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Friday, January 20, 2012

ऐसी एक कविता



जिसे टेडी बियर की तरह उछाल-उछाल
खेल सके एक बच्चा
जिसे बच्चे की किलकारी समझ
हुलस उठे एक मां

जो प्रतीक्षालय की किसी पुरानी काठ-बेंच की तरह
इतनी खुरदरी हो, इतनी धूलभरी
कि उसे गमछे से पोछ नि:संकोच
दो घड़ी पीठ टिका सके कोई लस्त बूढ़ा पथिक

जो रणक्षेत्र में घायल सैनिक को याद आए
मां के दुलार या प्रेयसी के प्यार की तरह
जो योद्धा की तलवार की तरह हो धारदार
जो धार पर रखी हुई गर्दन की तरह हो
खून से सनी, फिर भी तनी
पता नहीं कब लिख सकूंगा ऐसी एक कविता
आज तक तो नहीं बनी।

- अरुण आदित्य

शुक्रवार की साहित्य वार्षिकी से साभार

Thursday, July 8, 2010

झोपड़ी के हिस्से में किस्से


यह कविता साहित्यिक पत्रिका हंस के जुलाई अंक में प्रकाशित हुई है। कई मित्रों ने वहां पढ़ लिया होगा, जो न पढ़ सके हों , उनके इसे लिए इसे यहाँ फिर से प्रकाशित किया जा रहा है।

झोपड़ी के हिस्से में किस्से

पता नहीं झोपड़ी का दर्द जानने की आकांक्षा थी
या महज एक शगल
कि झोपड़ी में एक रात गुजारने को आ गया महल

झोपड़ी फूली नहीं समा रही
उमंग से भर गया है जंग लगा हैंडपंप
प्यार से रंभा रही है मरियल गाय
कदम चूम कर धन्य है उखड़ा हुआ खड़ंजा

अपनी किस्मत पर इतरा रही है टुटही थाली
गर्व से तन गई है झिलंगा खटिया
अभिमान से फूल गई है कथरी
अति उत्साह में कुछ ज्यादा ही तेल पी रही है ढिबरी

आग से ठिठोली कर रहा है चूल्हा
उम्मीद से नाचने लगी है चक्की

ऐसे खुशगवार माहौल में पुलकित महल ने
हुलसित झोपड़ी से पूछा, बताओ तुम्हें कोई दुख तो नहीं
झोपड़ी को लगा कि उसके दुख से बड़ा है आज का यह सुख
और उसने यह भी सुना था कि महल के आने से
अपने आप ही दूर हो जाते हैं सब दुख

महल ने फिर पूछा
फिर-फिर पूछा, इस राज में कोई तकलीफ तो नहीं तुम्हें
वह कहना चाहती थी कि कई दिनों से ठंडा पड़ा है चूल्हा
पर चूल्हे की उमंग देख उसे लगा कि ऐसा कहना
रंग में भंग करने जैसा अपराध होगा


सवाल पूछते-पूछते थक गया महल
थके हुए महल को गर्व से तनी खटिया
और मान से फूली कथरी पर मिला चेंज
और रोज से ज्यादा आई नींद
इधर झोपड़ी जागती रही रात भर
कि उसके सोने से कहीं सो न जाए उम्मीद

सुबह महल झोपड़ी से निकला
और सबके देखते ही देखते खबर बन गया

झोपड़ी के हिस्से में अब सिर्फ किस्से हैं
जिन्हें वह आने-जाने वालों को रोक-रोककर सुनाती है
कि किस तरह महल ने यहां गुजारी थी एक रात

पर जब कोई नहीं सुनता उसकी बात
तो खड़ंजा हो जाता है उदास, हैंडपंप निराश
ढीली पड़ जाती है खटिया, लस्त हो जाती है कथरी
मद्धिम पड़ जाती है ढिबरी की लौ
सन्न हो जाते हैं चूल्हा-चक्की
और सब मिलकर झोपड़ी से कहते हैं
झोपडिय़ा दादी, सुनाओ जरा वह किस्सा
कि किस तरह महल ने गुजारी थी यहां एक रात।
- अरुण आदित्य

