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Tuesday, August 30, 2011

एन जी ओ का पइसा बोला




मैं भी अन्ना

गलियां बोलीं, मैं भी अन्ना, कूचा बोला, मैं भी अन्ना!

सचमुच देश समूचा बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना!


भ्रष्ट तंत्र का मारा बोला, महंगाई से हारा बोला!
बेबस और बेचारा बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना!

जोश बोला मैं भी अन्ना, होश बोला मैं भी अन्ना!

युवा शक्ति का रोष बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना!


साधु बोला मैं भी अन्ना, योगी बोला मैं भी अन्ना!
रोगी बोला, भोगी बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना!


गायक बोला, मैं भी अन्ना, नायक बोला, मैं भी अन्ना!
दंगों का खलनायक बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना!

कर्मनिष्ठ कर्मचारी बोला, लेखपाल पटवारी बोला!

घूसखोर अधिकारी बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना!


मुंबई बोली मैं भी अन्ना, दिल्ली बोली मैं भी अन्ना!
नौ सौ चूहे खाने वाली, बिल्ली बोली, मैं भी अन्ना!

डमरू बजा मदारी बोला, नेता खद्दरधारी बोला!

जमाखोर व्यापारी बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना!


हइया बोला मैं भी अन्ना, हइशा बोला मैं भी अन्ना!
एन जी ओ का पइसा बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना!

दायां बोला, मैं भी अन्ना, बायां बोला, मैं भी अन्ना!

खाया, पिया, अघाया बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना!

निर्धन जन की तंगी बोली, जनता भूखी नंगी बोली
हीरोइन अधनंगी बोली, मैं भी अन्ना ,
मैं भी अन्ना!

नफरत बोली मैं भी अन्ना, प्यार बोला मैं भी अन्ना!
हंसकर भ्रष्टाचार बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना!


- अरुण आदित्य
( साभार : अमर उजाला, २८ अगस्त २०११)

Friday, February 25, 2011

कविता के कुछ पते

मेरी कविता के कुछ पतेः  दो  कवितायें अनुनाद पर ।  चार  कवितायें समय संकल्प पर। पांच कविताएं समालोचलन  पर। कुछ और कवितायें सुनहरी कलम  पर पढ़ सकते हैं।

Thursday, July 8, 2010

झोपड़ी के हिस्से में किस्से


यह कविता साहित्यिक पत्रिका हंस के जुलाई अंक में प्रकाशित हुई है। कई मित्रों ने वहां पढ़ लिया होगा, जो न पढ़ सके हों , उनके इसे लिए इसे यहाँ फिर से प्रकाशित किया जा रहा है।

झोपड़ी के हिस्से में किस्से

पता नहीं झोपड़ी का दर्द जानने की आकांक्षा थी
या महज एक शगल
कि झोपड़ी में एक रात गुजारने को आ गया महल

झोपड़ी फूली नहीं समा रही
उमंग से भर गया है जंग लगा हैंडपंप
प्यार से रंभा रही है मरियल गाय
कदम चूम कर धन्य है उखड़ा हुआ खड़ंजा

अपनी किस्मत पर इतरा रही है टुटही थाली
गर्व से तन गई है झिलंगा खटिया
अभिमान से फूल गई है कथरी
अति उत्साह में कुछ ज्यादा ही तेल पी रही है ढिबरी

आग से ठिठोली कर रहा है चूल्हा
उम्मीद से नाचने लगी है चक्की

ऐसे खुशगवार माहौल में पुलकित महल ने
हुलसित झोपड़ी से पूछा, बताओ तुम्हें कोई दुख तो नहीं
झोपड़ी को लगा कि उसके दुख से बड़ा है आज का यह सुख
और उसने यह भी सुना था कि महल के आने से
अपने आप ही दूर हो जाते हैं सब दुख

महल ने फिर पूछा
फिर-फिर पूछा, इस राज में कोई तकलीफ तो नहीं तुम्हें
वह कहना चाहती थी कि कई दिनों से ठंडा पड़ा है चूल्हा
पर चूल्हे की उमंग देख उसे लगा कि ऐसा कहना
रंग में भंग करने जैसा अपराध होगा


सवाल पूछते-पूछते थक गया महल
थके हुए महल को गर्व से तनी खटिया
और मान से फूली कथरी पर मिला चेंज
और रोज से ज्यादा आई नींद
इधर झोपड़ी जागती रही रात भर
कि उसके सोने से कहीं सो न जाए उम्मीद

सुबह महल झोपड़ी से निकला
और सबके देखते ही देखते खबर बन गया

झोपड़ी के हिस्से में अब सिर्फ किस्से हैं
जिन्हें वह आने-जाने वालों को रोक-रोककर सुनाती है
कि किस तरह महल ने यहां गुजारी थी एक रात

पर जब कोई नहीं सुनता उसकी बात
तो खड़ंजा हो जाता है उदास, हैंडपंप निराश
ढीली पड़ जाती है खटिया, लस्त हो जाती है कथरी
मद्धिम पड़ जाती है ढिबरी की लौ
सन्न हो जाते हैं चूल्हा-चक्की
और सब मिलकर झोपड़ी से कहते हैं
झोपडिय़ा दादी, सुनाओ जरा वह किस्सा
कि किस तरह महल ने गुजारी थी यहां एक रात।
- अरुण आदित्य

इलस्ट्रेशन : एस टी गिल, http://www.tocal.com/homestead/vandv/vv18.htm से साभार

Friday, February 26, 2010

डर के पीछे जो कैडर है


एम एफ हुसैन का आत्म निर्वासन हो, या तस्लीमा नसरीन का निर्वासन, सलमान रुश्दी के खिलाफ मौत का फतवा हो या सफदर हाशमी की हत्या...इनके जरिए फासीवादी शक्तियां सिर्फ इन व्यक्तियों को ही नहीं, अपने सोच से अलग सोच रखने वाले हर दिमाग को नियंत्रित करना चाहती हैं। वे बहुरंगी संस्कति में यकीन नहीं करते, पूरी दुनिया को एक ही रंग में रंग देना चाहते हैं। यह प्रवृत्ति नई नहीं है, लेकन हाल के वर्षों में यह और ज्यादा घातक हुई है। सृजन-संस्कृति पर इस प्रवृत्ति के भयावह प्रभाव को रेखांकित करती है यह कविता जो हरियाणा साहित्य अकादमी की पत्रिका हरिगंधा में 2008 में छपी थी। आज हुसैन के बहाने यह फिर प्रासंगिक लग रही है...


