकता है। येरुसलम को लेकर दुनिया इतनी सेंसिटिव है तो तिब्बत को लेकर क्यों नहीं? जबकि कहा भी गया कि तिब्बत को भारत और चीन के बीच एक बफर स्टेट के रूप में बना रहना चाहिए था। जब मैंने तिब्बत कविता लिखी तो बहुत विरोध हुआ, क्योंकि मैं कम्युनिस्ट था।

आपको नहीं लगा कि गैर प्रगतिशील घोषित कर दिया जाएगा?

कर ही दिया गया था लगभग। लेकिन ये गनीमत थी कि प्रगतिशील और जनवादियों के बीच कुछ सचमुच बहुत प्रबुद्ध माक्र्सवादी भी हैं। जिनके विचार सिर्फ राजनीतिक दृष्टिकोण से ही तय नहीं होते। तिब्बत की स्वायत्तता को मानने वाले बहुत से मार्क्सवादी हैं। और तिब्बत ही नहीं फिलिस्तीन या कहीं के भी सांस्कृतिक समुदाय की सार्वभौमता का सम्मान करते हैं। और कोई उसका हनन करके उपनिवेश बनाता है, तो उसका विरोध करते हैं। मैंने जब तिब्बत कविता लिखी तो बड़ी बहस हुई कि यह तो एंटी कम्युनिस्ट कविता है और केदार जी ने इसे पुरस्कार दे दिया। जब 78 में वियतनाम पर चीन ने हमला किया तो हमने पूछा कि जो वियतनाम साम्राज्यवाद के विरुद्ध युद्ध का एक प्रतीक रहा है, उसके साथ ऐसा सुलूक। इसे क्या कहेंगे। उनके पास कोई उत्तर नहीं था। कई बार जिस राज्य को हम मान लेते हैं कि यह समाजवादी राज्य है, उसके भीतर भी बहुत से कंट्राडिक्शन्स हो सकते हैं। चीन का विस्तारवाद भी एक चिंता का विषय रहा है। रूस भी इससे चिंतित था। पाब्लो नेरूदा के संस्मरण पढि़ए। वहां भी यह चिंता दिखेगी। नेहरू भी इस बात को समझ पाए थे। आज भी हम जानते हैं कि चीन या वेनेजुएला या क्यूबा एक जैसे नहीं हैं। क्यूबा अपनी अस्मिता बचाने के लिए अमेरिका से लड़ रहा है जबकि चीन अपने विस्तार के लिए। और उसका विस्तारवाद कई क्षेत्रों में है, सिर्फ तिब्बत के इनवैजन में नहीं है। व्यापार में देख लीजिए, इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन में देख लीजिए, इंटरनेशनल डिप्लोमैटिक पावर में देख लीजिए, वह तमाम क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। मुझे तो अब भी चीन के प्रति संदेह है। इल्या एहरनबर्ग ने जब नेरूदा को भेजा था स्टालिन प्राइज लेने के लिए, तो माओ का इंटरव्यू करने और चीन में रहने के बाद उन्होंने निष्कर्ष दिया कि माओ मार्क्सवादी नहीं हैं।

आपने डिबिया कहानी में लिखा है कि वे लोग चाहते हैं कि अगर मुझे अनुभव की सत्यता सिद्ध करनी है तो मैं उन लोगों के सामने डिबिया का ढक्कन हटा दूं। साहित्यकार के अनुभव की सत्यता की पड़ताल करने की इस प्रवृत्ति के पीछे कौन सा आग्रह या दुराग्रह काम करता है?

