Thursday, April 30, 2009

फूंकि फूंकि धरनी पग धारौ, महा कठिन है समौ अजोग


कल का दिन सूरदास को समर्पित रहा। सुबह साढ़े दस बजे सूर बाबा की जन्मस्थली सीही (फरीदाबाद) की रज को माथे लगाने का अवसर मिला। देश निर्मोही, डॉ. सुभाष और कई स्थानीय साहित्यकार साथ थे। सबने सीही में सूर स्मारक परिसर में महाकवि की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। उससे पहले वहां के एक भक्त ने हम सब का तिलक किया। स्मारक न्यास के प्रमुख ने बताया कि परिसर में एक पुस्तकालय खोलने की भी योजना है। जब भी कहीं पुस्तकालय खुलने की सूचना मिलती है मन उछल पड़ता है। सो कल दिन की शुरुआत बहुत अच्छी रही। इस सुखद शुरुआत के बाद साहित्यकारों का जत्था फरीदाबाद के मैगपाई टूरिस्ट सेंटर पहुंचा। वहां हरियाणा साहित्य अकादमी ने सूरदास की ५३१ वीं जयंती के उपलक्ष्य में सूरदास: एक पुनर्मूल्यांकन शीर्षक से एक परिसंवाद का आयोजन किया था। परिसंवाद में सुपरिचित समालोचक डॉ. मैनेजर पांडे, सुपरिचित कवि मनमोहन, कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के प्राध्यापक डॉ. सुभाष के व्याख्यान के अलावा मैंने भी एक संक्षिप्त पर्चा पढ़ा। पर्चा आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत है:

सूरदास: एक पुनर्पाठ

फूंकि फूंकि धरनी पग धारौ

-अरुण आदित्य

किसी कवि के पुनर्मूल्यांकन के लिए उसके समग्र रचनाकर्म का अध्ययन आवश्यक है। इस लिहाज से मैं अत्यंत विनम्रता के साथ यह स्वीकार करता हूं कि मैं अभी तक सूर-साहित्य के महासागर की कुछ बूंदों का ही स्पर्श कर पाया हूं। सूर सागर के लाख से अधिक पद, फिर सूर सारावली, साहित्य लहरी, नल दमयंती, व्याहलो आदि प्राप्य-अप्राप्य रचनाओं का विशाल महासागर और इसके बरक्स मेरी अपनी सीमाएं। विज्ञान का विद्यार्थी रहा। साहित्य का पठन-पाठन स्वरुचि और सुविधा के मुताबिक जितना संभव हुआ उतना ही कर पाया। हालांकि सूरदास, तुलसी और कबीर जनमानस में इस कदर रचे बसे हैं कि इन पर थोड़ा-बहुत बोलने का अधिकारी कोई भी हो सकता है, लेकिन वह इन महाकवियों का मूल्यांकन नहीं होगा। मैं भी जो कुछ कहने जा रहा हूं वह मूल्यांकन नहीं है। सिर्फ एक पुनर्पाठ है। मेरा अपना पाठ। यानी आज के संदर्भ में एक पाठक के रूप में मैं महाकवि सूर को किस रूप में पढ़ता हूं। दूसरे शब्दों में कहूं तो आज की जटिल गुत्थियों को समझने या सुलझाने में सूरदास मेरे कितने काम आते हैं। मुझे अपनी सीमाएं पता हैं, इसलिए सूर बाबा के शब्दों का सहारा लेकर पहले ही माफी मांग लेता हूं कि प्रभु मोरे अवगुन चित न धरौ।
सीधे मुद्दे की बात पर आते हैं। आज दलित और स्त्री-विमर्श हमारे साहित्य के मुख्य स्वर हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि सूरदास के काव्य में ये दोनों किस रूप में मौजूद हैं। भ्रमर गीत में जिस तरह गोपियां खुलकर प्रेम की बात करती हैं, वहां स्त्री के स्वातंत्र्य और साहस के बीज देखे जा सकते हंै। गोपियां साफ-साफ कह देती हैं कि वे वही करेंगी, जो उनका मन कहेगा-ऊधो, मन माने की बात। कोई भी प्रलोभन या भय उन्हें नहीं डिगा सकता है। वे अमृत के अस्वीकार के साथ ही विष और अंगार को स्वीकार करने का भी साहस रखती हैं। देखिए कितने बेबाक तरीके से वे अपनी बात कहती हैं:
ऊधो, मन माने की बात।
दाख छुहारो छांडि़ अमृतफल, बिषकीरा बिष खात॥