डर के पीछे जो कैडर है

यह केसरिया करो थोड़ा और गहरा
और यह हरा बिल्कुल हल्का
यह लाल रंग हटाओ यहाँ से
इसकी जगह कर दो काला
हमें तस्वीर के बड़े हिस्से में चाहिए काला



यह देवता जैसा क्या बना दिया जनाब
इसके बजाय बनाओ कोई सुंदर भूदृश्य
कोई पहाड़, कोई नदी



अब नदी को स्त्री जैसी क्यों बना रहे हो तुम
अरे, यह तो गंगा मैया हैं
इन्हें ठीक से कपड़े क्यों नहीं पहनाये
कर्पूर धवल करो इनकी साड़ी का रंग


कहाँ से आ रही है ये आवाज
इधर-उधर देखता है चित्रकार
कहीं कोई तो नहीं है
कहीं मेरा मन ही तो नहीं दे रहा ये निर्देश



पर मन के पीछे जो डर है
और डर के पीछे जो कैडर है
जो सीधे-सीधे नहीं दे रहा है मुझे धमकी या हिदायत
उसके खिलाफ कैसे करूं शिक़ायत?

- अरुण आदित्य

Monday, January 25, 2010

जब इस तरह घना हो कोहरा




'कोहरा 'कविता द पब्लिक एजेंडा मैगजीन के ताजा अंक में छपी है। द पब्लिक एजेंडा से हिंदी के दो सुप्रसिद्ध कवि जुड़े हुए हैं। इसके संपादक मंगलेश डबराल और साहित्य संपादक मदन कश्यप हैं।

कोहरा


कई दिनों से छाया हुआ है कोहरा घना
कंपकंपाती ठंड और सूरज का कहीं अता पता नहीं
जहां तक नजर जाए बस धुआं ही धुआं
और धुएं में उलझे हुए जलविंदु अतिसूक्ष्म

जरा सी दूर की चीज भी नजर नहीं आ रही साफ-साफ
टीवी अखबार से ही पता चलता है
कि क्या हो रहा है हमारे आस-पास

45 रेलगाड़ी से कट मरे
54 सड़क दुर्घटनाओं में
140 ठंड से
अलग-अलग कारणों से मरे नजर आते हैं ये 239 लोग
पर वास्तव में तो ये कोहरा ही है इनकी मौत का जिम्मेदार

इनके अलावा और कितने लोग
और कितनी चीजें हुई हैं इस कोहरे की शिकार
इसका हिसाब तो मीडिया भी कैसे दे सकता है
जो स्वयं है इस धुंध की चपेट में

जब इस तरह घना हो तो कोहरे में देखते हुए
सिर्फ कोहरे को ही देखा जा सकता है
और उसे भी बहुत दूर तक कहां देख पाते हैं हम
थोड़ी दूर का कोहरा
दिखने ही नहीं देता बहुत दूर के कोहरे को
और बहुत पास का कोहरा भी कहां देख पाते हैं हम

घने से घने कोहरे में भी
हम साफ-साफ देख लेते हैं अपने हाथ-पांव
इसलिए लगता है
कि एक कोहरा मुक्त वृत्त में है हमारी उपस्थिति
जबकि हकीकत में इस वृत्त में भी
होता है कोहरा उतना ही घना
कि दस गज दूर खड़ा मनुष्य भी नहीं देख सकता हमें
ठीक उसी तरह जैसे उसे नहीं देख पाते हैं हम

इस घने कोहरे में
जब जरा से फासले पर खड़ा मूर्त मनुष्य ही नहीं दिखता मनुष्य को
तो मनुष्यता जैसी अमूर्त चीज के बारे में क्या कहें?

महर्षि पराशर !
आपने अपने रति-सुख के लिए
रचा था जो कोहरा
देखो, कितना कोहराम मचा है उसके कारण

इस बात से पता नहीं तुम खुश होगे या दुखी
कि धुंध रचने के मामले में
तुम्हारे वंशज भी कुछ कम नहीं
अपने स्वार्थ के लिए
और कभी-कभी तो सिर्फ चुहल के लिए ही
रच देते हैं कोहरा ऐसा खूबसूरत
कि उसमें भटकता हुआ मनुष्य
भूल जाता है धूप-ताप और रोशनी की जरूरत

भूल ही नहीं जाता बल्कि कभी-कभी तो
उसे अखरने भी लगती हैं ये चीजें
जो करती हैं इस मनोरम धुंध का प्रतिरोध।