इलस्ट्रेशन : एस टी गिल, http://www.tocal.com/homestead/vandv/vv18.htm से साभार

Friday, February 26, 2010

डर के पीछे जो कैडर है


एम एफ हुसैन का आत्म निर्वासन हो, या तस्लीमा नसरीन का निर्वासन, सलमान रुश्दी के खिलाफ मौत का फतवा हो या सफदर हाशमी की हत्या...इनके जरिए फासीवादी शक्तियां सिर्फ इन व्यक्तियों को ही नहीं, अपने सोच से अलग सोच रखने वाले हर दिमाग को नियंत्रित करना चाहती हैं। वे बहुरंगी संस्कति में यकीन नहीं करते, पूरी दुनिया को एक ही रंग में रंग देना चाहते हैं। यह प्रवृत्ति नई नहीं है, लेकन हाल के वर्षों में यह और ज्यादा घातक हुई है। सृजन-संस्कृति पर इस प्रवृत्ति के भयावह प्रभाव को रेखांकित करती है यह कविता जो हरियाणा साहित्य अकादमी की पत्रिका हरिगंधा में 2008 में छपी थी। आज हुसैन के बहाने यह फिर प्रासंगिक लग रही है...


डर के पीछे जो कैडर है

यह केसरिया करो थोड़ा और गहरा
और यह हरा बिल्कुल हल्का
यह लाल रंग हटाओ यहाँ से
इसकी जगह कर दो काला
हमें तस्वीर के बड़े हिस्से में चाहिए काला



यह देवता जैसा क्या बना दिया जनाब
इसके बजाय बनाओ कोई सुंदर भूदृश्य
कोई पहाड़, कोई नदी



अब नदी को स्त्री जैसी क्यों बना रहे हो तुम
अरे, यह तो गंगा मैया हैं
इन्हें ठीक से कपड़े क्यों नहीं पहनाये
कर्पूर धवल करो इनकी साड़ी का रंग


कहाँ से आ रही है ये आवाज
इधर-उधर देखता है चित्रकार
कहीं कोई तो नहीं है
कहीं मेरा मन ही तो नहीं दे रहा ये निर्देश



पर मन के पीछे जो डर है
और डर के पीछे जो कैडर है
जो सीधे-सीधे नहीं दे रहा है मुझे धमकी या हिदायत
उसके खिलाफ कैसे करूं शिक़ायत?

- अरुण आदित्य

Monday, January 25, 2010

जब इस तरह घना हो कोहरा




'कोहरा 'कविता द पब्लिक एजेंडा मैगजीन के ताजा अंक में छपी है। द पब्लिक एजेंडा से हिंदी के दो सुप्रसिद्ध कवि जुड़े हुए हैं। इसके संपादक मंगलेश डबराल और साहित्य संपादक मदन कश्यप हैं।

कोहरा


कई दिनों से छाया हुआ है कोहरा घना
कंपकंपाती ठंड और सूरज का कहीं अता पता नहीं
जहां तक नजर जाए बस धुआं ही धुआं
और धुएं में उलझे हुए जलविंदु अतिसूक्ष्म

जरा सी दूर की चीज भी नजर नहीं आ रही साफ-साफ
टीवी अखबार से ही पता चलता है
कि क्या हो रहा है हमारे आस-पास

45 रेलगाड़ी से कट मरे
54 सड़क दुर्घटनाओं में
140 ठंड से
अलग-अलग कारणों से मरे नजर आते हैं ये 239 लोग
पर वास्तव में तो ये कोहरा ही है इनकी मौत का जिम्मेदार

इनके अलावा और कितने लोग
और कितनी चीजें हुई हैं इस कोहरे की शिकार
इसका हिसाब तो मीडिया भी कैसे दे सकता है
जो स्वयं है इस धुंध की चपेट में