जो चकोर को देइ कपूर कोउ, तजि अंगार अघात।

मधुप करत घर कोरि काठ में, बंधत कमल के पात॥

ज्यों पतंग हित जानि आपुनो दीपक सो लपटात।

सूरदास, जाकौ जासों हित, सोई ताहि सुहात॥

आज हमारे यहां स्त्री को अपने मन की करने का ऐसा उद्घोष करने की कितनी स्वतंत्रता है? इसी तरह दलित विमर्श के बीज भी सूर के काव्य में देखे जा सकते हैं। कृष्ण जब विदुर के घर भोजन करते हैं तो दुर्योधन पूछता है-
षटरस व्यंजन छाडि़ रसौई साग बिदुर घर खाये॥
ताकी कुटिया में तुम बैठे, कौन बड़प्पन पायौ।

जाति पांति कुलहू तैं न्यारो, है दासी कौ जायौ॥

इस पर सूर दुर्योधन को कृष्ण से जो जवाब दिलवाते हैं उसमें जाति-भेद का स्पष्ट नकार है। वे स्पष्ट संदेश देते हैं कि भेदभाव से मुक्त और प्रेम आधारित समाज ही कृष्ण का अभीष्ट है।
जाति-पांति हौं सबकी जानौं, भक्तनि भेद न मानौं।
संग ग्वालन के भोजन कीनों, एक प्रेमव्रत ठानौं॥

आज के संदर्भ में हम देखें कि किस तरह हमारी सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था को जातिवाद किस तरह खोखला कर रहा है। हालांकि आज सवर्ण प्रभु वर्ग के लोग दलित की झोपड़ी में खाना खा रहे हैं और दलित राजनीति भी उच्च वर्ग से सौजन्य बिठा रही है, लेकिन यह सब स्वहित के लिए हो रहा है। श्रीकृष्ण किसी स्वार्थ के तहत नहीं बल्कि नीति के तहत ऐसा करते हैं। स्वार्थ या शक्ति-संतुलन की बात होती तो वे दीनहीन विदुर के बजाय सर्वथा शक्तिशाली दुर्योधन का ही आमंत्रण स्वीकार करते। लेकिन यह राजनीति के विपरीत होता। कृष्ण के समय समय नीति और राजनीति का अर्थ एक ही था। लेकिन सूर के समय में नीति और राजनीति लगभग विपरीतार्थी शब्द हो चुके थे। सूर नीति की बात करके सत्ता को जाति-निरपेक्ष होने का संकेत दे रहे थे तो समाज को भी संदेश दे रहे थे कि अगर ईश्वर मनुष्य और मनुष्य में भेद नहीं करता तो तुम क्यों करते हो?
सूरदास आज इसीलिए प्रासंगिक हैं कि उन्होंने अपनी कविता में अपने समय को दर्ज किया है। दरअसल कोई भी कवि तभी कालातीत होता है जब वह अपने देश-काल की धड़कन को अपनी रचना में व्यक्त कर पाता है। पर सवाल यह है कि सूर का समय क्या था। अमृतलाल नागर ने अपने ऐतिहासिक उपन्यास खंजन नयन की शुरुआत में ही उस समय की एक हलकी सी झलकी दिखा दी है-
'मथुरा मती जइयो। आज खून की मल्हारें गाई जा रही हैं वां पे।'
सुनकर नाव पर बैठी सवारियां सन्न रह गईं। ...सभी के होशो-हवास सूली पर टंग गए। '
आखिर बात क्या हुई भैयन?'