- अरुण आदित्य

चित्र यहाँ से साभार

Monday, August 3, 2009

कारगिल : तीन कवितायें, तीन किस्से



1999 की बरसात के दिन थे।
युद्ध के काले बादल बरसकर छंट चुके थे। मगर चुनावी युद्ध के बादल जनता की उम्मीदों पर बरस पडऩे को बेताब थे। चुनाव की रिपोर्टिंग के सिलसिले में उस दिन मैं खरगोन जिले में था। शाम को कहानीकार भालचंद्र जोशी के घर पर जुटान हुआ। संयोग से वसुधा के सहयोगी संपादक और कवि राजेंद्र शर्मा भी उस दिन खरगोन में ही थे। कुछ और मित्र जुट गए और भालचंद्र के घर पर ही इन कविताओं का पहला पाठ हुआ।
ये कविताएं इंदौर से खरगोन जाते हुए रास्ते में लिखी गई थीं। उसी राइटिंग पैड पर, जिस पर मैं रास्ते भर निमाड़ क्षेत्र के चुनावी गुणा भाग दर्ज करता आ रहा था। उन दिनों मेरे पास दैनिक भास्कर इंदौर में फीचर प्रभाग की जिम्मेदारी थी। और चुनाव डेस्क का अतिरिक्त प्रभार भी था। सो व्यस्तता के उन दिनों में कारगिल युद्ध को लेकर फैले उन्माद के बीच हर तीसरे दिन कोई न कोई तुक्कड़ कवि कोई तुकबंदी लेकर हाजिर हो जाता, मसलन 'लाहौर में गाड़ देंगे तिरंगा और शरीफ को टांग देंगे करके नंगा।' कोई अगर कह देता कि भइया यह कविता नहीं तो वहीं पर एक और कारगिल युद्ध करने को उतारू हो जाते। एक-दो लोगों ने तो सीधे-सीधे चुनौती दे डाली कि तुम्हीं कोई कविता लिखकर बता दो कि युद्ध पर ऐसे नहीं तो कैसे लिखना चाहिए। तो इन तीनों कविताओं का लिखा जाना एक तरह से उस सब को एक रचनात्मक जवाब था।
खरगोन में भालचंद जी के घर ये कविताएं सुनने के बाद राजेंद्र शर्मा ने कहा, पैड से ये पन्ने निकालकर मुझे दे दो। वसुधा का अंक कल-परसों में प्रेस में जाने वाला है, उसमें विशेष उल्लेख के साथ देना चाहता हूं। इसी अंक में इनका जाना बेहद जरूरी है। मैंने कहा कि यह फस्र्ट ड्राफ्ट है और अभी इस पर कुछ काम होना बाकी है। परसों मैं इंदौर पहुंचकर कोरियर कर दूंगा। लेकिन परसों कहां कभी आता है। इंदौर पहुंचकर मैं अपने काम-काज में लग गया और ध्यान ही नहीं रहा कि कविताओं को फेयर करके भेजना भी है। फिर चौथे-पांचवें दिन राजेंद्र जी का फोन आया, तुमने अभी तक कविताएं भेजी नहीं, मैंने अंक रोक रखा है।' सो उसी दिन इन्हें फेयर करके रवाना किया गया। अगले हफ्ते वसुधा का वह अंक हमारे हाथ में था। अंक की शुरुआत में ही कारगिल प्रसंग के तहत विशेष उल्लेख के साथ ये कविताएं और कैरन हेडाक के स्केच छपे थे।
दूसरा किस्सा
रात 11 बजे होंगे। अचानक फोन की घंटी बजती है। मैंने उठाकर जैसे ही कहा- हलो, उस तरफ से आवाज आई-
'गोली मेरी और चीख मेरे भाई की
फिर बधाइयां क्यों बटोर रहे हैं बांके बिहारी मास्साब?
ये किस कवि की पंक्तियां हैं?' उस तरफ चंद्रकांत देवताले जी थे।
मैंने निहायत संकोच के साथ कहा कहा, 'हैं तो मेरी ही, पर कुछ गड़बड़ तो नहीं है?'
देवताले जी बोले, 'वसुधा का अंक आ गया है। तुम्हें बहुत-बहुत बधाई, तीनों कविताएं बहुत अच्छी हैं। इतनी सादगी से ऐसी गहरी बात कहने वाले बहुत कम हैं। आज ऐसी कविताओं की बहुत जरूरत है।'
'ऐसी कविताओं की बहुत जरूरत है,' यह सुनकर मुझे लगा जैसे कोई मेडल मिल गया हो, युद्ध लड़े बिना ही।

तो आप भी वसुधा-45-46 से साभार इन कविताओं को पढ़ें। और हां, तीसरा किस्सा इन कविताओं को पढ़ लेने के बाद।




अलक्षित

अभी-अभी जिस दुश्मन को निशाना बनाकर
एक गोली चलाई है मैंने
गोली चलने और उसकी चीख के बीच
कुछ पल के लिए मुझे उसका चेहरा
बिलकुल अपने छोटे भाई महेश जैसा लगा
जिस पर सन् 1973 में
जब मैं आठवीं का छात्र था और वह छठीं का
इसी तरह गोली चलाई थी मैंने
स्कूल में खेले जा रहे बंग-मुक्ति नाटक में
मैं भारतीय सैनिक बना था और वह पाकिस्तानी

बंदूक नकली थी पर भाई की चीख इतनी असली
कि भीतर तक कांप गया था मैं
लेकिन तालियों की गडग़ड़ाहट के बीच
जिस तरह नजर अंदाज कर दी जाती हैं बहुत सी चीजें
अलक्षित रह गया था मेरा कांप जाना

सब दे रहे थे बांके बिहारी मास्साब को बधाई
जो इस नाटक के निर्देशक थे
और जिन्होंने कुछ तुकबंदियां लिखी थीं जिन्हें कविता मान
मुहावरे की भाषा में लोग उन्हें कवि हृदय कहते थे

नाटक खत्म होने के बाद
गदगद भाव से बधाइयां ले रहे थे बांके बिहारी मास्साब
और तेरह साल का बच्चा मैं, सोच रहा था
कि गोली मेरी और चीख मेरे भाई की
फिर बधाइयां क्यों ले रहे हैं बांके बिहारी मास्साब

अभी-अभी जब असली गोली चलाई है मैंने
तो मरने वाले के चेहरे में अपने भाई की सूरत देख
एक पल के लिए फिर कांप गया हूं मैं
पर मुझे पता है कि इस बार भी अलक्षित ही रह जाएगा
मेरा यह कांप जाना

दर्शक दीर्घा में बैठे लोग मेरे इस शौर्य प्रदर्शन पर
तालियां बजा रहे होंगे
और बधाइयां बटोर रहे होंगे कोई और बांके बिहारी मास्साब।


