Friday, March 5, 2010

तर्पण और उत्तर वनवास पर चर्चा


तर्पण और उत्तर वनवास पर चर्चा

स्व. द्वारिका प्रसाद सक्सेना स्मृति न्यास के तत्वावधान में

शिवमूर्ति के उपन्यास तर्पण
और अरुण आदित्य
के उपन्यास उत्तर वनवास
पर आयोजित विचार गोष्ठी में
आप सादर आमंत्रित हैं।

दिनांक- रविवार, 7 मार्च, 2010
समय - अपराह्न 2 बजे
स्थान- इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट स्टडीज
ए-8 बी, सेक्टर-62, नोएडा



आमंत्रित अतिथिगण

अध्यक्षता- राजेंद्र यादव

मुख्य अतिथि- संजीव, चित्रा मुद्गल, भारत भारद्वाज

विशिष्ट अतिथि - वल्लभ डोभाल, मैत्रेयी पुष्पा, हरि नारायण, अपूर्व जोशी, अशोक माहेश्वरी, देश निर्मोही

प्रमुख वक्ता- महेश दर्पण, मदन कश्यप, विज्ञानव्रत, सुषमा जुगरान, तजेंद्र लूथरा, रमेश प्रजाप्रति, देवेंद्र कुमार देवेश। संचालन- वीरेंद्र आजम।

Friday, February 26, 2010

डर के पीछे जो कैडर है


एम एफ हुसैन का आत्म निर्वासन हो, या तस्लीमा नसरीन का निर्वासन, सलमान रुश्दी के खिलाफ मौत का फतवा हो या सफदर हाशमी की हत्या...इनके जरिए फासीवादी शक्तियां सिर्फ इन व्यक्तियों को ही नहीं, अपने सोच से अलग सोच रखने वाले हर दिमाग को नियंत्रित करना चाहती हैं। वे बहुरंगी संस्कति में यकीन नहीं करते, पूरी दुनिया को एक ही रंग में रंग देना चाहते हैं। यह प्रवृत्ति नई नहीं है, लेकन हाल के वर्षों में यह और ज्यादा घातक हुई है। सृजन-संस्कृति पर इस प्रवृत्ति के भयावह प्रभाव को रेखांकित करती है यह कविता जो हरियाणा साहित्य अकादमी की पत्रिका हरिगंधा में 2008 में छपी थी। आज हुसैन के बहाने यह फिर प्रासंगिक लग रही है...


डर के पीछे जो कैडर है

यह केसरिया करो थोड़ा और गहरा
और यह हरा बिल्कुल हल्का
यह लाल रंग हटाओ यहाँ से
इसकी जगह कर दो काला
हमें तस्वीर के बड़े हिस्से में चाहिए काला



यह देवता जैसा क्या बना दिया जनाब
इसके बजाय बनाओ कोई सुंदर भूदृश्य
कोई पहाड़, कोई नदी



अब नदी को स्त्री जैसी क्यों बना रहे हो तुम
अरे, यह तो गंगा मैया हैं
इन्हें ठीक से कपड़े क्यों नहीं पहनाये
कर्पूर धवल करो इनकी साड़ी का रंग


कहाँ से आ रही है ये आवाज
इधर-उधर देखता है चित्रकार
कहीं कोई तो नहीं है
कहीं मेरा मन ही तो नहीं दे रहा ये निर्देश



पर मन के पीछे जो डर है
और डर के पीछे जो कैडर है
जो सीधे-सीधे नहीं दे रहा है मुझे धमकी या हिदायत
उसके खिलाफ कैसे करूं शिक़ायत?