'सुलतान के राज में मारकाट के काजे कभी कोऊ बात होवे है भला। त्योहार को दिना, हमारी मां बहिन के माथे कौ सिंदूर आग की लपटों सो उठ रयो है चौराए चौराए पै।'
क्या हमें नहीं लगता कि हम सूर के जमाने का नहीं अपने ही जमाने का कोई संवाद सुन रहे हैं। इसे पढ़ते हुए यह सवाल बार-बार मन में आता है कि क्या हमारा समय सूर के समय से अलग है? बहरहाल सूर का समय जैसा भी रहा हो पर आज के समय में भी बहुत सी स्थितयों और समस्याओं के संदर्भ में मुझे अकसर सूर के पद याद आते हैं। ऐसी स्थितियों को अलग से खोजने की जरूरत नहीं है, अनेक उदाहरण अपने आस पास ही मिल जाएंगे। मसलन, आज हमारे आसपास ऐसे अनेक चेहरे नजर आते हैं जो धर्म का चोला ओढ़ कर अधार्मिक कृत्यों में लगे रहते हैं। ऐसे लोगों पर सीधे हमला करना न तब खतरे से खाली था और न अब। इसलिए सूरदास खुद के बहाने इन लोगों की खबर लेते हैं-
काम-क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ बिषय की माल॥
महामोह के नूपुर बाजत, निंदा सबद रसाल।
राजनीत से समाज तक, और देवालय से कार्यालय तक महा मोह के घुंघरू बजाने वाले निंदा रस में डूबे लोगों की पूरी की पूरी फौज नजर आ रही है। ऐसा लग रहा है जैसे निंदा हमारे लोकतंत्र का पांचवां खंबा है। एक दूसरे की ऐसी तैसी करना ही डेमोक्रेसी है। ऐसे लोगों की हरकतों पर गौर कीजिए और फिर इन पंक्तियों में उन्हें खोजिए:
माया कौ कटि फेंटा बाँध्यौ, लोभ-तिलक दियौ भाल॥
कोटिक कला काछि दिखराई जल-थल सुधि नहिं काल।
माया का फेंटा बांधे, और लालच का तिलक लगाए लोग, जो तरह-तरह से कलाबाजी दिखा रहे हैं, उन्हें क्या इस बात से कोई मतलब है कि उनकी इस कलाबाजी का देशकाल से कोई संबंध है? वे तो देशकाल की परवाह न करते हुए उपदेश-आश्वासन दिए जा रहे हैं। पर क्या उन्हें इस बात की चिंता है कि वे उपदेश जनता के लिए कितने प्रासंगिक होते हैं। इस संदर्भ में मुझे सूर के एक और पद की याद आ रही है। गोपियों और उद्धव के संवाद के बहाने वे अपने समय के प्रभु वर्ग को साफ-साफ कहते हैं कि हमें ऐसे उपदेश दीजिए जो हमारे काम के हों -
ऊधो, हम लायक सिख दीजै।
आगे वे और भी कठिन सवाल खड़ा कहते हैं-
यह उपदेस अगिनि तै तातो, कहो कौन बिधि कीजै॥

यानी तुम्हारा यह उपदेश हमें आग जैसा जला रहा है, हम इस पर अमल कैसे करें? आज हमारे प्रभुवर्ग के लोग कैसे-कैसे आश्वासन दे रहे हैं, लेकिन उन पर सवाल उठाने वाला कोई नहीं है। कोई कहता है स्विस बैंक का पैसा लाएंगे और देश को मालामाल कर देंगे। हम सुन लेते हैं लेकिन यह नहीं पूछते कि लाएंगे कैसे? कोई यह सवाल नहीं उठा रहा कि लोग रोटी को तरस रहे हैं और आप उन्हें मुफ्त मोबाइल या मुफ्त लैपटॉप देने की बात कर रहे हैं। ऐसे में फिर-फिर सूर की पंक्तियां याद आती हैं -
सूर, कहौ सोभा क्यों पावै आंखि आंधरी आंजै॥
यानी जिसके पास आंख ही नहीं है, उसे आप अंजन लगाकर खुश करना चाहते हैं। जो आदमी दो जून की रोटी का मोहताज है उसे लैपटाप देने की बात करेंगे तो उसके तन बदन में आग नहीं लगेगी तो क्या होगा? पर वहां तो तन बदन में आग लगने पर उसे अभिव्यक्त करने का साहस था। हम तो ठगों को यह भी नहीं कह पाते कि यह ठगी हमें स्वीकार्य नहीं है। क्या वे गोपियां हमसे ज्यादा साहसी नहीं थीं जो खुलेआम कृष्ण के दूत से कह देती हैं कि तुम्हारा यह ठगी का धंधा यहां नहीं चलने वाला है-
जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहैं।
यह ब्योपार तिहारो ऊधौ, ऐसोई फिरि जैहै॥