दुश्मन के चेहरे में

वह आदमी जो उस तरफ बंकर में से जरा सी मुंडी निकाल
बाइनोकुलर में आंखें गड़ा देख रहा है मेरी ओर
उसकी मूंछे बिलकुल मेरे पिता जी की मूंछों जैसी हैं
खूब घनी काली और झबरीली
किंतु पिता जी की मूंछें तो अब काली नहीं
सन जैसे सफेद हो गए हैं उनके बाल
और पोपले हो गए हैं गाल दांतों के टूटने से
पर जब पिता जी सामने नहीं होते
और मैं उनके बारे में सोचता हूं
तो काली घनी मूंछों के साथ
उनका अठारह बीस साल पुराना चेहरा ही नजर आता है
जब मैं उनकी छाती पर बैठकर
उनकी मूंछों से खेलता था
खेलता कम था, मूंछों को नोचता और उखाड़ता ज्यादा था
जिसे देख मां हंसती थी
और हंसते हुए कहती थी-
बहुत चल चुका तुम्हारी मूंछों का रौब-दाब
अब इन्हें उखाड़ फेंकेगा मेरा बेटा
बरसों से नहीं सुनी मां की वो हंसी
पिता की मिल में हुई जिस दिन तालाबंदी
उसी दिन से मां के होठों पर भी लग गए ताले
जिनकी चाबी खोजता हुआ मैं
जैसे ही हुआ दसवीं पास
एक दिन बिना किसी को कुछ बताए भर्ती हो गया सेना में

पहली तनख्वाह से लेकर आज तक
हर माह भेजता रहा हूं पैसा
पर घर नहीं हो सका पहले जैसा

मेरे पालन-पोषण और पढ़ाई लिखाई के लिए
जो-जो चीजें बिकी या रेहन रखी गई थीं
एक-एक करके वे फिर आ गई हैं घर में
नहीं लौटी तो सिर्फ मां की हंसी
और पिता जी के चेहरे का रौब
छोटे भाई के ओवरसियर बनने और
मेरे विवाह जैसे शुभ प्रसंग भी
नहीं लौटा सके ये दोनों चीजें
मैं जिन्हें घर से आए पत्रों में ढूंढ़ता हूं हर बारा

आज ही मिले पत्र में लिखा है पिता जी ने-
तीन साल बाद छोटा घर आया है दस दिन के लिए
तुम भी आ जाते तो मुलाकात हो जाती
बहू भी बहुत याद करती है
और अपनी मां को तो तुम जानते ही हो
इस समय भी जब मैं लिख रहा हूं यह पत्र
उसकी आंखों से हो रही है बरसात

बाइनोकुलर से आंख हटा
जेब से पत्र निकालता हूं
इस पर लिखी है बीस दिन पहले की तारीख
यानी पत्र में जो इस समय है
वह तो बीत चुका है बीस दिन पहले
फिर ठीक इस समय क्या कर रही होगी मां
सोचता हूं तो दिखने लगता है एक धुंधला-सा दृश्य
मां बबलू को खिला रही है
और उसकी हरकतों में मेरे बचपन की छवियों को तलाशती हुई
अपनी आंखों की कोरों में उमड़ आई बूंदों को
टपकने के पहले ही सहेज रही है अपने आंचल में

पिता जी संध्या कर रहे हैं
और मेरी चिंता में बार-बार उचट रहा है उनका मन
पत्नी के बारे में सोचता हूं
तो सिर्फ दो डबडबाई आंखें नजर आती हैं
बार-बार सोचता हूं कि याद आए उसकी कोई रूमानी छवि
और हर बार नजर आती हैं दो डबडबाई आंखें

बहुत हो गई भावुकता
बुदबुदाते हुए पत्र को रखता हूं जेब में
और बाइनोकुलर में आंखें गड़ाकर
देखता हूं दुश्मन के बंकर की ओर

बंकर से झांक रहे चेहरे की मूंछें
बिलकुल पिताजी की मूंछों जैसी लग रही हैं
क्या उसे भी मेरे चेहरे में
दिख रही होगी ऐसी ही कोई आत्मीय पहचान?


स्वगत

खून जमा देने वाली इस बर्फानी घाटी में
किसके लिए लड़ रहा हूं मैं
पत्र में पूछा है तुमने
यह जो बहुत आसान सा लगने वाला सवाल
दुश्मन की गोलियों का जवाब देने से भी
ज्यादा कठिन है इसका जवाब

अगर किसी और ने पूछा होता यही प्रश्न
तो, सिर्फ अपने देश के लिए लड़ रहा हूं
गर्व से कहता सीना तान
पर तुम जो मेरे बारीक से बारीक झूठ को भी जाती हो ताड़
तुम्हारे सामने कैसे ले सकता हूं इस अर्धसत्य की आड़
देश के लिए लड़ रहा हूं यह हकीकत है लेकिन
कैसे कह दूं कि उनके लिए नहीं लड़ रहा मैं
जो मेरी जीत-हार की विसात पर खेल रहे सियासत की शतरंज
और कह भी दूं तो क्या फर्क पड़ेगा
जब कि जानता हूं इनमें से कोई न कोई
उठा ही लेगा मेरी जीत-हार या शहादत का लाभ

मेरा जवाब तो छोड़ो
तुम्हारे सवाल से ही मच सकता है बवाल
सरकार सुन ले तो कहे-
सेना का मनोबल गिराने वाला है यह प्रश्न
विपक्ष के हाथ पड़ जाए
तो वह इसे बटकर बनाए मजबूत रस्सी
और बांध दे सरकार के हाथ-पांव
इसी रस्सी से तुम्हारे लिए
फांसी का फंदा भी बना सकता है कोई

इसलिए तुम्हारे इस सवाल को
दिल की सात तहों के नीचे छिपाता हूं
और इसका जवाब देने से कतराता हूं।
- अरुण आदित्य

.................