मैं पहले भी कहता रहा हूं कि साहित्यकार को बहुत प्रचीन अर्थों में लिया जाना चाहिए। कई बार मैंने कहा है कि राइटर और ऑथर में अंतर होता है। रचनाकार और लेखक में फर्क होता है। राइटर कोई भी हो सकता है: एक नेता हो सकता है, डॉक्टर हो सकता है, वकील हो सकता है। विज्ञापन लिखने वाला भी हो सकता है। प्रसून जोशी भी लेखक है जो ठंडा मतलब कोका कोला लिखता है और पूरी मानवता को जहर पिलाता है। और उसकी बड़ी चर्चा होती है अखबारों में। ऑथर जो होता है, वह भिन्न होता है। उसी को साहित्यकार कहा जाता है। रोलां बाथ ने बहुत अच्छी तरह राइटर और ऑथर का फर्क बताया है। टॉलस्टाय ऑथर थे, मुरली बाबू या मैनेजर पांडे लेखक हैं। ये जो अंतर है, यह वैज्ञानिक और पूर्व वैज्ञानिक युग का अंतर है। जब हमारे पास समाज परिवर्तन और प्रगति के नियमों को जानने के इतने साधन नहीं थे तब बहुत कुछ हमारी प्रज्ञा काम देती थी। हमारा जो पारंपरिक ज्ञान है, वो काम आता था। उस समय गलतियां करता था ऑथर, लेकिन उसका उद्देश्य होता था चराचर का कल्याण। मानव समाज का उत्थान। बाइबिल, गीता या दूसरे पुराने स्क्रिप्चर्स को देखें तो पाएंगे कि वे बेहतरीन पाठ हैं। उनमें एक समान भावना यही थी कि उसमें मनुष्य का कल्याण हो, कुछ नियम हों, कुछ संहिताएं हों, जिससे मनुष्य दूसरे का अहित न करे। जबकि राइटर बहुत तात्कालिक उद्देश्य के लिए लिखता है। जैसे कि आज जनसत्ता में अजेय कुमार का एक लेख छपा है, जिसका उद्देशय ये है कि सीपीएम को वोट दीजिए। ये जो सवाल आपने पूछा है अनुभव की सत्यता वाला, तो साहित्यकार को हमेशा लेखकों से टकराना पड़ता है। आप देखेंगे कि मेरे लेखन को लेकर जो भी विवाद पैदा हुआ है, वह पाठकों की तरफ से नहीं हुआ है। ये कुछ लेखक यानी राइटर हैं, जो कुटिल षड्यंत्र करते रहते हैं। ये कोई प्रतिद्वंद्विता भी नहीं है। ये बहुत मीडियॉकर किस्म के लोग हैं लेकिन इनके षड्यंत्रों ने मेरे जीवन को प्रभावित किया है। बहुत कठिनाइयां झेलनी पड़ी हैं। चीजों को डिस्टॉर्ट करने का सिलसिला तिब्बत कविता या टेपचू कहानी से लेकर आज तक चला आ रहा है। कहानियों में लोग व्यक्तियों को ढूंढऩे लगते हैं। यह फासिस्ट प्रवृत्ति है, जैसे कुछ लोगों ने रामायण में अयोध्या और राम की जन्मभूमि खोज डाली और दंगा मचा दिया, वही काम आप यहां कर रहे हैं। तो आप में और आरएसएस में क्या अंतर है। अगर आप मेरी कहानी में किसी प्रोफेसर को ढूंढ़ लेंगे, किसी पुलिस वाले को ढूंढ़ लेंगे, फिर उससे जाकर शिकायत करेंगे और वह मुझको प्रताडि़त करेगा, तो यह फासीवादी प्रवृत्ति नहीं तो क्या है। इन लोगों ने मुझे बहुत नुकसान पहुंचाया। मेरे पास गोल्ड मेडल थे, अच्छा एकैडमिक रेकार्ड था, लेकिन मीडियाकर किस्म के लोगों ने मेरे साथ क्या किया? जातिवाद और मीडियॉक्रिटी और ब्यूरोक्रेसी व राजनीति के इस नेक्सस ने अपने समय के हर रचनाकार को आहत किया है। बाबा नागार्जुन से लेकर राहुल सांकृत्यायन तक तमाम बड़ी प्रतिभाओं के साथ ऐसा किया गया।

अकसर कवि उदय प्रकाश के खिलाफ कहानीकार उदय प्रकाश को खड़ा कर दिया जाता है। आपके खिलाफ आप को ही खड़ा कर देने की इस रणनीति पर क्या कहेंगे?

यह बड़ा विचित्र है। आप पाएंगे कि दोनों सूचियों में मेरा नाम नहीं रहता। जब तक मैंने अपनी कहानियों को छुपाए रखा तब तक नव प्रगतिशील कविता की जो त्रयी बनती थी उसमें सबसे पहले मेरा नाम आता था- उदय प्रकाश, अरुण कमल, राजेश जोशी। फिर कैसे उस सूची से मैं गिरा..और नामों की एक लाइन लग गई।

राजेंद्र यादव ने आजादी के बाद दस महत्वपूर्ण कवियों और दस कहानीकारों की लिस्ट दी थी। उन्होंने कहा था कि दस कवियों में आठ ब्राह्मण हैं और दस कहानीकारों में आठ गैर ब्राह्मण हैं। इसका कारण यह बताया था कि कविता ब्राह्मणी विधा है जिसमें अमूर्तन के चलते छद्म मूल्यांकन की ज्यादा गुंजाइश रहती है। आपको क्या लगता है?

एक हद तक मैं इससे सहमत हूं। कविता में और किसी भी ऐसे इलीट आर्ट फार्म या अभिजन कला रूप में मैनिपुलेशन संभव है। उसका छद्म मूल्यांकन संभव है क्योंकि बृहत्तर समाज तक वह नहीं पहुंच रही है। दस लोगों के बीच ही अगर कोई कला बरती जाती है, तो उसमें किसी को भी महान बना सकते हैं। लेकिन कहानी या उपन्यास सार्वजनिक विधाएं हैं। इनकी पहुंच ज्यादा है। वहां पर आप मनमानी नहीं कर सकते।

मनमानी करेंगे तो पाठक पकड़ लेगा?