क्या हम अपने कर्णधारों से यह कह सकते हैं कि हम तुम्हारा धंधा नहीं चलने देंगे।
अंत में फिर एक बार सूर के समय की चर्चा। एक पद में देखिए कि वे किस तरह अपने समय को बूझते हैं। इस पद में समय की क्रूरता और उससे निपटने के लिए आवश्यक सजगता दोनों का उल्लेख है-
हम अहीर ब्रजवासी लोग
ऐसे चलौ हंसै नहिं कोऊ, घर में बैठि करौ सुख भोग

सिर पै कंस मधुपुरी बैठ्यों छिनकहि में करि डारै सोग
फूंकि फूंकि धरनी पग धारौ, महा कठिन है समौ अजोग।

कंस तो द्वापर में था फिर सूर कलयुग में किस कंस की बात कर रहे हैं। जाहिर है कि वे अपने समय के कंस की बात कर रहे हैं जो क्षण भर में ही शोक रच सकता है। सूरदास समौ अजोग यानी कठिन समय की बात करते हैं पर हमारा समय तो और भी अजोग है। जिधर नजर डालते हैं उधर ही कोई कंस मुस्कराता नजर आता है। लिहाजा बहुत ही फूंक-फूंक कर कदम रखने की जरूरत है। खासकर इस समय जब हम अपने भाग्यविधाता का चुनाव करने जा रहे हैं।

Tuesday, March 17, 2009

एक युवा कवि के पहले कविता संग्रह का स्वागत करें


युवा कवि विजय गौड़ का कविता संग्रह सबसे ठीक नदी का रास्ता हाल में ही प्रकाशित हुआ है। उसमें कई ऐसी कविताएं हैं जो दिल को छू जाती हैं। उसी संग्रह से कुछ ऐसी ही कविताएं पेश हैं। पढ़ें और अगर अच्छी लगें तो विजय को बधाई दें। अगर संग्रह खरीदना चाहें तो आप सीधे विजय से संपर्क कर सकते हैं।


पिता का नाम

एक
बर्तनों को साफ करते हुए
मां कई बार सहला देती है
पिता
को उनके नाम से
जबकि
पिता चारपाई पर लेटे हैं

बर्तनों पर खुदा
पिता
का नाम
हर
बार घिसता है
और
बर्तनों पर की
पीली
चमक-सा
पिता के चेहरे पर
बहुत
कोशिशों के बाद
खिंची
मुसकान-सा
चमकता है पिता का नाम ।


दो


पिता का नाम
बर्तनों पर ज्यों का त्यों है
सिर्फ
नहीं हैं पिता
पिता
का नाम ही
चल
रहाहै
बर्तनों के साथ-साथ ।


तीन


अभी तो मां जिन्दा है
जो
सहला देती है
पिता को उनके नाम से
पर
जब नहीं होगीं मां
क्या
तब भी सहलाया जायेगा
पिता का नाम ?


चार

ये बर्तन इतने पुराने हो चुके हैं
कि अब
नहीं चल सकता इनसे काम
खरीदनें
ही होगें
अब
नये बर्तन


पर क्या उन पर भी
लिखा
जायेगा
पिता
का नाम
जबकि पिता नहीं हैं
मांभी नहीं
सिर्फ
हूं में