तीसरा किस्सा
राजेंद्र नगर (इंदौर) का आपले वाचनालय। 14 सितंबर या उसके आस-पास की कोई तारीख। हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में कवि सम्मेलन था। मित्र प्रदीप मिश्र संचालन कर रहे थे। कारगिल युद्ध के बाद का ताजा-ताजा उल्लास-उन्माद था। वीर रस की कविताओं की बाढ़ थी। एक कवि ने मुशर्रफ की छाती पर तिरंगा फहराने जैसी कोई कविता इतने जोश से पढ़ी कि काफी देर तक तालियां गूंजती रहीं। वह एक दुबला पतला सा युवक था। प्रदीप ने उसके बाद मुझे कविता पाठ के लिए आमंत्रित किया। मैं यही कविताएं ले गया था पढऩे के लिए, लेकिन माहौल देखकर मेरा विश्वास डगमगा गया। लगा कि उल्लास-उन्माद के इस माहौल में इन कविताओं को कौन सुनेगा? मन में विचार आया कि कुछ प्रेम कविता वगैरह पढ़ देना चाहिए। प्रेम तो सदाबहार है। लेकिन जब डायस पर पहुंचा तो मन बदल गया। मैंने खुद से पूछा, क्या मुझे अपनी कविता पर भरोसा नहीं है? अगर आज इस उन्मादी माहौल में मैं इन्हें नहीं पढ़ सकता हूं, तो वह शुभ घड़ी कब आएगी जब इनका पाठ किया जाएगा। सो मैंने सोच लिया कि यही कविताएं पढ़ूंगा, चाहे लोग वाह-वाह कहें या हाय-हाय। मैंने थोड़ी सी भूमिका बांधी। उपस्थित श्रोताओं से सीधे सवाल किया, 'क्या हमें वीर रस की कविता लिखने का हक है? हम अपने जीवन में कितनी वीरता दिखा पाते हैं?' आज मुझे लगता है कि उस दिन मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था, लेकिन मैंने उस वीर रस के कवि की ओर इंगित करके कहा- 'अभी-अभी जो सज्जन मुशर्रफ की छाती पर तिरंगा फहराने की बात कर रहे थे, यही जब इस हाल के बाहर निकलेंगे तो गली का एक मरियल सा गुंडा भी अगर चाकू दिखा देगा तो अपने कपड़े तक उतार कर दे देंगे। चंद बरदाई जब पृथ्वीराज रासो लिखता था तो वह खुद युद्धक्षेत्र में मोर्चा भी लेता था। सच तो यह है कि मित्रो, युद्ध का मतलब हम समझ ही नहीं सकते हैं। इसका मतलब उस मां के दिल की धड़कन ही बता सकती है, जिसका बेटा युद्ध क्षेत्र में लड़ रहा होता है। युद्ध का मतलब वह पत्नी बता सकती है जो एक-एक पल गिनकर मोर्चे से पति के लौटने का इंतजार कर रही है। उस बाप से पूछो जिसके हंसते मुस्कराते बेटे की जगह उसका ताबूत अभी-अभी अभी आया है। मित्रो, मैं जो पढऩे जा रहा हूं वह कविता नहीं एक सैनिक के मन के तीन पन्ने हैं। अगर इन पन्नों को पढ़कर आपके मन में जरा भी उथल-पुथल मचे तो मैं अपनी मेहनत सफल समझूंगा।'
इसके बाद लोगों ने जिस धैर्य से इन कविताओं को सुना और बाद में जिस तरह की प्रतिक्रियाएं मिलीं, उससे कविता पर मेरा विश्वास और दृढ़ हो गया।
मित्रो, मैं जानता हूं ये बहुत साधारण कविताएं हैं और उससे भी साधारण ये किस्से हैं। पर इन में कुछ ऐसा है जो कविता पर मेरे विश्वास को दृढ़ करता है। आपका क्या कहना है...

Wednesday, December 10, 2008

जो किसी की प्यास बुझाना चाहते हैं


लोटे


देवताओं को जल चढ़ाने के काम आते रहे कुछ

कुछ ने वजू कराने में ढूंढ़ी अपनी सार्थकता

प्यासे होंठों का स्पर्श पाकर ही खुश रहे कुछ

कुछ को मनुष्यों ने नहाने या नित्यकर्म का पात्र बना लिया

बहुत समय तक अपनी अपनी भूमिका में सुपात्र बने रहे सब


पर आजकल बदल गई हैं इनकी भूमिकाएं

जल चढ़ाने और वजू कराने वाले लोटे

अब अकसर लड़ते झगड़ते हैं

और बाद में शांति अपीलें जारी करते हैं

काफी सुखी हैं ये लोटे

पर सबसे ज्यादा सुखी हैं वे, जो बिना पेंदी के हैं
परेशान और दुखी हैं वे, जो किसी की प्यास बुझाना चाहते हैं

आजकल पात्रों की सूची से गायब होता जा रहा है उनका नाम

जग -मग के इस दौर में लोटों का क्या काम?


राष्ट्रीय लुढ़कन के इस दौर में

जब गेंद की तरह इस पाले से उस पाले में

लुढ़क रही हैं अंतरात्माएं

कितना आसान है वोटों का लोटों में तब्दील हो जाना

ये जो आसानी है

कितनी बड़ी परेशानी है ।


- अरुण आदित्य

(मध्य प्रदेश साहित्य परिषद की पत्रिका साक्षात्कार में प्रकाशित। हिमाचल के युवा कवि प्रकाश बादल इस कविता को यहां देने के लिए बार-बार आग्रह करते रहे हैं। )

Friday, October 24, 2008

पहाड़ झांकता है नदी में


मनाली

पहाड़ झांकता है नदी में
और उसे सिर के बल खड़ा कर देती है नदी
लहरों की लय पर
हिलाती-डुलाती, नचाती-कंपकंपाती है उसे

पानी में कांपते अपने अक्स को देखकर भी
कितना शांत निश्चल है पहाड़
हम आंकते हैं पहाड़ की दृढ़ता
और पहाड़ झांकता है अपने मन में -
अरे मुझ अचल में इतनी हलचल
सोचता है और मन ही मन बुदबुदाता है-
किसी नदी के मन में झांकने की हिम्मत करे कोई पहाड़


-अरुण आदित्य
यह कविता मनाली शीर्षक कविता शृंखला की छह कविताओं में से एक है। वागर्थ में प्रकाशित।
साथ में प्रकाशित पेंटिंग विश्वप्रसिद्ध चित्रकार निकोलाई रोरिक की है। पेंटिंग का शीर्षक है-शी हू लीड्स।

Monday, September 29, 2008

विष्णु नागर की कविता, रवीन्द्र व्यास की पेंटिंग



नागर जी की ये कविता जब पहली बार पढ़ी तो सचमुच गागर में सागर भरने वाला मुहावरा याद आ गया था। और जब रवीन्द्र की ये पेंटिंग देखी तो फ़िर नागर जी की ये कविता याद आई।रविवार शाम कुछ पुराने मित्रों के साथ नागर जी से आत्मीय मुलाकात हुई। मैंने पूछा कि आपकी कविता अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर दूँ। बोले , बेहिचक डाल दो। रवीन्द्र पहले ही कह चुके हैं कि उनकी पेंटिंग्स का उपयोग करने की पूरी छूट है। तो लीजिये पेश है यह जबरदस्त जुगलबंदी।