बिलकुल, पाठक समझ जाएगा। विजयमोहन सिंह ने मेरे खिलाफ कुछ टिप्पणियां कीं तो पाटकों के तमाम पत्र आए मेरे पास। मतलब यह कि कहानी-उपन्यास में आप पकड़ लिए जाते हैं। आप देखिए कि प्रेमचंद का साथ किसी आलोचक ने नहीं दिया। आचार्य शुक्ल से लेकर उस समय के सारे सशक्त आलोचक थे सबके द्वारा अस्वीकृत होने के बावजूद प्रेमचंद कथा सम्राट कहलाए।

ऐसा तो नहीं कि कविता में आलोचना ने एक ऐसा भ्रम पैदा कर दिया कि पाठक भी भ्रमित हो जाता है?

कविता के पाठक कितने हैं। लोठार लुत्से ने पूछा था कि कविता की भाषा कौन सी है। और वह भाषा कितने लोगों तक संप्रेषित हो रही है। हिंदी के ही संदर्भ में बात करें तो हमारी कविता की हिंदी, क्या वही हिंदी है जो आज का जीवित हिंदी भाषी समुदाय बोल रहा है। अमीर खुसरो जिस हिंदवी में लिख रहे थे वह ऐसी भाषा थी जो दिल्ली से लेकर आगरा और उसके आगे तक बोली जाती थी। आज हिंदी कविता की जो भाषा है, वह हिंदी विभागों की भाषा है। ये आम जनता की भाषा नहीं है। आप आज की कविताओं को पढ़कर देखिए, उनकी भाषा कोई नहीं समझता है।

आपकी जो लंबी कविता है एक भाषा हुआ करती है, उसमें भी आपने भाषा का सवाल उठाने की कोशिश की है...

बिल्कुल। दुनिया के हर देश में बड़े कवि चाहे वे नाजिम हिकमत हों या कोई और, ऐसी भाषा में लिख रहे थे जो लोगों को समझ में आए। भाषा को बचाना जरूरी है और भाषा को मुक्त करना जरूरी है। भाषा में भी वर्ग वर्ण और जाति के जो वर्चस्व हैं, उनसे भी मुक्ति चाहिए। ये लोग सांप्रदायिकता के विरुद्ध लेख लिखते हैं, लेकिन आप उस भाषा को देखिए, जिसमें ये लिखते हैं, वह पूरी तरह सांप्रदायिक भाषा है। सेकुलर पोएट्री, सेकुलर राइटिंग हिंदी में कम्युनल लैंग्वेज में हो रही है। वो ब्राह्मीसाइज्ड लैंग्वेज में हो रही है। एक खास जाति की भाषा में यहां सेकुलरिज्म आ रहा है। इसीलिए आज गुलजार ज्यादा लोकप्रिय हैं, नीरज ज्यादा लोकप्रिय हैं।
एक क्लोज सोसायटी है, कुछ अफसरों, कुछ राजनीतिक दलों के लेखक संगठनों की और कुछ प्रोफेसरों की, जिसके बीच में कविता फल फूल रही है। ये क्लेप्टोक्रेसी है। ये संस्थानों से इतने सरकारी पैसे हड़प रहे हैं कि इन्हें शर्म आनी चाहिए। हिंदीभाषी क्षेत्र से वामपंथ का जनाधार गायब हो चुका है और जनाधार गायब हो जाने के कारण इनकी कोई सोशल मॉनिटरिंग भी नहीं हो पा रही है। समाज इनकी निगहबानी नहीं कर रहा है, इसलिए खुला खेल खेल रहे हैं। कोई अर्जुन सिंह की चमचागिरी कर रहा है तो कोई किसी और के जूते ढो रहा है। हिंदी दुर्भाग्य से या सौभाग्य से ऐसी भाषा है, जिसे बोलने वाली दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या का दो तिहाई हिस्सा 2 डॉलर प्रतिदिन से भी कम पर गुजारा करता है। इतनी गरीब जनसंख्या के बीच अगर ये लोग एक्सेल कर रहे हैं तो इसे क्या कहेंगे। ऐसा नहीं है कि मैं एलीट साहित्य का विरोधी हूं। अभिजात्य साहित्य बहुत जरूरी होता है किसी भी भाषा के विकास के लिए। लेकिन ये तो आभिजात्य भी नहीं है। आपके पास अज्ञेय या निर्मल वर्मा जैसे साहित्यकार हैं जो आपकी पोलिटिकल विचारधारा से मेल नहीं खाते, लेकिन वो ऐसे साहित्य का निर्माण करते हैंजिसे आज भी आप ईमानदारी से पढ़ेंगे तो कहेंगे कि यह श्रेष्ठ साहित्य है। विनोद कुमार शुक्ल की रचनाओं में कौन सी राजनीति है। मेरा मानना है कि कोई भी अच्छी रचना मूलत: प्रगतिशील होती है और मूलत: मानवतावादी होती है और मूलत: सामाजिक विषमता के विरोध में होती है। जो निर्मल वर्मा की भाषा है या विनोद कुमार शुक्ल की भाषा है, वह आपको ज्यादा संवेदनशील बनाती है। जैसे मुक्तिबोध आपको अधिक प्रबुद्ध करते हैं, आपकी प्रज्ञा को उत्तेजित करते हैंतो निर्मल वर्मा आपको ज्यादा संवेदनशील बनाते हैं। और ऐसा नहीं कि सिर्फ भाषा के प्रति संवेदनशील बनाते हैं, आपको अपने इर्द-गिर्द के प्रति भी संवेदनशील बनाते हैं। अगर आप तितली के बारे में नहीं संवेदित हो रहे हैं या घास के बारे में नहीं संवेदित हो रहे हैं, सिर्फ अमेरिका या वियतनाम के बारे में संवेदित हो रहे हैं तो मुझे आप पर डाउट है। आप फिलिस्तीन, अमेरिका को लेकर संवेदनशील हैं, लेकिन अगर आप जूतों से घास रौंद रहे हैं, पर्यावरण की कोई चिंता नहीं है, सूर्योदय और सूर्यास्त से आप संवेदित नहीं हो रहे हैंतो यह कौन सी संवेदनशीलता है।