विजय गौड़ का परिचय
जन्म मई 1968, देहरादून।शिक्षा एम.ए. हिन्दी।रचनाकर्मः रंगकर्म, पहाड़ों के जन जीवन को जानने समझने के लिए दुर्गम पहाड़ीक्षेत्रों की यात्रायें, शतरंज खेलना। कविता, कहानी, समीक्षात्मक टिप्पणी,यात्रा वृतांत और जो कुछ इन सब में न अट पा रहा हो, पर जिसेलिखना जरुरी जान पड़ रहा हो, लिखना। कुछ रचनायें समयांतर, पहल, प्रगतिशील वसुधा, कथन, वागर्थ, कृति ओर, वर्तमान साहित्य, कथादेश, संडे-पोस्ट, शब्द आदि पत्र-पत्रिकाओं में जगह पाती रही। 1989 से 2006 तक लिखी कविताओं का संग्रह ‘‘सबसे ठीक नदी का रास्ता’’ प्रकाशित। 1989-90 के शु3आती दौर में कविता फोल्डर ‘‘फिलहाल’’ का सम्पादन। वर्तमान में इंटरनेट की चिट्ठाकारी ‘‘लिखो यहां वहां’’ चिट्ठे पर समय-समय में लेखन और अन्य रचनाकारों की रचनाओं का प्रकाशन।

चिट्ठे का लिंक: http://likhoyahanvahan.blogspot.कॉम संप्रति ः आर्डनेंस फैक्ट्री देहरादून में कार्यरत।ें

संपर्क ः सी-24/9 आर्डनेंस फैक्ट्री एस्टेट, रायपुर, देहरादून- 248008।फोन ः घर. 0135-2789426, मो. 09411580467



Monday, March 2, 2009

अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया!


सुबह आए कुछ फोनों से पता चला की आज मेरा जन्म-दिन है। लोगों की बधाइयां ली, धन्यवाद किया और लगे
हाथों अपने मन को भी खुश कर लिया। सुबह-सुबह मन खुश हो गया तो कुछ गुनगुनाने की इच्छा हुई। पर ऐसे खुशनुमा समय में भी 'जय हो' जैसी कोई उल्लसित पंक्तियाँ नहीं याद आईं। याद आयीं मुक्तिबोध की बीहड़ पंक्तिया, जो अब तक के किए धरे पर ही सवाल उठाती हैं:

दुःखों के दाग़ों को तमग़ों-सा पहना,
अपने ही ख़यालों में दिन-रात रहना,
असंग बुद्धि व अकेले में सहना,
ज़िन्दगी निष्क्रिय बन गयी तलघर,

अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया!
अब अगले साल इन सवालों का जवाब ढूंढने की कोशिश करूँगा। इसके अलावा और क्या कह सकता हूँ ख़ुद से।

Tuesday, January 27, 2009

अंधेरे पाख का चाँद और दिल्ली में दोआबे का कवि


वरिष्ठ कवि केदार नाथ सिंह को हाल में ही भारत भारती सम्मान देने की घोषणा हुई है। इस बहाने प्रस्तुत हैं केदार जी की तीन कवितायें और उनकी कविताओं पर मेरी एक संक्षिप्त टिपण्णी, जो हरियाणा साहित्य अकादेमी की पत्रिका हरिगंधा के नए अंक में प्रकाशित हुई है।

अंधेरे पाख का चाँद

जैसे जेल में लालटेन
चाँद उसी तरह
एक पेड़ की नंगी डाल से झूलता हुआ
और हम
यानी पृथ्वी के सारे के सारे क़ैदी खुश
कि चलो कुछ तो है
जिसमें हम देख सकते हैं
एक-दूसरे का चेहरा!

नए शहर में बरगद

जैसे मुझे जानता हो बरसों से
देखो, उस दढिय़ल बरगद को देखो
मुझे देखा तो कैसे लपका चला आ रहा है मेरी तरफ़
पर अफ़सोस
कि चाय के लिये मैं उसे घर नहीं ले जा सकता

हाथ

उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए
मैंने सोचा
की दुनिया को हाथ की तरह
गर्म और सुंदर होना चाहिए।