जब इस तरह घना हो तो कोहरे में देखते हुए
सिर्फ कोहरे को ही देखा जा सकता है
और उसे भी बहुत दूर तक कहां देख पाते हैं हम
थोड़ी दूर का कोहरा
दिखने ही नहीं देता बहुत दूर के कोहरे को
और बहुत पास का कोहरा भी कहां देख पाते हैं हम

घने से घने कोहरे में भी
हम साफ-साफ देख लेते हैं अपने हाथ-पांव
इसलिए लगता है
कि एक कोहरा मुक्त वृत्त में है हमारी उपस्थिति
जबकि हकीकत में इस वृत्त में भी
होता है कोहरा उतना ही घना
कि दस गज दूर खड़ा मनुष्य भी नहीं देख सकता हमें
ठीक उसी तरह जैसे उसे नहीं देख पाते हैं हम

इस घने कोहरे में
जब जरा से फासले पर खड़ा मूर्त मनुष्य ही नहीं दिखता मनुष्य को
तो मनुष्यता जैसी अमूर्त चीज के बारे में क्या कहें?

महर्षि पराशर !
आपने अपने रति-सुख के लिए
रचा था जो कोहरा
देखो, कितना कोहराम मचा है उसके कारण

इस बात से पता नहीं तुम खुश होगे या दुखी
कि धुंध रचने के मामले में
तुम्हारे वंशज भी कुछ कम नहीं
अपने स्वार्थ के लिए
और कभी-कभी तो सिर्फ चुहल के लिए ही
रच देते हैं कोहरा ऐसा खूबसूरत
कि उसमें भटकता हुआ मनुष्य
भूल जाता है धूप-ताप और रोशनी की जरूरत

भूल ही नहीं जाता बल्कि कभी-कभी तो
उसे अखरने भी लगती हैं ये चीजें
जो करती हैं इस मनोरम धुंध का प्रतिरोध।

- अरुण आदित्य

चित्र यहाँ से साभार

Thursday, April 30, 2009

फूंकि फूंकि धरनी पग धारौ, महा कठिन है समौ अजोग


कल का दिन सूरदास को समर्पित रहा। सुबह साढ़े दस बजे सूर बाबा की जन्मस्थली सीही (फरीदाबाद) की रज को माथे लगाने का अवसर मिला। देश निर्मोही, डॉ. सुभाष और कई स्थानीय साहित्यकार साथ थे। सबने सीही में सूर स्मारक परिसर में महाकवि की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। उससे पहले वहां के एक भक्त ने हम सब का तिलक किया। स्मारक न्यास के प्रमुख ने बताया कि परिसर में एक पुस्तकालय खोलने की भी योजना है। जब भी कहीं पुस्तकालय खुलने की सूचना मिलती है मन उछल पड़ता है। सो कल दिन की शुरुआत बहुत अच्छी रही। इस सुखद शुरुआत के बाद साहित्यकारों का जत्था फरीदाबाद के मैगपाई टूरिस्ट सेंटर पहुंचा। वहां हरियाणा साहित्य अकादमी ने सूरदास की ५३१ वीं जयंती के उपलक्ष्य में सूरदास: एक पुनर्मूल्यांकन शीर्षक से एक परिसंवाद का आयोजन किया था। परिसंवाद में सुपरिचित समालोचक डॉ. मैनेजर पांडे, सुपरिचित कवि मनमोहन, कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के प्राध्यापक डॉ. सुभाष के व्याख्यान के अलावा मैंने भी एक संक्षिप्त पर्चा पढ़ा। पर्चा आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत है:

सूरदास: एक पुनर्पाठ

फूंकि फूंकि धरनी पग धारौ

-अरुण आदित्य

किसी कवि के पुनर्मूल्यांकन के लिए उसके समग्र रचनाकर्म का अध्ययन आवश्यक है। इस लिहाज से मैं अत्यंत विनम्रता के साथ यह स्वीकार करता हूं कि मैं अभी तक सूर-साहित्य के महासागर की कुछ बूंदों का ही स्पर्श कर पाया हूं। सूर सागर के लाख से अधिक पद, फिर सूर सारावली, साहित्य लहरी, नल दमयंती, व्याहलो आदि प्राप्य-अप्राप्य रचनाओं का विशाल महासागर और इसके बरक्स मेरी अपनी सीमाएं। विज्ञान का विद्यार्थी रहा। साहित्य का पठन-पाठन स्वरुचि और सुविधा के मुताबिक जितना संभव हुआ उतना ही कर पाया। हालांकि सूरदास, तुलसी और कबीर जनमानस में इस कदर रचे बसे हैं कि इन पर थोड़ा-बहुत बोलने का अधिकारी कोई भी हो सकता है, लेकिन वह इन महाकवियों का मूल्यांकन नहीं होगा। मैं भी जो कुछ कहने जा रहा हूं वह मूल्यांकन नहीं है। सिर्फ एक पुनर्पाठ है। मेरा अपना पाठ। यानी आज के संदर्भ में एक पाठक के रूप में मैं महाकवि सूर को किस रूप में पढ़ता हूं। दूसरे शब्दों में कहूं तो आज की जटिल गुत्थियों को समझने या सुलझाने में सूरदास मेरे कितने काम आते हैं। मुझे अपनी सीमाएं पता हैं, इसलिए सूर बाबा के शब्दों का सहारा लेकर पहले ही माफी मांग लेता हूं कि प्रभु मोरे अवगुन चित न धरौ।
सीधे मुद्दे की बात पर आते हैं। आज दलित और स्त्री-विमर्श हमारे साहित्य के मुख्य स्वर हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि सूरदास के काव्य में ये दोनों किस रूप में मौजूद हैं। भ्रमर गीत में जिस तरह गोपियां खुलकर प्रेम की बात करती हैं, वहां स्त्री के स्वातंत्र्य और साहस के बीज देखे जा सकते हंै। गोपियां साफ-साफ कह देती हैं कि वे वही करेंगी, जो उनका मन कहेगा-ऊधो, मन माने की बात। कोई भी प्रलोभन या भय उन्हें नहीं डिगा सकता है। वे अमृत के अस्वीकार के साथ ही विष और अंगार को स्वीकार करने का भी साहस रखती हैं। देखिए कितने बेबाक तरीके से वे अपनी बात कहती हैं:
ऊधो, मन माने की बात।
दाख छुहारो छांडि़ अमृतफल, बिषकीरा बिष खात॥

जो चकोर को देइ कपूर कोउ, तजि अंगार अघात।

मधुप करत घर कोरि काठ में, बंधत कमल के पात॥

ज्यों पतंग हित जानि आपुनो दीपक सो लपटात।

सूरदास, जाकौ जासों हित, सोई ताहि सुहात॥

आज हमारे यहां स्त्री को अपने मन की करने का ऐसा उद्घोष करने की कितनी स्वतंत्रता है? इसी तरह दलित विमर्श के बीज भी सूर के काव्य में देखे जा सकते हैं। कृष्ण जब विदुर के घर भोजन करते हैं तो दुर्योधन पूछता है-
षटरस व्यंजन छाडि़ रसौई साग बिदुर घर खाये॥
ताकी कुटिया में तुम बैठे, कौन बड़प्पन पायौ।

जाति पांति कुलहू तैं न्यारो, है दासी कौ जायौ॥

इस पर सूर दुर्योधन को कृष्ण से जो जवाब दिलवाते हैं उसमें जाति-भेद का स्पष्ट नकार है। वे स्पष्ट संदेश देते हैं कि भेदभाव से मुक्त और प्रेम आधारित समाज ही कृष्ण का अभीष्ट है।
जाति-पांति हौं सबकी जानौं, भक्तनि भेद न मानौं।
संग ग्वालन के भोजन कीनों, एक प्रेमव्रत ठानौं॥