इस तरह की संवेदनशीलता के संदर्भ में आप वान गॉग की पेंटिंग मेज़ अंडर स्टॉम्ड स्काई का हवाला देते हैं जिसमें आसमान में गहराते तूफान की आशंका में मकई के पौधे डर कर सिहर गये हैं...

हां, बिलकुल। यह सच है कि किसी भी कलाकार या मनुष्य के लिए अपने इर्द-गिर्द के प्रति संवेदनशील होना बहुत जरूरी है। अभी पिछले दिनों सार्क साहित्य सम्मेलन में यहीं के एक अंगरेजी कवि ने बहुत अच्छी कविता पढ़ी। जिसका भाव यह था-
वो लोग जो दावा करते हैं कि हम शेर को बचा लेंगे
वो झूठ बोलते हैं
क्योंकि वो घास के बारे में चुप हैं
शेर को बचाएगी घास
क्योंकि घास बचाएगी हिरन को
और हिरन बचाएगा शेर को
आपको घास के बारे में सोचना पड़ेगा। ऐसा नहीं होगा कि ऊंची-ऊंची लफ्फाजी करके अपनी प्रगतिशीलता प्रमाणित कर लेंगे और बहुत छोटे-छोटे निरीह निर्बल और लगभग बध्य प्राणियों और वनस्पतियों के बारे में क्रूर बने रहेंगे। आप आज लिखी जा रही हिंदी की कहानियां पढि़ए, उनमें घटनाएं तो होंगी लेकिन मनुष्य की संवेदना के रोजमर्रा के जो प्रमाण हैं, आस पास के परिवेश से उसका संबंध, वो एक सिरे से नदारद मिलेंगे।

क्या यही वजह है कि पाठक के मन से उनका जुड़ाव नहीं हो पाता? तिरिछ कहानी को पढ़कर जिस तरह पूनम वर्मा की चिट्ठियां आती हैं, क्या कविताएं भी वैसी संवेदनशीलता जगा पाती हैं?

कविताओं का क्या कहूं.. आप पुरानी कविताएं देखिए, सरोज स्मृति पढि़ए... राम की शक्ति पूजा पढि़ए। मुक्तिबोध की कई कविताएं हैं। शमशेर की टूटी हुई बिखरी हुई, अमन का राग पढि़ए। इन्हें पढ़ते हुए आप भूल जाते हैं कि किसकी रचना है, वह आपको अपनी लगने लगती है। ऐसा क्यों हुआ है कि पिछले कुछ समय से बहुत स्मार्ट पोलिटिकल कमेंट्स तो आए हैं कविताओं में, अपने समय के कनफिल्कट्स जो सतह पर हैं, जिनको सिर्फ पोलिटिकली भी समझा जा सकता है, वही-वही कविताओं में दिखते हैं। उसकी जो गहराई थी, वह गायब है। जैसे शमशेर की पंक्ति है- कबूतरों ने गजल गुनगुनाई, मैं नहीं जानता कि रदीफ काफिया क्या है? एक और पंक्ति है- आइनों मुस्कराओ और मुझे मार डालो। ये पंक्तियां लगभग अमूर्तन की ओर बढ़ती हुई भी पूरे प्रभाव के साथ बहुत ठोस भौतिकता की हद तक संवेदना को व्यक्त करती हैं। ऐसी सारी स्थितियां ही गायब होती जा रही हैं हिंदी कविता में। जो कविताएं बहुत प्रमुखता से आई हैं, वे बहुत स्मार्ट हैं। उनकी भाषा ब्राह्मणीकृत है। उसमें बहुत सारे शब्दों का दखल नहीं है, आवाजाही नहीं है। वो हिंदी समाज की जीवित भाषा को वर्जित करती हैं। और जब तक वो अपने को इस भाषा से मुक्त नहीं करेंगी, वे समाज में स्वीकृत नहीं हो पाएंगी। आप पोलिस कवि ताद्दिस रोजोविच को पढि़ए, उसकी कविता बहुत सरल कविता है। पोलिस भाषा का हर पाठक उस कविता को पढ़-समझ सकता है। ये सभी बड़े कवियों पर लागू होता है। लेकिन हिंदी में जिस तरह की कविताएं आ रही हैं, उनकी भाषा को लेकर मुझे आपत्ति है। मेरे विचार से ऐसी भाषा नहीं लिखी जानी चाहिए।