-केदारनाथ सिंह


दिल्ली में दोआबे का कवि


अरुण आदित्य

केदारनाथ सिंह दिल्ली में रहते हैं, पर तीन दशक से यहां रहते हुए भी वे ग्रामीण संवेदना के कवि हैं। छल-बल की इस राजधानी में भी वे अपने आस-पास गंगा-सरयू के दोआबे का एक गांव बसा लेते हैं। यह गांव अपनी भौतिक उपस्थिति में नहीं, बल्कि केदार जी की चेतना में बसता है। इस गांव से संबंध बनाए रखने क लिए वे बार-बार स्मृतियों में जाते हैं। सहज ग्रामीण संवेदना उन्हें एक विशिष्ट काव्य-दृष्टि देती है। इस काव्य-दृष्टि का ही कमाल है कि बरामदे में रखी हुई कुदाल सिर्फ एक भौतिक वस्तु नहीं रह जाती, बल्कि एक चुनौती बन जाती है। कवि का विजन कुदाल की भौतिक उपस्थिति को श्रमजीवी वर्ग की उपेक्षा और विक्षोभ का प्रतीक बना देता है। सदी क इस अंधकार में जिसका कद धीरे-धीरे बढ़ रहा है और जिसे दरवाजे पर छोडऩा खतरनाक है, सडक पर रख देना असंभव और आभिजात्य घर में जिसके लिए कोई जगह नहीं है। ऐसे में उस कुदाल का क्या किया जाए, यह एक बहुत बड़ा प्रश्न बन जाता है। केदार जी की कविता में यह धार लोकजीवन से उनके जुड़ाव की वजह से आई है, जहां चीजों के साथ लोगों के संबंध बड़े रागात्मक होते हैं। मानसून की प्रथम बौछार के बाद जब पहली बार खेत में हल भेजा जाता है तो उसकी पूजा की जाती है। यही वे संस्कार हैं जो चकिया (बलिया) के गोबर से लीपे आंगन से दिल्ली के आधुनिक या उत्तर आधुनिक जीवन तक केदार जी का पीछा करते हैं। और केदार जी भी इनसे पीछा छुड़ाने के बजाय इन्हें आत्मसात करके बचाए रखने का हरसंभव प्रयास करते हैं। केदार जी वास्तव में लोकजीवन की संवेदना के कवि हैं, पर उनकी दृष्टि वैश्विक है। दरअसल लोक-राग ने ही उनके मन में काव्य के बीज बोए हैं। अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था- 'गांव की स्त्रियां अल सुबह गाती हुई गंगा नहाने जाती थीं। मैं एक शिशु की तरह रजाई में लिपटा उन्हें सुनता था। उन्हीं आरंभिक आवाजों में कहीं मेरे भीतर काव्य के स्फुरण के पहले बीज थे।' सिर्फ स्फुरण की बात नहीं है, केदार जी की कविता पर नजर डालें तो 'अभी बिलकुल अभी' से लेकर 'उत्तर कबीर' तक उनकी रचना-यात्रा में लोकजीवन और उससे जुड़ी हुई स्मृतियां बार-बार उनकी कविता में आती हैं। तीस वर्षों से दिल्ली में रहते हुए भी वे अपने मूल स्थान से संबंध बनाए हुए हैं। हालांकि समय की जटिलता बढऩे के साथ इस संबंध में भी जटिलता आई है। शुरुआत में यह संबंध 'मेरो मन अनत कहां सुख पावे' की तर्ज पर था, लेकिन अब उनके मन में सवाल भी उठता है कि मेरो मन अनत क्यों नहीं सुख पावे? बाद की कविताओं में यह प्रश्नाकुलता काफी मुखर रूप में देखने को मिलती है। स्मृतियों में बार-बार लौटने वाले केदार जी अब खुद से ही सवाल भी करने लगे हैं-