आज के संदर्भ में हम देखें कि किस तरह हमारी सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था को जातिवाद किस तरह खोखला कर रहा है। हालांकि आज सवर्ण प्रभु वर्ग के लोग दलित की झोपड़ी में खाना खा रहे हैं और दलित राजनीति भी उच्च वर्ग से सौजन्य बिठा रही है, लेकिन यह सब स्वहित के लिए हो रहा है। श्रीकृष्ण किसी स्वार्थ के तहत नहीं बल्कि नीति के तहत ऐसा करते हैं। स्वार्थ या शक्ति-संतुलन की बात होती तो वे दीनहीन विदुर के बजाय सर्वथा शक्तिशाली दुर्योधन का ही आमंत्रण स्वीकार करते। लेकिन यह राजनीति के विपरीत होता। कृष्ण के समय समय नीति और राजनीति का अर्थ एक ही था। लेकिन सूर के समय में नीति और राजनीति लगभग विपरीतार्थी शब्द हो चुके थे। सूर नीति की बात करके सत्ता को जाति-निरपेक्ष होने का संकेत दे रहे थे तो समाज को भी संदेश दे रहे थे कि अगर ईश्वर मनुष्य और मनुष्य में भेद नहीं करता तो तुम क्यों करते हो?
सूरदास आज इसीलिए प्रासंगिक हैं कि उन्होंने अपनी कविता में अपने समय को दर्ज किया है। दरअसल कोई भी कवि तभी कालातीत होता है जब वह अपने देश-काल की धड़कन को अपनी रचना में व्यक्त कर पाता है। पर सवाल यह है कि सूर का समय क्या था। अमृतलाल नागर ने अपने ऐतिहासिक उपन्यास खंजन नयन की शुरुआत में ही उस समय की एक हलकी सी झलकी दिखा दी है-
'मथुरा मती जइयो। आज खून की मल्हारें गाई जा रही हैं वां पे।'
सुनकर नाव पर बैठी सवारियां सन्न रह गईं। ...सभी के होशो-हवास सूली पर टंग गए। '
आखिर बात क्या हुई भैयन?'

'सुलतान के राज में मारकाट के काजे कभी कोऊ बात होवे है भला। त्योहार को दिना, हमारी मां बहिन के माथे कौ सिंदूर आग की लपटों सो उठ रयो है चौराए चौराए पै।'
क्या हमें नहीं लगता कि हम सूर के जमाने का नहीं अपने ही जमाने का कोई संवाद सुन रहे हैं। इसे पढ़ते हुए यह सवाल बार-बार मन में आता है कि क्या हमारा समय सूर के समय से अलग है? बहरहाल सूर का समय जैसा भी रहा हो पर आज के समय में भी बहुत सी स्थितयों और समस्याओं के संदर्भ में मुझे अकसर सूर के पद याद आते हैं। ऐसी स्थितियों को अलग से खोजने की जरूरत नहीं है, अनेक उदाहरण अपने आस पास ही मिल जाएंगे। मसलन, आज हमारे आसपास ऐसे अनेक चेहरे नजर आते हैं जो धर्म का चोला ओढ़ कर अधार्मिक कृत्यों में लगे रहते हैं। ऐसे लोगों पर सीधे हमला करना न तब खतरे से खाली था और न अब। इसलिए सूरदास खुद के बहाने इन लोगों की खबर लेते हैं-
काम-क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ बिषय की माल॥
महामोह के नूपुर बाजत, निंदा सबद रसाल।
राजनीत से समाज तक, और देवालय से कार्यालय तक महा मोह के घुंघरू बजाने वाले निंदा रस में डूबे लोगों की पूरी की पूरी फौज नजर आ रही है। ऐसा लग रहा है जैसे निंदा हमारे लोकतंत्र का पांचवां खंबा है। एक दूसरे की ऐसी तैसी करना ही डेमोक्रेसी है। ऐसे लोगों की हरकतों पर गौर कीजिए और फिर इन पंक्तियों में उन्हें खोजिए:
माया कौ कटि फेंटा बाँध्यौ, लोभ-तिलक दियौ भाल॥
कोटिक कला काछि दिखराई जल-थल सुधि नहिं काल।
माया का फेंटा बांधे, और लालच का तिलक लगाए लोग, जो तरह-तरह से कलाबाजी दिखा रहे हैं, उन्हें क्या इस बात से कोई मतलब है कि उनकी इस कलाबाजी का देशकाल से कोई संबंध है? वे तो देशकाल की परवाह न करते हुए उपदेश-आश्वासन दिए जा रहे हैं। पर क्या उन्हें इस बात की चिंता है कि वे उपदेश जनता के लिए कितने प्रासंगिक होते हैं। इस संदर्भ में मुझे सूर के एक और पद की याद आ रही है। गोपियों और उद्धव के संवाद के बहाने वे अपने समय के प्रभु वर्ग को साफ-साफ कहते हैं कि हमें ऐसे उपदेश दीजिए जो हमारे काम के हों -
ऊधो, हम लायक सिख दीजै।
आगे वे और भी कठिन सवाल खड़ा कहते हैं-
यह उपदेस अगिनि तै तातो, कहो कौन बिधि कीजै॥