- अरुण आदित्य

Saturday, February 13, 2010

उत्तर वनवास : नामवर सिंह और राजेंद्र यादव की राय

इसी 6 फरवरी को पुस्तक मेला प्रांगण में आधार प्रकाशन के स्टाल पर नामवर सिंह और राजेंद्र यादव ने मेरे पहले उपन्यास 'उत्तर-वनवास ' का लोकार्पण किया। अल्प सूचना पर दिल्ली जैसे बेदिल कहे जाने वाले शहर में जिस तादाद में मित्रों और शुभचिंतकों ने उपस्थिति दर्ज कराई, उससे मैं अभिभूत और दिल से शुक्रगुजार हूं। समारोह में न पहुंच सके मित्र धीरेश और कई अन्य मित्रों का लगातार आग्रह रहा है कि लोकार्पण समारोह की तस्वीरें जारी कर दी जाएं। कुछ और मित्रों का आग्रह था कि इस मौके पर वक्ताओं ने क्या कहा, वह भी जारी कर दूं क्योंकि समारोह में काफी भीड़ थी और माइक न होने से पीछे खड़े लोग ठीक-ठीक सुन नहीं पाए थे कि वक्ताओं ने क्या कहा। संयोग से बिटिया शुचि ने रेकार्डिंग कर ली थी। तो प्रस्तुत है समारोह की एक झलक-

लीलाधर मंडलोई (मंच-संचालक) :
अरुण आदित्य मेरे अभिन्न मित्र हैं। मध्यप्रदेश में रहे हैं। हमने साथ में कविता शुरू की थी। लेकिन राजेंद्र यादव के कहने पर उन्होंने कविता छोड़ उपन्यास लिख डाला है (समवेत हंसी और उसी के बीच फंसी मेरी सफाई, कि कविता छोड़ी नहीं है)। बहुत अद्भुत उपन्यास है, इसके कुछ अंश मैंने पढ़े हैं। नामवर जी और राजेंद्र जी से आग्रह है कि आप दोनों इसका लोकार्पण करें। (लोकार्पण संपन्न होता है)

नामवर सिंह :
अरुण आदित्य को मैं कवि रूप में जानता था। अब चूंकि पत्रकारिता का पेशा ऐसा है कि कविता में पत्रकारिता नहीं हो सकती। उसके लिए नित्य गद्य से ही जूझना पड़ेगा। मुझे लगता है कि पत्रकारिता ने अपने बीच से एक उपन्यासकार पैदा किया है। तो उस पेशे को मैं दाद दूंगा जिसने इन्हें कथाकार बनाया। और मैं उपन्यास को उलट-पलटकर देख रहा था तो मुझे लगा कि यह बिलकुल सही जगह है। यहां पेशे में और उपन्यास लेखन में कोई टकराव नहीं है। एक बात और, सीधे ये उपन्यास की ओर ही गए। आमतौर पर लोग कहानियों की छोटी पगडंडी से चलकर उपन्यास के राजमार्ग तक आते हैं। लेकिन पहली ही छलांग में इन्होंने उपन्यास लिख दिया। यह भी इन्होंने अच्छा काम किया, क्योंकि आम तौर पर कहानियां लिखते-लिखते लोग जब उपन्यास पर जाते हैं उपन्यासों में भी कहानी ही लिखते हैं। बेहतर है तुम उपन्यास के रास्ते ही रहो, और कहानियां कम ही लिखो। मैं बधाई देता हूं उत्तर-वनवास के लिए, जो आभास देता है एक पौराणिक नाम और कथा का, परंतु वास्तव में आज के यथार्थ की सच्ची कहानी है।