एक बूढ़े पक्षी की तरह लौट-लौटकर
मैं क्यों यहां चला आता हूं बार-बार।
क्यों चला आता हूं बार-बार कहते हुए उन्हें अपने आने को लेकर कोई व्यर्थताबोध नहीं है, बल्कि उनकी चिंता के मूल में यह है कि अब आ तो गया हूं पर क्या करूं। ऐसे समय में उनकी एक चिंता यह भी होती है कि- मिलूं पर किस तरह मिलूं कि बस मैं ही मिलूं और दिल्ली न आए बीच में। दरअसल वे जन से एक ऐसा जुड़ाव चाहते हैं जिसमें छद्म का कोई आवरण न हो। कि जब वे लोगों से मिलें तो बीच में सिर्फ सत्य हो, निरावृत सत्य। सत्य का यह खुलापन अगर चुभता भी हो तो उन्हें यह चुभन स्वीकार्य है। 'पोस्टकार्ड' कविता में वे लिखते हैं-
यह खुला है इसलिए खतरनाक है
खतरनाक है, इसलिए सुंदर।
और ये जो 'सुंदर' है इसकी तलाश ही केदारनाथ सिंह की कविता का मूल स्वर है। अपने प्रारंभिक दिनों में इस सुंदर की प्राप्ति की आकांक्षा को बड़े सहज रुप में कह देते थे कि - दुनिया को हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए। लेकिन अब उनके पास इस 'चाहिए' के लिए लंबी फेहरिश्त है-जिसमें कोहरा भी हैऔर बकाइन के पत्ते और नीलगायों के खुर और आंखों की वह आवाज जो कानों को कभी सुनाई नहीं पड़ती और न जाने क्या-क्या...इस जटिल समय से जूझते हुए केदार जी की काव्य-दृष्टि यह भी देख लेती है कि इस 'चाहिए' की राह इतनी आसान नहीं है। इसकी राह में अमेरिका जैसे पहाड़ हैं और धर्मांधता जैसे गड्ढे भी। यथार्थ से यह मुठभेड़ केदार जी की कविता को नई धार देती है। वास्तव में केदार जी की कविता की धार तलवार की धार की तरह नहीं बल्कि पानी की धार जैसी है जो अपनी तरलता के बावजूद तीव्र होने पर लोहे की मोटी-मोटी चद्दरों को भी काट देती है। कठोर से कठोर वास्तविकता को अभिव्यक्त करते हुए वे अपनी भाषा की तरलता को बचाए रखते हैं। राजनीतिक शब्दावली से बचते हुए किस तरह राजनीतिक कविता लिखी जा सकती है, इसका सटीक उदाहरण केदार जी की 'शिलान्यास' और 'संतरा' शीर्षक कविताएं हैं। 'शिलान्यास' कविता में वे सोवियत संघ के ध्वस्त होने और इस विध्वंस के बावजूद माक्र्सवाद के प्रति उम्मीद को खूबसूरत बिंब के जरिए व्यक्त करते हैं जिसमें ध्वस्त पुल के पांयों पर रोशनी पडऩे से वे एसे चमक रहे हैं जैसे नए पुल का शिलान्यास किया गया हो। इसी तरह अर्नेस्तो कार्दिनाल के लिए लिखी 'संतरा' शीर्षक कविता में वे साम्राज्यवाद शब्द का उल्लेख किए बिना अमेरिका की साम्राज्यवादी नीति की बखिया एक संतरे के माध्यम से जिस खूबी के साथ उधेड़ते हैं, वैसा हर कवि के लिए संभव नहीं है। इस संदर्भ में उनकी 'कुएं' शीर्षक कविता भी उल्लेखनीय है-
कुओं को ढक लिया है घास ने
क्यों कुओं ने क्या बिगाड़ा घास का
बिगाड़ा तो कुछ नहीं
बस घास का फैसला कि अब कुएं नहीं रहेंगे।