यानी तुम्हारा यह उपदेश हमें आग जैसा जला रहा है, हम इस पर अमल कैसे करें? आज हमारे प्रभुवर्ग के लोग कैसे-कैसे आश्वासन दे रहे हैं, लेकिन उन पर सवाल उठाने वाला कोई नहीं है। कोई कहता है स्विस बैंक का पैसा लाएंगे और देश को मालामाल कर देंगे। हम सुन लेते हैं लेकिन यह नहीं पूछते कि लाएंगे कैसे? कोई यह सवाल नहीं उठा रहा कि लोग रोटी को तरस रहे हैं और आप उन्हें मुफ्त मोबाइल या मुफ्त लैपटॉप देने की बात कर रहे हैं। ऐसे में फिर-फिर सूर की पंक्तियां याद आती हैं -
सूर, कहौ सोभा क्यों पावै आंखि आंधरी आंजै॥
यानी जिसके पास आंख ही नहीं है, उसे आप अंजन लगाकर खुश करना चाहते हैं। जो आदमी दो जून की रोटी का मोहताज है उसे लैपटाप देने की बात करेंगे तो उसके तन बदन में आग नहीं लगेगी तो क्या होगा? पर वहां तो तन बदन में आग लगने पर उसे अभिव्यक्त करने का साहस था। हम तो ठगों को यह भी नहीं कह पाते कि यह ठगी हमें स्वीकार्य नहीं है। क्या वे गोपियां हमसे ज्यादा साहसी नहीं थीं जो खुलेआम कृष्ण के दूत से कह देती हैं कि तुम्हारा यह ठगी का धंधा यहां नहीं चलने वाला है-
जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहैं।
यह ब्योपार तिहारो ऊधौ, ऐसोई फिरि जैहै॥

क्या हम अपने कर्णधारों से यह कह सकते हैं कि हम तुम्हारा धंधा नहीं चलने देंगे।
अंत में फिर एक बार सूर के समय की चर्चा। एक पद में देखिए कि वे किस तरह अपने समय को बूझते हैं। इस पद में समय की क्रूरता और उससे निपटने के लिए आवश्यक सजगता दोनों का उल्लेख है-
हम अहीर ब्रजवासी लोग
ऐसे चलौ हंसै नहिं कोऊ, घर में बैठि करौ सुख भोग

सिर पै कंस मधुपुरी बैठ्यों छिनकहि में करि डारै सोग
फूंकि फूंकि धरनी पग धारौ, महा कठिन है समौ अजोग।

कंस तो द्वापर में था फिर सूर कलयुग में किस कंस की बात कर रहे हैं। जाहिर है कि वे अपने समय के कंस की बात कर रहे हैं जो क्षण भर में ही शोक रच सकता है। सूरदास समौ अजोग यानी कठिन समय की बात करते हैं पर हमारा समय तो और भी अजोग है। जिधर नजर डालते हैं उधर ही कोई कंस मुस्कराता नजर आता है। लिहाजा बहुत ही फूंक-फूंक कर कदम रखने की जरूरत है। खासकर इस समय जब हम अपने भाग्यविधाता का चुनाव करने जा रहे हैं।