राजेन्द्र यादव :
यह उपन्यास एक पत्रकार और कवि का लिखा हुआ है। इनकी भाषा में जहां पत्रकारिता की चुटकी है, विवरण हैं, वहीं कविता का स्पर्श भी जगह-जगह मिलता है। जिस तैयारी से अरुण आदित्य आए हैं, मेरा ख्याल है कि दुनिया के बहुत बड़े बड़े उपन्यासकार चाहे वे हैमिंग्वे हों, चाहे सामरसेट मॉम हों, सारे लोग पत्रकार ही थे, मैं समझता हूं कि यह उनके लिए संभावनाओं का एक नया क्षेत्र है। इसमें उन्होंने रामचंद्र नाम के आदमी को लेकर उसकी जीवन यात्रा को लिखा है। कथा रामचंद्र के गांव से शुरू होती है, जहां आपसी झगड़े हैं, ठाकुरों और ब्राह्मणों में वर्चस्व की लड़ाई है। गांव के एक झगड़े में उसके हाथों एक आदमी मर जाता है या घायल हो जाता है। वहां से भागकर वह एक साधु के चक्कर में पड़ जाता है। और एक आश्रम में चला आता है। अंत में वह बीजेपी जैसी किसी सांस्कृतिक राष्ट्रवादी पार्टी के साथ जुड़ जाता है और वहां की जो भीतरी बिडंबनाएं हैं, जो अंतर्विरोध हैं, आडंबर हैं, उन्हें गहराई से देखता है, जिससे धीरे-धीरे उसका मोहभंग होता है। और वह वापस उस जगह, उस व्यक्ति के पास लौट आता है, जिसकी बातें उसे रीजनेबल लगती हैं। और जहां उसे मन की शांति मिलती है। इस तरह से मैं समझता हूं कि यह उपन्यास पहला उपन्यास है, और अगले उपन्यासों की बहुत आशापूर्ण संभावना जगाता है।
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आभार :
आधार
प्रकाशन के स्टाल पर उपस्थित जिन मित्रों-शुभचिंतकों के नाम मुझे इस समय याद आ रहे हैं : मुरली
मनोहर प्रसाद सिंह, रेखा अवस्थी, संजीव, कर्मेंदु शिशिर, मदन कश्यप, अजीत अंजुम, गीताश्री, मनमोहन, शुभा, प्रेमपाल शर्मा, सत्यपाल सहगल, लाल्टू, देश निर्मोही, प्रेम भारद्वाज, मनोज सिंह, अजय नावरिया, अजित राय, वैभव सिंह, सुदीप ठाकुर, निरंजन श्रोत्रिय, हरि मृदुल, लता शर्मा, प्रदीप मिश्र, अविनाश, रवीश कुमार, राजेश जैतली, सत्येंदु मिश्रा, कल्लोल चक्रवर्ती, चंद्रकांत सिंह, ब्रजमोहन, उमाशंकर सिंह, उमाशंकर चौधरी, ज्योति चावला, रोहित प्रकाश, अवनीश मिश्र, लल्लन बघेल, पल्लव, कुमार सर्वेश, आशीष अलेक्जेंडर, वेदविलास उनियाल, अभिलाष वर्मा। पीछे खड़े कई मित्रों-शुभचिंतकों को मैं भीड़ में घिरे होने के कारण देख नहीं सका, और कई के नाम इस समय याद नहीं आ पा रहे हैं, उन सब के प्रति भी मैं दिल से कृतज्ञ हूं।

एक
और सूचना :

उत्तर
वनवास की बिक्री को लेकर आधार प्रकाशन के संचालक देश निर्मोही काफी उत्साहित हैं। विमोचन के मौके पर डेढ़-दो घंटे में ही करीब 30-35 प्रतियां मेरे हस्ताक्षर के साथ बिक गईं। मेले में उपन्यास की प्रतियां 3 फरवरी को पहुंच पाई थीं। 25 से अधिक प्रतियां लोकार्पण के पहले ही बिक गई थीं। मजेदार बात यह है कि देश निर्मोही ने कम से कम तीन लोगों को उपन्यास की पहली प्रति बेच दी है। मित्र गीत चतुर्वेदी ने एसएमएस कर बताया कि लोकार्पण के पहले ही 'पहली प्रति 'खरीद ली है। इसी तरह हरि मृदुल के पास भी पहली प्रति है। उमाशंकर सिंह ने तो देश निर्मोही से पूछ ही लिया कि आपने मुझे जो 'पहली प्रति ' बेची है, वह 'पहली-पहली ', 'दूसरी-पहली 'या फिर 'तीसरी-पहली 'प्रति है। मैं इस आत्मीयता के लिए आप सब का हृदय से आभारी हूं। मेले के लिए सिर्फ 100 प्रतियां ही छपकर आ पाई थीं। 7 फरवरी को मेले की आखिरी शाम जब देश निर्मोही पैकअप कर रहे थे तो मैंने लेखकीय प्रतियां मांगी, उस समय उनके पास मात्र चार-पांच ही बची थीं। जानता हूं कि पांच दिन में पचासी-नब्बे प्रतियां बिक जाना कोई बड़ी बात नहीं है, पर जिस तरह कहा जा रहा है कि किताबों के पाठक नहीं हैं, उसमें यह आंकड़ा किंचित संतोष तो देता ही है।