जादुई यथार्थवाद से आपका साबका कब पड़ा। लोग कहते हैं कि एक प्रविधि के रूप में सायास अपनाया । पर वास्तविकता क्या है, क्या आपने पहले लिख लिया और बाद में लोगों ने उसमें जादुई यथार्थवाद को ढूंढ़ा?

लोग क्या कहते हैं, यह सुन-सुन कर मेरे कान पक चुके हैं। जादुई यथार्थवाद जैसी चाज से न मेरा पहले कोई संबंध था, न आज है। मेरी रचनाओं में कुछ लोगों ने इसे ढूंढ़ा। लेकिन आप से मैं पहले भी कह चुका हूं, टेपचू मैंने लिखी 1976 में आपातकाल के दौर में। तब तो जादुई यथार्थवाद कोई नहीं जानता था, मेरे ख्याल से नामवर सिंह भी नहीं जानते थे। तब कहीं इसका कोई हल्ला ही नहीं था। टेपचू के बाद एक और कहानी लिखी गई। मेरी कहानियों में कहीं न कहीं कुछ ऐसा था जिसे पश्चिमी भाषा में मैजिकल कहा जा सकता है। और अगर भारतीय संदर्भ में देखें तो हमारी जो पूरी परंपरा रही है आख्यान की, जिसमें जातक, पंचतंत्र, दादी नानी की कहानियां, लोक कथाएं आती हैं, उसमें पहले से यह बात है। मैं तो जानता भी नहीं था कि कुछ अनोखा काम कर रहा हूं। लेकिन मेरी कहानियों में जादुई यथार्थवाद ढूंढऩे का यह काम किया कुछ आलोचकों ने। जहां तक मुझे याद है, जिस आलोचक ने मुझ पर सबसे पहले जादुई यथार्थवाद चिपकाया वह थे चंचल चौहान। मेरे खयाल से यह बयासी-चौरासी की बात है। तिरिछ जब आई, उसके आस-पास की बात है। जब लोग मुझसे पूछते थे, तो कई बार मैं गुस्से में कहता था कि हां, मैं जादुई यथार्थवादी हूं। कुछ इतनी वितृष्णा से मुझे जादुई यथार्थवादी बताया जाता था जैसे मैं यथार्थवाद का विरोध करने वाला, प्रेमचंद की परंपरा का विरोध करने वाला, वामपंथ का विरोध करने वाला कलावादी किस्म का व्यक्ति हूं। मैंने उनको समझाने की कोशिश की कि अगर ऐसा है भी तो जादुई यथार्थवाद तो आया ही है यूरोप और अमेरिका के वर्चस्व के विरोध में। लैटिनी-अमरीकी देशों की जनता ने अपने साहित्य को, अपने यथार्थ को यूरोप के रीयलिज्म से अलग करने के लिए एक नाम दिया, जादुई यथार्थवाद। उन्होंने कहा कि चूंकि हमारा समाज आज भी आधुनिक नहीं हुआ है, यहां आज भी भूत प्रेत हैं, अंधविश्वास है, मिथक की मौजूदगी है, इसलिए हमारे किसी भी आख्यान में ये तत्व शामिल हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि ये अजब आख्यान हैं। इनमें एक कौतुक है। इसको अलग से चिन्हित करने के लिए उन्होंने जादुई यथार्थवाद का नाम दिया। इसके पीछे बहुत बड़ी चेतना थी कि साम्राज्यवादी, यूरोपीय, पश्चिमी साहित्य के प्रभाव से अपने को मुक्त करें। और देखिए कि उसके बाद बड़े उपन्यासकारों कथाकारों की एक पूरी पीढ़ी उभर कर आई। जिसमें बोर्खेज हैं, मारक्वेज हैं, अस्तूरियास हैं। ऐसे साहित्यकारों की लंबी लाइन है। हमारे यहां भी इस तरह के कौतुक हैं, अजब आख्यान हैं, लेकिन हमारे यहां उसे अलग से चिन्हित करने का काम नहीं किया गया। हमारे यहां तो नकल ही करते रहे। हमारे प्रेमचंद मौलिक हैं, लेकिन कहा गया कि वे हिंदी के गोर्की हैं। क्या जरूरत है उन्हें गोर्की कहने की। प्रेम चंद क्या प्रेमचंद के रूप में ही महान नहीं हैं।

प्रेमचंद की मंत्र कहानी को देखिए, वहां भी तो जादुई चमत्कार है कि मंत्र की शक्ति से सांप का जहर उतर जाता है...