जहाँ हरा होगा



जहाँ हरा होगा


वहां पीला भी होगा


गुलाबी भी होगा


वहां गंध भी होगी


उसे दूर-दूर ले जाती हवा भी होगी


और आदमी भी वहां से दूर नहीं होगा।

- विष्णु नागर

Sunday, June 29, 2008

इस आग के पीछे क्यों पड़े हैं लोग


विचार मर चुका है। विचार मर नहीं सकता है। विचार जिंदाबाद। विचार अमर रहे। पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में जब विचार(धारा) का अंत होने और न होने को लेकर इस तरह का विमर्श जोरों पर था, उसी दौरान इस कविता का जन्म हुआ था। उन दिनों विचार के साथ ही कविता के अंत की भी उद्घोषणाएं की जा रही थीं। यह दीगर बात है कि नई शताब्दी में भी न विचार मरा है न कविता, पर यह जरूर है कि दोनों के जिंदा रहने की शर्तें लगातार विकट होती गई हैं। यह कविता दस साल पूर्व मध्य प्रदेश साहित्य परिषद की पत्रिका साक्षात्कार के जनवरी 1998 के अंक में छपी थी।

और एक छोटी सी सूचना : इसी कविता के साथ कुछ समय के लिए ब्लागिंग से अवकाश ले रहा हूं। सात साल से एक उपन्यास अटका पड़ा है। प्रकाशक का दबाव है कि अगले दो तीन महीने में स्क्रिप्ट दे दूं। मित्रों का भी यही कहना है कि इसे ठिकाने लगाओ, तभी कुछ नया लिख पाओगे। तो दोस्तो, उपन्यास को ठिकाने लगाकर जैसे ही कुछ नया लिखा, हाजिर हो जाऊंगा। तब तक के लिए यह आग आपके पास छोड़कर जा रहा हूं।


इस आग के पीछे क्यों पड़े हैं लोग


कुछ दिनों पहले मिला मुझे एक विचार

आग का एक सुर्ख गोला

सुबह के सूरज की तरह दहकता हुआ बिलकुल लाल

और तब से इसे दिल में छुपाए घूम रहा हूं

चोरों, बटमारों, झूठे यारों और दुनियादारों से बचाता हुआ


सोचता हूं कि सबके सब इस आग के पीछे क्यों पड़े हैं


उस दोस्त का क्या करूं

जो इसे गुलाब का फूल समझ

अपनी प्रेमिका के जूड़े में खोंस देना चाहता है


एक चटोरी लड़की इसे लाल टमाटर समझ

दोस्ती के एवज में मांग बैठी है

वह इसकी चटनी बना मूंग के भजिए के साथ खाना चाहती है


माननीय नगर सेठ इसे मूंगा समझ

अपनी अंगूठी में जडऩा चाहते हैं

ज्योतिषियों के अनुसार मूंगा ही बचा सकता है उनका भविष्य


राजा को भी जरूरत आ पड़ी है इसी चीज की

मचल गया है छोटा राजकुमार इसे लाल गेंद समझ

लिहाजा, राजा के सिपाही मेरी तलाश में हैं


और भी कई लोग अलग-अलग कारणों से

मुझसे छीन लेना चाहते हैं यह आग

हिरन की कस्तूरी सरीखी हो गई है यह चीज

कि इसके लिए कत्ल तक किया जा सकता हूं मैं

फिर इतनी खतरनाक चीज को

आखिर किसलिए दिल में छुपाए घूम रहा हूं मैं


दरअसल मैं इसे

उस बुढिय़ा के ठंडे चूल्हे में डालना चाहता हूं

जो सारी दुनिया के लिए भात का अदहन चढ़ाए बैठी है

और सदियों से कर रही है इसी आग का इंतजार।

- अरुण आदित्य

(साक्षात्कार, जनवरी 1998 में प्रकाशित)

Saturday, June 21, 2008

तेजी से सरकती कास्टिंग की पंक्तियों में


बाबा नागार्जुन ने 6 अगस्त 1992 को उनकी डायरी में लिखा था- 'प्रिय हरि मृदुल, तुम्हारी रचनाओं में बेहद ताजगी मिली। आप बहुत आगे जाओगे, सुदूर निकलोगे।' और हरि मृदुल ने बाबा की भविष्यवाणी को गलत नहीं साबित होने दिया है। हाल ही में प्रकाशित हरि के कविता संग्रह 'सफेदी में छुपा काला की कविताएं बाबा की बातों की तसदीक करती हैं। इसी संग्रह पर हरि को हेमंत स्मृति सम्मान भी मिला है। संग्रह की भूमिका में निदा फाजली ने लिखा है, 'इनके रचना संसार के केंद्र में जो दृष्टि उभरती है जो उन्हें उस कबीले से जोड़ती है, जिसका हिस्सा समाज में तीन चौथाई है। यहां सड़क, पानी, रोशनी और अनाज की ओर दौड़ता हुआ वह इंसान है, जो आज का सच्चा हिंदुस्तान है।' हरि मृदुल कवि के साथ-साथ पत्रकार और सुपरिचित फिल्म समीक्षक भी हैं। आजकल अमर उजाला के मुंबई ब्यूरो में कार्यरत हैं। पेश हैं उनकी दो कविताएं जो उनकी कविता की रेंज की एक झलक देती हैं ...