Monday, September 29, 2008

विष्णु नागर की कविता, रवीन्द्र व्यास की पेंटिंग



नागर जी की ये कविता जब पहली बार पढ़ी तो सचमुच गागर में सागर भरने वाला मुहावरा याद आ गया था। और जब रवीन्द्र की ये पेंटिंग देखी तो फ़िर नागर जी की ये कविता याद आई।रविवार शाम कुछ पुराने मित्रों के साथ नागर जी से आत्मीय मुलाकात हुई। मैंने पूछा कि आपकी कविता अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर दूँ। बोले , बेहिचक डाल दो। रवीन्द्र पहले ही कह चुके हैं कि उनकी पेंटिंग्स का उपयोग करने की पूरी छूट है। तो लीजिये पेश है यह जबरदस्त जुगलबंदी।



जहाँ हरा होगा



जहाँ हरा होगा


वहां पीला भी होगा


गुलाबी भी होगा


वहां गंध भी होगी


उसे दूर-दूर ले जाती हवा भी होगी


और आदमी भी वहां से दूर नहीं होगा।

- विष्णु नागर

Sunday, June 29, 2008

इस आग के पीछे क्यों पड़े हैं लोग


विचार मर चुका है। विचार मर नहीं सकता है। विचार जिंदाबाद। विचार अमर रहे। पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में जब विचार(धारा) का अंत होने और न होने को लेकर इस तरह का विमर्श जोरों पर था, उसी दौरान इस कविता का जन्म हुआ था। उन दिनों विचार के साथ ही कविता के अंत की भी उद्घोषणाएं की जा रही थीं। यह दीगर बात है कि नई शताब्दी में भी न विचार मरा है न कविता, पर यह जरूर है कि दोनों के जिंदा रहने की शर्तें लगातार विकट होती गई हैं। यह कविता दस साल पूर्व मध्य प्रदेश साहित्य परिषद की पत्रिका साक्षात्कार के जनवरी 1998 के अंक में छपी थी।

और एक छोटी सी सूचना : इसी कविता के साथ कुछ समय के लिए ब्लागिंग से अवकाश ले रहा हूं। सात साल से एक उपन्यास अटका पड़ा है। प्रकाशक का दबाव है कि अगले दो तीन महीने में स्क्रिप्ट दे दूं। मित्रों का भी यही कहना है कि इसे ठिकाने लगाओ, तभी कुछ नया लिख पाओगे। तो दोस्तो, उपन्यास को ठिकाने लगाकर जैसे ही कुछ नया लिखा, हाजिर हो जाऊंगा। तब तक के लिए यह आग आपके पास छोड़कर जा रहा हूं।