कितनी-कितनी कहानियांहैं। मंगलसूत्र को देखिए, और भी तमाम कहानियां हैं। इस तरह देखेंतो कोई सैद्धांतिकी किसी रचना को जन्म नहीं देती है। रचना ही नहीं, कोई यह सोचे कि सिद्धांत पढ़कर मैं अच्छा मनुष्य बन जाऊंगा तो वह भी संभव नहीं है। सिद्धांत सबसे पहले मनुष्य को डिह्यूमनाइज करते हैं। इनडॉक्ट्रिनेशन इसीलिए जेहादियों की चीज है। उनके मन में इस तरह सिद्धांत बिठा दिया गया है कि वे भीड़ में जाकर बम लगा देते हैं। मैं तो गांधी जी की तरह किसी भी सैद्धांतिकी के द्वारा मनुष्य की समूची आत्मा के अपहरण के विरुद्ध हूं। असैया बर्लिन ने कहा कि जब मैं 1917 की क्रांति की याद करता हूं,तो मुझे कुछ याद नहीं आता, सिर्फ इतना याद आता है कि पचपन साठ साल का एक ह्वाइट गार्ड था जो जार का कर्मचारी रहा होगा, उसको पीटते हुए रेड गाड्र्स लिए जा रहे थे। उसकी नाक से खून बह रहा था। उसकी एक आंख बाहर निकल आई थी। जो पिट रहा था, वह भी गरीब था और जो पीट रहे थे, वे भी गरीब थे। वे कहते हैं, तब से मुझे लगा कि क्रांति कुछ नहीं है, इनडॉक्ट्रिनेटेड फौजों की लड़ाई है। लेनिन की अंतिम दिनों की डायरी पढि़ए, जिस पर हम लोगों ने नाटक तैयार किया था 'लाल घास पर नीले घोड़े', लेनिन ने साफ लिखा था- ये जो क्रांति हुई और हमारी पार्टी बनी, यह दो विश्वयुद्धों के बीच बनी, इस कारण इसमें मिलिटरिज्म आ गया। इससे लगता है कि सेना, सैन्यवाद हमारे दर्शन का ही हिस्सा है, जबकि हम बंकर सोशलिज्म नहीं चाहते। हम खंदकों और खाइयों वाला समाजवाद नहीं चाहते। उस समय वे विचारों से गांधी के बहुत करीब हो गए थे। अभी भी हमारे यहां लोग मानते हैं कि मार्क्सवाद का मतलब रेड आर्मी, हथियार और जेहाद और नारेबाजी है। मेरा मानना है कि सबसे अच्छी रचना वही होती है, जो सबसे धीमी आवाज में अपने समय की किसी भी यातना या पीड़ा को व्यक्त करती है।

गांधी और बुद्ध आपको बहुत करीब लगते हैं। आपकी चर्चित कहानी है 'मोहनदास'। यह एक आदमी की पहचान या अस्मिता छीन लिए जाने की कहानी है। इसके मुख्य पात्र का नाम मोहनदास क्या गांधी जी के प्रभाव के कारण है?

देखिए प्रभाव तो मार्क्स का भी है। लेकिन मैं इनडॉक्ट्रिनेशन के खिलाफ हूं। मोहनदास नाम मैंने जानबूझकर रखा था। मोहनदास ही क्यों, उसके घर के हर सदस्य के नाम देखिए काबा, पुतली देवदास सब गांधी परिवार के नाम हैं। यह एक डिवाइस है यथार्थ को व्यक्त करने की। इसके पीछे लॉजिक यह था कि गांधी अंतिम आदमी की बात करते थे। गांधीजी की लड़ाई औपनिवेशिक दासता से राजनीतिक मुक्ति की ही लड़ाई नहीं थी। उनके आर्थिक दृष्टिकोण भी थे। औद्योगीकरण के जवाब में कुटीर उद्योगों की तरफ उनका ध्यान था। दूसरी तरफ वे मनुष्य को गांव के साथ-साथ स्वावलंबी बनाना चाहते थे। वे हर स्तर पर स्वाधीनता चाहते थे। छोटी से छोटी इकाई यानी परिवार, फिर गांव, फिर देश, सब की स्वाधीनता चाहते थे। उनका मशहूर कथन है कि जो कदम आप उठाते हो क्या वह अंतिम आदमी के आंसू को पोछता है। मोहनदास की जो कहानी है वह सत्य घटना पर आधारित है। और कहानी के बाहर जो असली मोहनदास है, उसे अभी तक न्याय नहीं मिल पाया है। तो गांधी के बहाने मैं यह कहना चाहता था कि जो लोकतंत्र है, वह असफल हो चुका है। लोग कहते हैं कि समाजवाद असफल हो चुका है, मैं कहता हूं कि समाजवाद और पूंजीवादी लोकतंत्र दोनों औद्योगीकरण के ही गर्भ से पैदा हुए थे, और दोनों ही असफल हो चुके हैं। डेमोक्रेसी क्लेप्टोक्रेसी में बदल चुकी है और कोई भी नागरिक जो सत्ता से नहीं जुड़ा है, और अपराधी नहीं है, वह मोहनदास है। मैं खुद को मोहनदास मानता हूं। और मोहनदास की लोकप्रियता का कारण भी यही है कि आम आदमी जो सत्ताहीन है, वह खुद को मोहनदास से आइडेंटिफाई कर पाता है। आज एक बड़ा अधिकारी, मंत्री हमारी पहचान, हमारी विचारधारा तक छीन ले जाता है। अगर वह कह दे कि उदय प्रकाश सांप्रदायिक हैं तो हमारा बौद्धिक समाज भी वही दुहराने लगेगा। सत्ता के सामने हमारे बौद्धिक समुदाय ने पूरी तरह सरेंडर कर दिया है।