नाम तुम्हारा
जुहू बीच की नम रेत पर
नाम तुम्हारा लिखता हूं
मिटाता नहीं
लहरों को यह काम सौंप रखा है
मैं खड़ा रहता हूं जैसे पहरेदार।

स्पॉट बॉय

स्पॉट बॉय ने फिल्म रिलीज के पहले दिन के
पहले शो का टिकट लिया
बड़े गौर से निहारा हजारों किलोमीटर
दूर देश-विदेश की उन जगहों को
जो बड़ी बारीकी से अभी तक उसकी स्मृति में थीं
परदे पर एकदम अलग अंदाज में उन्हें देखकर
वह थोड़ा विस्मित हुआ लेकिन आश्चर्यचकित कतई नहीं

उसे हीरोइन का दुख देखकर
ग्लिसरीन की एक बड़ी सी शीशी याद आई
हीरो की बहादुरी देखकर नकली बंदूक
हीरोइन के बाप का गुस्सा देखकर निर्देशक की फूहड़ डांट
और हीरो के बाप का झुंझलाना देखकर
प्रोड्यूसर का बार-बार सिर पीटना

परदे पर बम विस्फोट और खून ही खून देखकर उसने
एक बार माथा जरूर पकड़ा
फिर बिना अगल-बगल बैठे लोगों की परवाह किए
अपनी सीट के नीचे थूक दिया

हीरो-हीरोइन की अदायगी पर उसका कोई ध्यान नहीं था
बल्कि संवाद, गाने या किसी खास भाव-भंगिमा पर
तालियां बजते देख उसे बड़ी कोफ्त हुई
अलबत्ता कुछ एक्सट्रा कलाकारों को उसने
खास तौर पर देखना चाहा
जो हीरोइन के साथ लेकिन पीछे की तरफ नाची थीं
और उन्हें, जो हीरो के हाथों पिटते-पिटते
सचमुच घायल हो गए थे

फिल्म खत्म होते-होते उसने परदे पर
बड़ी सावधानी से अपनी नजर गड़ाई
और तीन घंटे की अवधि में पहली बार उसके चेहरे पर
संतोष पाया गया
तेजी से सरकती कास्टिंग की पंक्तियों में
वह सुरक्षित था अपने साथियों के साथ
स्पॉट बॉयज- भोला, आसिफ, नरोत्तम, जोसफ, बब्बन
और नारिया उर्फ नारायण।
- हरि मृदुल

Wednesday, June 4, 2008

हवा चूमती है फूल को



अन्योन्याश्रित


हवा चूमती है फूल को

और फिर नहीं रह जाती है वही हवा

कि उसके हर झोंके पर

फूल ने लगा दी है अपनी मुहर


और फूल भी कहां रह गया है वही फूल

कि उसकी एक-एक पंखुड़ी पर

हवा ने लिख दी है सिहरन


फूल के होने से महक उठी है हवा

हवा के होने से दूर-दूर तक फैल रही है फूल की खुशबू


इस तरह एक के स्पर्श ने

किस तरह सार्थक कर दिया है दूसरे का होना।


- अरुण आदित्य

(प्रगतिशील वसुधा के अंक 73 में प्रकाशित। स्वर्गीय हरिशंकर परसाई द्वारा संस्थापित इस पत्रिका के प्रधान संपादक कमला प्रसाद और संपादक स्वयं प्रकाश व राजेंद्र शर्मा हैं। पता है- कमला प्रसाद, एम-31, निराला नगर, दुष्यंत मार्ग, भदभदा रोड, भोपाल

और हां इस कविता के साथ फूल का सुंदर-सा जो चित्र लगा है, उसके छायाकार इंदौर के युवा कवि प्रदीप कांत हैं। प्रदीप केट में वैज्ञानिक अधिकारी हैं। शायरी का शौक पुराना था, छायाकारी का चस्का अभी नया-नया लगा है। प्रदीप ने पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या पर कल जब यह फोटो भेजा तो मुझे अपनी यह पुरानी प्रेम-कविता याद आ गई। फिर सोचा कि आप सब को पढ़वा दिया जाए।


Friday, May 30, 2008

ठोकर तो पत्थर को भी लगती है


ठोकर


हम अपनी रौ में जा रहे होते हैं

अचानक किसी पत्थर की ठोकर लगती है

और एक टीस सी उठती है

जो पैर के अंगूठे से शुरू होकर झनझना देती है दिमाग तक को


एक झनझनाहट पत्थर में भी उठती है

और हमारे पैर की चोट खाया हुआ हत-मान वह

शर्म से लुढ़क जाता है एक ओर


एक पल रुककर हम देखते हैं ठोकर खाया हुआ अपना अंगूठा

पत्थर को कोसते हुए सहलाते हैं अपना पांव

और पत्थर के आहत स्वाभिमान को सहलाती है पृथ्वी

झाड़ती है भय संकोच की धूल और ला खड़ा करती है उसे

किसी और के गुरूर की राह में।

-अरुण आदित्य

(पल-प्रतिपल के सितंबर-दिसंबर2 000 अंक में प्रकाशित। पल प्रतिपल का पता है : पल प्रतिपल, एससीएफ-267, सेक्टर-16, पंचकूला। देश निर्मोही इसके संपादक हैं। )

Thursday, March 27, 2008

प्रताप सोमवंशी की कवितायें

हमारे मित्र और अमर उजाला, कानपुर के संपादक प्रताप सोमवंशी संवेदनशील कवि हैं। उनकी ये दोनों कवितायें 1993 में जनसत्ता सबरंग के दीवाली विशेषांक में छपी थीं। उसी विशेषांक में मेरी भी एक कविता 'बम्बई इस गाँव के इतने करीब छपी ' थी। इन्ही कविताओं से मैंने प्रताप के कवि को पहली बार पहचाना था। आप देखेंगे कि छपने के चौदह साल बाद भी ये कवितायें कितनी प्रासंगिक हैं। हाल ही में प्रताप को के सी कुलिश अंतरराष्ट्रीय मीडिया मेरिट अवार्ड मिला है। बधाई ।