ऊपर की पहली तस्वीर को छोड़कर बाकी तस्वीरें इंदौर से आए कवि मित्र प्रदीप मिश्र ने खींची हैं।




Monday, February 1, 2010

समय न मिले तब भी आना

आजकल क्या लिख रहे हो?
इस सवाल के जवाब में 'एक उपन्यास पर काम चल रहा है' कई वर्षों से मेरे लिए लिखने से बचने का एक खूबसूरत बहाना बना हुआ था। मित्रों ने घेराबंदी करके वह बहाना खत्म करवा दिया। लंबे समय से 'शीघ्र प्रकाश्य' बना रहा उपन्यास उत्तर वनवास अंतत: प्रकाशित हो गया है।
पुस्तक मेले में इसी शनिवार को उसका लोकार्पण है।









लोकार्पण करेंगे
हिंदी साहित्य के दो शिखर-व्यक्तित्व
नामवर सिंह और राजेंद्र यादव।


स्थान : आधार प्रकाशन का स्टाल
स्टाल नंबर- 81
हॉल नंबर- 12 ए
पुस्तक मेला प्रांगण, प्रगति मैदान, नई दिल्ली।

समय : 6 फरवरी, 2010, शाम 04 : 00 बजे


समय मिले तो जरूर आइएगा। और समय न मिले तो भी।
आपको कवि केदार नाथ सिंह की इन काव्य पंक्तियों का वास्ता :
आना
जब
समय मिले
जब
समय मिले
तब
भी आना।




Monday, January 25, 2010

जब इस तरह घना हो कोहरा




'कोहरा 'कविता द पब्लिक एजेंडा मैगजीन के ताजा अंक में छपी है। द पब्लिक एजेंडा से हिंदी के दो सुप्रसिद्ध कवि जुड़े हुए हैं। इसके संपादक मंगलेश डबराल और साहित्य संपादक मदन कश्यप हैं।

कोहरा


कई दिनों से छाया हुआ है कोहरा घना
कंपकंपाती ठंड और सूरज का कहीं अता पता नहीं
जहां तक नजर जाए बस धुआं ही धुआं
और धुएं में उलझे हुए जलविंदु अतिसूक्ष्म

जरा सी दूर की चीज भी नजर नहीं आ रही साफ-साफ
टीवी अखबार से ही पता चलता है
कि क्या हो रहा है हमारे आस-पास

45 रेलगाड़ी से कट मरे
54 सड़क दुर्घटनाओं में
140 ठंड से
अलग-अलग कारणों से मरे नजर आते हैं ये 239 लोग
पर वास्तव में तो ये कोहरा ही है इनकी मौत का जिम्मेदार

इनके अलावा और कितने लोग
और कितनी चीजें हुई हैं इस कोहरे की शिकार
इसका हिसाब तो मीडिया भी कैसे दे सकता है
जो स्वयं है इस धुंध की चपेट में

जब इस तरह घना हो तो कोहरे में देखते हुए
सिर्फ कोहरे को ही देखा जा सकता है
और उसे भी बहुत दूर तक कहां देख पाते हैं हम
थोड़ी दूर का कोहरा
दिखने ही नहीं देता बहुत दूर के कोहरे को
और बहुत पास का कोहरा भी कहां देख पाते हैं हम