Friday, October 29, 2010

कहेउ नामवर सुनहु सुजाना

उपन्यास 'उत्तर वनवास' पर
वरिष्ठ आलोचक डॉ. नामवर सिंह की यह टिप्पणी
पाक्षिक पत्रिका 'द पब्लिक एजेंडा' के
29 सितंबर 2010 के अंक में
'सबद निरंतर' कॉलम में प्रकाशित हुई है।

नए ढांचे का उपन्यास
नामवर सिंह

अरुण आदित्य युवा कवि हैं। अब तक वे कविता के लिए ही जाने जाते रहे हैं। उत्तर वनवास उनका पहला उपन्यास है। मैं एक सांस में इस उपन्यास को पढ़ गया। लगभग डेढ़ सौ पृष्ठों का यह उपन्यास इतना बांधे हुए था। बार-बार श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी की याद आ रही थी। उपन्यास में व्यंग्य का सटीक प्रयोग हुआ है। कोई वाक्य ऐसा नहीं है, जिस पर अवध की विशिष्ट संस्कृति की छाप न हो। और सबसे खास पक्ष है इसका विन्यास। विषय-वस्तु का विस्तार आपातकाल से लेकर रामजन्मभूमि विवाद और आज की राजनीति तक है। इस पूरे काल को समेटता यह उपन्यास गांव से निकले हुए एक आदमी रामचंद्र रामायणी को केंद्र में रखकर लिखा गया है।
उपन्यास दस अध्यायों में बंटा है। हर अध्याय का एक शीर्षक दिया है और सारे ही शीर्षक बड़े दिलचस्प हैं। पहले अध्याय का शीर्षक है- 'तीन झोपडिय़ां बनाम तेरह सौ डॉलर की कलाकृति।' दूसरे अध्याय का शीर्षक भी बहुत दिलचस्प है- 'अंडे का फूटना और बछड़े का होंकडऩा'। अवधी की छौंक यहां भी है। पूरी भाषा में एक तंज है। शायद ही कोई वाक्य हो जिसमें भाषा का खेल न हो। शायद यह अवध की अपनी खूबी है।
एक तो रामचंद्र थे त्रेता युग वाले, दूसरे इनके रामचंद्र हैं। वैसे तो रामचंद्र नाम बहुत मिलते हैं पर ये रामायणी हैंं। बहुत अच्छे वक्ता, राम-कथा कहने वाले। तुलसीदास के रामचरित मानस की चौपाइयों का प्रयोग गांव के लोग कदम-कदम पर करते हैं। रामचरित मानस उनके मुहावरे में शामिल है। इस उपन्यास में भी तुलसी की चौपाइयों और अर्धालियों का सटीक प्रयोग हुआ है।
उपन्यास शुरू होता है कैफी आजमी की मशहूर नज्म से,
'पांव सरयू में अभी राम ने धोए भी थे
कि नजर आए उन्हें खून के गहरे धब्बे
पांव धोए बिना सरयू के किनारे से उठे
राम ये कहते हुए अपने दुआरे से उठे
राजधानी की फजा आई नहीं रास मुझे
छह दिसंबर को मिला दूसरा वनवास मुझे'
मैं खास तौर पर लेखक की राजनीतिक परिपक्वता का जिक्र करना चाहूंगा। हिंदूवादी राजनीतिक पार्टी, जिसका नारा था कि मंदिर वहीं बनाएंगे, उसे लेखक ने नाम दिया है राष्ट्रवादी पार्टी। रामचंद्र रामायणी उसी पार्टी के नेता हैं, लेकिन उन्हें गर्व से कहो हम हिंदू हैं, जैसे नारों पर आपत्ति है। इस पर लंबी बहस है इस उपन्यास में। रामचंद्र कहते हैं कि हिंदू शब्द तो हमारे लिए अपमानजनक है। यह शब्द तो विदेशियों का दिया हुआ है। हम अपने देश को हिंद नहीं भारत कहते हैं। अगर हम अपने को हिंदू के बजाय भारतीय के रूप में पहचानें तो इस पहचान के नीचे मुसलमान भी आ जाएंगे, ईसाई भी आएंगे और जो भी भारत में रहते हैं, सभी आएंगे। स्वामी रामचंद्र रामायणी उस राष्ट्रवादी पार्र्टी में बहुत ऊंचे पद पर हैं, लेकिन पार्टी से उनका यह मतभेद शुरू से है और अंत तक रहता है।