खाली है


कितना प्रतिभाशाली है

काम नहीं है, खाली है


केवल फल से मतलब है

कैसे कह दूँ माली है


थोड़ा और दहेज़ जुटा

बिटिया तेरी काली है


तुझसे कोई बैर न था

फ़िर क्यों आँख घुमा ली है


फल आने का मौसम है

पेड़ बेचारा खाली है


बाजीगर


लफ्जों का बाजीगर है

कब्जे में पूरा घर है


तेरा हाँ..हाँ..हाँ करना

लालच होगा, या डर है


तू मुझसे क्या छीनेगा

धरती अपना बिस्तर है


उससे कैसी उम्मीदें

पैदाइश से बेपर है


देश हुआ सब्जी मंडी

लाभ में ऊंचा स्वर है


- प्रताप सोमवंशी






Wednesday, March 12, 2008

GAZA का मुसलमां हो या KASHMIR का हिंदू

ये तेरा अँधेरा है, वो मेरा अँधेरा

हर दिल में उतर जायेगी जज्बात की तरह
हो जाए अगर शायरी भी बात की तरह

सूरज है दफ्न फातिहा पढ़ता है अँधेरा
आए न कोई रात यूं गुजरात की तरह

महंगा है इतना सच कि खरीदार नहीं हैं
बाज़ार में कोई कहाँ सुकरात की तरह

गाज़ा का मुसलमां हो या कश्मीर का हिंदू
हर मौत है, इंसानियत की मात की तरह

ये तेरा अँधेरा है, वो मेरा अँधेरा
बांटो न यूं ज़ख्मों को जात-पात की तरह

इस शहर के पत्थर भी होते हैं तर बतर
बरसो तो जरा टूट के बरसात की तरह

सूरज का रंग लाल और लाल दिखेगा
लिखने लगोगे रात को जब रात की तरह

-अरुण आदित्य

Saturday, March 1, 2008

मेरे मठ में मेरा हठ है


सबका अपना-अपना मठ है

मेरे मठ में मेरा हठ है

मैं, मैं, मैं, मैं मंत्र हमारा

मैं की खातिर तंत्र हमारा

मेरा मैं है मुझको प्यारा

मैं अपने ही मैं से हारा

मेरे मैं की जय है, जय है

मेरा मैं ही मेरा भय है

मेरे मैं को आबाद करो

मुझको मैं से आजाद करो

मैं साधू , मेरा मैं शठ है

फ़िर भी मैं की खातिर हठ है।


- अरुण आदित्य

Saturday, February 23, 2008

चोखेर बाली और चोखेर अश्रु

शिल्प , शिल्पा, शिल्पायें

कश्मीर से कन्या कुमारी तक सजा है तोरण द्वार
पुष्प अक्षत बरसाए जा रहे हैं लगातार
वो आ रही है राष्ट्रीय गौरव की प्रतिमूर्ति
सफलता के गरुण पर सवार
हवा में चुम्बन उछालती जुल्फें लहराती
जताती देश वासियों के प्रति हार्दिक आभार

महात्मा गाँधी ने शुरू की थी जो लड़ाई
नेल्सन मंडेला जिसके लिए बरसों रहे जेल में
हमारी चित्र-पट नायिका ने जीत लिया उसे खेल-खेल में
नस्लभेद का चक्रव्यूह अपने आंसुओं से भेद
उसने बढ़ाया है देश का मान
उसके स्वागत में गाए जा रहे स्वस्तिगान

भारतीय संस्कृति की वह नई ब्रांड अम्बेस्डर
उसने दिखा दी है ब्रांड इंडिया की ताकत
कि झुक कर माफ़ी मांग रहा है इंग्लिस्तान
वाकई उसके आंसुओं में है बहुत जान
सलोने गालों पर कितने करीने से सजे हैं
मोतिओं की तरह झिलमिलाते

जिन्हें इतनी नजाकत से पोंछती है वह
कि लगता है आंसू पोंछना भी एक कला है


सारे चैनल्स पर छाया है उसका अश्रु-वैभव
पर चैनल्स के बाहर भी एक ऐसी दुनिया है
जहाँ नस्लभेद का होना ओर न होना
दोनों का मतलब है रोना और रोना


हमारे पड़ोस में एक शिल्पा रो रही है
कि उसे घुसने नहीं दिया ठाकुर जी के मन्दिर में
उससे भी ज्यादा करुण स्वर में रो रही है एक और शिल्पा
कि अब वह ठाकुर के लिए अछूत नहीं रही

बार-बार रोना न पड़े इसलिए एक शिल्पा
मार दी गई माँ की कोख में
एक और शिल्पा जो नहीं मरी तमाम प्रयासों के बावजूद
अब मार खा रही है
कि क्यों खा गई भाई के लिए रखी रोटी


और भी हैं हजारों हजार शिल्पायें
जिल्लत और किल्लत का शिकार
अपनी नियति पर रोती जार-जार
पर किसी काम का नहीं है उनका रोना
कि उनके पास नहीं है रोने का शिल्प


उनके आंसुओं की चर्चा नहीं होती कहीं
कि वे फकत आंसू हैं मोती नहीं

- अरुण आदित्य

वसुधा के अंक-७३ में प्रकाशित। प्रगतिशील लेखक संघ की पत्रिका वसुधा के प्रधान संपादक कमला प्रसाद और संपादक राजेंद्र शर्मा और स्वयं प्रकाश हैं। पता है-
एम-३१, निराला नगर, भदभदा रोड, भोपाल - ४६२००३







Sunday, February 3, 2008

फरवरी

विदा होती बेटी
जैसे पलट-पलट कर देखती है माँ की देहरी
जाते-जाते अचानक ठिठक कर देखती है ठंड
और कांप उठते हैं दिन- रात
जैसे कांपता है मां का हृदय बेटी की सिसकियों के साथ

कांपते समय को पीछे छोड़ आगे बढ़ती है ठंड
और मौसम वसंत हो जाता है
जिसकी हवाओं पर
बर्फ के फाहों की तरह जमा हैं जनवरी की स्मृतियाँ
जिन्हें हौले-हौले पिघला रही है मार्च के आने की उम्मीद

जनवरी के जाने और मार्च के आने के बीच
यह जो अलग सी ठंड है, और अलग सी गरमी है
और यह जो न ठंड है, न गरमी है
जिसे न तीस चाहिए न इकतीस
उनतीस या अट्ठाईस दिन पाकर भी
जिसकी झोली भरी है
वही तो फरवरी है

ये फकत एक माह नहीं
जीने की राह है प्यारे

-अरुण आदित्य
( गौरीनाथ द्वारा संपादित साहित्यिक पत्रिका बया में प्रकाशित)