घने से घने कोहरे में भी
हम साफ-साफ देख लेते हैं अपने हाथ-पांव
इसलिए लगता है
कि एक कोहरा मुक्त वृत्त में है हमारी उपस्थिति
जबकि हकीकत में इस वृत्त में भी
होता है कोहरा उतना ही घना
कि दस गज दूर खड़ा मनुष्य भी नहीं देख सकता हमें
ठीक उसी तरह जैसे उसे नहीं देख पाते हैं हम

इस घने कोहरे में
जब जरा से फासले पर खड़ा मूर्त मनुष्य ही नहीं दिखता मनुष्य को
तो मनुष्यता जैसी अमूर्त चीज के बारे में क्या कहें?

महर्षि पराशर !
आपने अपने रति-सुख के लिए
रचा था जो कोहरा
देखो, कितना कोहराम मचा है उसके कारण

इस बात से पता नहीं तुम खुश होगे या दुखी
कि धुंध रचने के मामले में
तुम्हारे वंशज भी कुछ कम नहीं
अपने स्वार्थ के लिए
और कभी-कभी तो सिर्फ चुहल के लिए ही
रच देते हैं कोहरा ऐसा खूबसूरत
कि उसमें भटकता हुआ मनुष्य
भूल जाता है धूप-ताप और रोशनी की जरूरत

भूल ही नहीं जाता बल्कि कभी-कभी तो
उसे अखरने भी लगती हैं ये चीजें
जो करती हैं इस मनोरम धुंध का प्रतिरोध।

- अरुण आदित्य

चित्र यहाँ से साभार

Wednesday, January 13, 2010

उत्तर वनवास के बारे में वरिष्ठ कथाकार संजीव की राय


उपन्यास उत्तर वनवास का आवरण तैयार हो गया है। वरिष्ठ चित्रकार-कथाकार प्रभु जोशी की पेंटिंग से सज्जित यह आवरण आपको कैसा लग रहा है, जरूर बताएं। उम्मीद है कि उपन्यास दिल्ली के पुस्तक मेले में आधार प्रकाशन के स्टाल पर उपलब्ध रहेगा। बहरहाल उपन्यास के आने से पहले आइए देखते हैं कि वरिष्ठ कथाकार और हंस के कार्यकारी संपादक संजीव की इस उपन्यास के बारे में
क्या राय है?