जहां तक उपन्यास की अंतर्वस्तु की सवाल है, इसकी कथा की शुरुआत आपातकाल से होती है। मुझे नहीं लगता कि आपातकाल पर हिंदी में कोई महत्वपूर्ण उपन्यास लिखा गया है। भाषा की बानगी के तौर पर उपन्यास का एक अंश देखिए :
'रामचंद्र की हंसी अपने को गलत समझ लिए जाने से शर्मिंदा हो गई। वह शर्म से संकुचित हुई तो उसमें छिपे व्यंग्य को तकलीफ हुई और वह चुपचाप निकल भागा। व्यंग्य को विस्थापित होते देख हंसी उदास हो गई।
'उदास मत हो बहन।' हंसी को ताज्जुब हुआ कि यहां उसे ढाढ़स बंधाने वाला कौन गया। ढाढ़स बंधानेवाली का स्वर मिश्री-सा था, 'विस्थापन का दर्द मैं समझती हूं बहन। पर आपका व्यंग्य तो विस्थापित होकर भी किस्मत वाला है।'
हंसी ने आगंतुक की ओर कुछ इस तरह से देखा, कि जैसे उसका देखना यह पूछ रहा हो कि आप कौन हैं और मेरे व्यंग्य के बारे में क्या जानती हैं?
'मैं नीति हूं, जिसे राजनीति ने बेदखल कर रखा है। दर-दर भटक रही हूं, कहीं ठौर नहीं मिलता। जहां जाती हूं राजनीति पहले ही पसरी हुई मिलती है। पर आपका व्यंग्य तो वाकई भाग्यशाली है। उसे मैंने जबलपुर की ओर जाते देखा है।'
'जबलपुर?'
'हां, वहां हरिशंकर परसाई नाम का लेखक रहता है। उसकी कलम बहुत बड़ी है। दुनिया भर का व्यंग्य उसमें समा सकता है। पर मैं कहां जाऊं? क्या मेरे लिए कोई ठौर नहीं?'
'एक दिन इन्हीं कंधों पर मिलेगा तुम्हें ठौर। ' रामचंद्र की हंसी ने रामचंद्र के कंधों की ओर इशारा करते हुए कहा, 'आज जरूर इन पर राजनीति का हाथ है, लेकिन एक दिन राजनीति के लिए ये कंधे असहज हो जाएंगे और तुम इन पर निवास करोगी। रामचंद्र को मैं बचपन से जानती हूं इसलिए कह सकती हूं कि ये कंधे तुम्हारे लिए ही बने हुए हैं।'
इस अंश में हरिशंकर परसाई आते हैं। इसी तरह इस पूरी प्रक्रिया में लेखक ने साहित्यिक परिवेश को भी समेटा है। इसमें अनेक कवि उपस्थित हैं। अनेक कविताएं उद्धृत की हैं और बिलकुल सटीक जहां करना चाहिए, वहीं उनका उपयोग हुआ है। उपन्यास में पीपल का एक पेड़ है, जिसे कथानायक रामचंद्र अपना बोधिवृक्ष कहते हैं, जब उन्हें कोई दुविधा होती है तो वहीं जाकर उसके नीचे बैठ जाते हैं। या फिर एक क्रांतिकारी कवि सत्यबोध के पास जाते हैं। सत्यबोध कम्युनिस्ट हैं। इस बात को वे छिपाते नहीं और उनसे स्वामी रामचंद्र की खूब बहस होती है। स्वामी जी का जीवन इस बात का गवाह है कि ऊपर से संत महात्मा दिखाते हुए लोगों के मन में प्रेम से जुड़ी संवेदनाएं और मानवीय कमजोरियां भी होती हैं।
'उत्तर वनवास' इस दौर में लिखे गए उपन्यासों में नए ढांचे, नई कथादृष्टि वाली एक उल्लेखनीय कृति है।
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उपन्यास : उत्तर वनवास
प्रकाशक : आधार प्रकाशन, एससीएफ- 267
सेक्टर-16, पंचकूला-134113 (हरियाणा)
मोबाईल - 09417267004
मूल्य : 200 रुपए