इस आग के पीछे क्यों पड़े हैं लोग


कुछ दिनों पहले मिला मुझे एक विचार

आग का एक सुर्ख गोला

सुबह के सूरज की तरह दहकता हुआ बिलकुल लाल

और तब से इसे दिल में छुपाए घूम रहा हूं

चोरों, बटमारों, झूठे यारों और दुनियादारों से बचाता हुआ


सोचता हूं कि सबके सब इस आग के पीछे क्यों पड़े हैं


उस दोस्त का क्या करूं

जो इसे गुलाब का फूल समझ

अपनी प्रेमिका के जूड़े में खोंस देना चाहता है


एक चटोरी लड़की इसे लाल टमाटर समझ

दोस्ती के एवज में मांग बैठी है

वह इसकी चटनी बना मूंग के भजिए के साथ खाना चाहती है


माननीय नगर सेठ इसे मूंगा समझ

अपनी अंगूठी में जडऩा चाहते हैं

ज्योतिषियों के अनुसार मूंगा ही बचा सकता है उनका भविष्य


राजा को भी जरूरत आ पड़ी है इसी चीज की

मचल गया है छोटा राजकुमार इसे लाल गेंद समझ

लिहाजा, राजा के सिपाही मेरी तलाश में हैं


और भी कई लोग अलग-अलग कारणों से

मुझसे छीन लेना चाहते हैं यह आग

हिरन की कस्तूरी सरीखी हो गई है यह चीज

कि इसके लिए कत्ल तक किया जा सकता हूं मैं

फिर इतनी खतरनाक चीज को

आखिर किसलिए दिल में छुपाए घूम रहा हूं मैं


दरअसल मैं इसे

उस बुढिय़ा के ठंडे चूल्हे में डालना चाहता हूं

जो सारी दुनिया के लिए भात का अदहन चढ़ाए बैठी है

और सदियों से कर रही है इसी आग का इंतजार।

- अरुण आदित्य

(साक्षात्कार, जनवरी 1998 में प्रकाशित)

Friday, May 30, 2008

ठोकर तो पत्थर को भी लगती है


ठोकर


हम अपनी रौ में जा रहे होते हैं

अचानक किसी पत्थर की ठोकर लगती है

और एक टीस सी उठती है

जो पैर के अंगूठे से शुरू होकर झनझना देती है दिमाग तक को


एक झनझनाहट पत्थर में भी उठती है

और हमारे पैर की चोट खाया हुआ हत-मान वह

शर्म से लुढ़क जाता है एक ओर


एक पल रुककर हम देखते हैं ठोकर खाया हुआ अपना अंगूठा

पत्थर को कोसते हुए सहलाते हैं अपना पांव

और पत्थर के आहत स्वाभिमान को सहलाती है पृथ्वी

झाड़ती है भय संकोच की धूल और ला खड़ा करती है उसे

किसी और के गुरूर की राह में।

-अरुण आदित्य

(पल-प्रतिपल के सितंबर-दिसंबर2 000 अंक में प्रकाशित। पल प्रतिपल का पता है : पल प्रतिपल, एससीएफ-267, सेक्टर-16, पंचकूला। देश निर्मोही इसके संपादक हैं। )

Saturday, March 1, 2008

मेरे मठ में मेरा हठ है


सबका अपना-अपना मठ है

मेरे मठ में मेरा हठ है

मैं, मैं, मैं, मैं मंत्र हमारा

मैं की खातिर तंत्र हमारा

मेरा मैं है मुझको प्यारा

मैं अपने ही मैं से हारा

मेरे मैं की जय है, जय है

मेरा मैं ही मेरा भय है

मेरे मैं को आबाद करो

मुझको मैं से आजाद करो

मैं साधू , मेरा मैं शठ है

फ़िर भी मैं की खातिर हठ है।


- अरुण आदित्य

Saturday, January 12, 2008

इस तरह मत आओ जैसे रथों पर सवार आते हैं महारथी

आवाहन

शब्द आओ मेरे पास
जैसे मानसून में आते हैं बादल
जैसे बादलों में आता है पानी

जैसे पगहा तुड़ाकर गाय के थनों की ओर दौड़ता है बछड़ा
जैसे थनों में आता है दूध

इस तरह मत आओ जैसे
रथों पर सवार आते हैं महारथी
बस्तियों को रौंदते हुए
किसी रौंदी हुई बस्ती से आओ मेरे शब्द
धूल से सने और लहू लुहान
कि तुम्हारा उपचार करेगी मेरी कविता
और तुम्हारे लहू से उपचारित होगी वह स्वयं

याचक की तरह मत मांगो किसी कविता में पनाह
आओ तो ऐसे, जैसे चोट लगते ही आती है कराह

संतों महंतों की बोली बोलते हुए नहीं
तुतलाते हुए आओ मेरे शब्द
वस्त्राभूषणों से लदे-फंदे नहीं
नंग-धड़ंग आओ मेरे शब्द

किसी किताब से नहीं
गरीबदास के ख्वाब से निकलकर आओ मेरे शब्द

कि मैं सिर्फ एक अच्छी कविता लिखना चाहता हूँ
और उसे जीना चाहता हूँ तमाम उम्र ।