उत्तर वनवास : एक अभिनव प्रयास

संजीव
हिंदी पट्टी के लोकजीवन में 'राम चरित मानस का प्रभाव बहुत गाढ़ा रहा है। वर्षों पहले प्रतापगढ़ में बाबा रामचंद्र दास ने किसान आंदोलन में इसकी चौपाइयों-दोहों का धनात्मक उपयोग किया था। अग्रणी बांग्ला कथाकार सतीनाथ भादुड़ी ने रामचरित मानस का अपने उपन्यास 'ढोंड़ाय चरित मानस' में पुन: उपयोग किया। इस बार का मानस तुलसी के मानस का एंटी मैटर था। एक राजनीतिक पार्टी के लिए 'राम चरित मानस' को सीढ़ी बनाकर सत्ता तक पहुंचना जितना आसान है, एक रचनाकार के लिए उसका सकारात्मक उपयोग उतना ही मुश्किल होता है।
इधर अक्सर ही कहा जाने लगा है कि हिंदी की युवा पीढ़ी के पास अपना कोई उपन्यास नहीं है या कि उसमें उपन्यास लेखन की क्षमता नहीं है। दूसरी तरफ भाषा की सामथ्र्य के दोहन का भी मुद्दा है। भाषा के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने को इच्छुक हर शब्द साधक का पहले की अपेक्षा अधिक सामथ्र्य संपन्न होना लाजमी हो गया है। इन सारी चुनौतियों का जवाब बन कर आया है युवा कथाकार अरुण आदित्य का उपन्यास उत्तर-वनवास।
कथानायक रामचंद्र की मुठभेड़ उन तत्वों से होती है जो राम का उपयोग अपने निहित स्वार्थों के लिए करना चाहते हैं। अंत:, वाह्य दोनों स्तरों पर यह द्वंद्वात्मकता परवान चढ़ती है, स्थूल रुप में भी और प्रतीक रूप में भी। वहां राम का चौदह वर्षों का वनवास है, यहां सत्रह वर्षों का, रामचंद्र का ही नहीं, उनकी चेतना का भी।
सामंती मानसिकता के क्रोड़ में रचे-रसे अवध के गांव, गांव के ठाकुरों और ब्राह्मणों में वर्चस्व का द्वंद्व, द्वंद्व में पिसते दलित और स्त्रियां, धर्म, अध्यात्म, राजनीति और कदाचार, वर्ण और वर्ग, गत और अनागत, परछाइयां और आहटें - सब को अपने ढंग से पिरोता, पछींटता, खंगालता अपने भाषिक वितान में फैलाता चलता है उपन्यास। पारदर्शिता के स्तर पर, मौजूदा व्यवस्था की कारक शक्तियों के चेहरों और चरित्रों को आसानी से पहचाना जा सकता है; भाषा के स्तर पर, विश्लेषण के स्तर पर, फंतासी और कल्पनाशीलता के स्तर पर अरुण का यह एक अभिनव प्रयोग है।
बानगी के तौर पर उपन्यास के कुछ अंश- 'दरअसल हम एक डरे हुए समय में जी रहे हैं। डरी हुई राजनीति, डरा हुआ धर्म और डरा हुआ समाज बहुत खतरनाक होते हैं। और इन सब से ज्यादा खतरनाक होती है डरी हुई पत्रकारिता। और ये हमारे देस का दुर्भाग्य है कि हमें इन डरी हुई चीजों के बीच ही रहना पड़ रहा है।'
'... रामचंद्र उसके पीछे इतनी तेजी से लपके कि नींद से बाहर निकल गए। नींद से बाहर आने के बाद भी सपने से बाहर आने में उन्हें काफी देर लगी।'
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पुनश्च:
कुछ मित्रों ने आधार प्रकाशन का पता जानना चाहा है। पता इस प्रकार है:
आधार प्रकाशन
एस सी एफ-267, सेक्टर-16
पंचकूला, हरियाणा।

ई-मेल - aadhar_prakashan@yahoo.com
आधार प्रकाशन के संचालक और साहित्यिक पत्रिका पल-प्रतिपल के संपादक देश निर्मोही का मोबाइल नंबर है- 09417267004

Saturday, December 12, 2009

लिख ही डाला अंतिम वाक्य अंतिम बार

लिखो, काटो...फिर लिखो, फिर काटो। इसका क्या कोई अंत है। अंतत: यही सोचकर उपन्यास उत्तर वनवास का अंतिम वाक्य अंतिम बार लिख कर खुद को मुक्त किया। फाइनल स्क्रिप्ट आधार प्रकाशन के संचालक श्री देश निर्मोही जी के पाले में पहुंच गई है। देश जी का कहना है कि जनवरी तक छाप कर ठिकाने लगा देंगे।
उपन्यास का आवरण चित्र सुपरिचित चित्रकार और कहानीकार प्रभु जोशी का है।
उपन्यास का एक अंश साहित्यिक पत्रिका पाखी के दिसंबर अंक में प्रकाशित हुआ है, जिस पर काफी उत्साहवर्धक प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं।
एक और अंश साहित्यिक पत्रिका गुंजन के आगामी अंक में आने वाला है।
सब कुछ सामान्य रहा तो बहुत जल्द किताब आपके हाथ में होगी और मेरा सिर कढ़ाई में...