असहिष्णुता और फासिज्म के खिलाफ इससे बेहतर टिप्पणी और क्या हो सकती है। व्यवस्था परिवर्तन की बात तो सब करते हैं, पर केदार जी की दृष्टि इस बात को नजरअंदाज नहीं कर सकती कि दुनिया बदलने का दम भरने वाले लोग अपने पड़ोस के किसी अन्याय को कैसे चुपचाप सह जाते हैं। केदारनाथ सिंह दुनिया को बदलने का दम नहीं भरते। वे तो सिर्फ एक छोटी सी कोशिश करना चाहते हैं-
दुनिया बदलने से पहले
मुझे बदल डालनी चाहिए अपनी चादर
जो मैली हो गई है।

वाकई सब अपने-अपने मन की मैली चादर बदल दें, तो दुनिया कितनी उजली हो जाएगी। साहित्य अकादमी पुरस्कार और दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित केदार जी को हाल में ही भारत-भारती पुरस्कार देने की घोषणा हुई है। उन्हें बहुत सारी बधाइयां।

Tuesday, January 6, 2009

राम चंद्र ने उनका बिगाड़ा क्या था


(आधार प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास उत्तर वनवास का एक अंश आप पहले पढ़ चुके हैं। पेश है उसकेआगे की एक कड़ी। पिछले अंश पर काफी प्रेरक और विचारोत्तेजक टिप्पणियां मिली थीं। इस अंश पर भी आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार है। )
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'' मेरे राम ने उनका बिगाड़ा क्या था?

माया राम ने इस सवाल को दोहराया-तिहराया, लेकिन वहां जवाब देने वाला कोई नहीं था। भीड़ तो कब की छंट चुकी थी।

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राम ने उनका बिगाड़ा क्या था... बताने क लिए रामचंद्र ने मुंह खोलने की कोशिश की, लेकिन मुंह नहीं खुल सका। पूरा मुंह सूजा हुआ था। आंखों के नीचे और गालों पर कत्थई धब्बे पड़ गए थे। राम चंद्र अगर बड़े होते तो समझ जाते कि छोटे कुंवर के खिलाफ मुंह खोलना वाकई बहुत कठिन काम है। पर वे तो बालक थे सो मुंह खोलने की कोशिश कर रहे थे। मुंह से सिवाय एक हल्की सी चीख के कुछ नहीं निकला, लेकिन आंखों से दो बूंद आंसू जरूर टपक कर गालों पर आ गए । रामचंद्र को अपने ही आंसुओं में पूरा घटनाक्रम किसी चल-चित्र की तरह नजर आने लगा—
रिजल्ट पिता को देकर वे गाय चराने जा रहे थे। रास्ता मकान नंबर एक के सामने से था। हवेली के सामने चबूतरे पर दिनेश सिंह का दरबार लगा हुआ था। छोटे कुंवर, यानी दिनेश सिंह के पुत्र राहुल सिंह, चबूतरे के चारों ओर गोल घेरे में साइकल चला रहे थे। तीन-चार बच्चे उनके पीछे-पीछे दौड़ रहे थे। छोटे कुंवर के पास गांव की एकमात्र बच्चा-साइकल थी। इस पर सवारी करना गांव के अधिकांश बच्चों के े लिए एक सपना था। सपना पकड़ से बाहर था, इसलिए वे दौड़ती साइकल के पीछे-पीछे दौड़कर ही छोटे कुंवर के आनंद केे हिस्सेदार बन जाते थे। यह अनोखी हिस्सेदारी थी, जिसमें छोटे कुंवर का मजा कम नहीं होता था और दूसरों को भी अपने हिस्से का मजा मिल जाता था। पर ये ऐसा मजा था जिसके साथ-साथ सजा भी थी। छोटे कुंवर जिस पर गुस्सा होते, लात मार कर भगा देते। पता नहीं यह उस साइकल का आकर्षण था या लगातार लात खाते-खाते उन बच्चों का स्वाभिमान इस तरह मर गया था कि लात खाने के े थोड़ी देर बाद वे फिर साइकल के े पीछे दौड़ते नजर आते। राम चंद्र भी एक बार इस साइकल केे पीछे दौड़े थे। शायद उसी दिन की बात है जिस दिन यह सपन-सवारी खरीद कर लाई गई थी। गांव की गतिहीन जिंदगी में अजूबे की तरह दाखिल हुई इस साइकल को घेर कर बच्चे बूढ़े और जवान लोगों का एक हुजूम खड़ा था। रामचंद्र भी इस भीड़ का हिस्सा थे। छोटे कुंवर साइकल पर बैठ गए। रामचंद्र और दो तीन लड़कों ने साइकल को थाम लिया ताकि गिरे नहीं। छोटे कुंवर धीरे-धीरे पैडल चला रहे थे। चबुतरे के चार-पांच चक्कर लगाने केे बाद अचानक न जाने कैसे संतुलन गड़बड़ा गया और साइकल समेत छोटे कुंवर जमीन पर आ गिरे। उठते ही उन्होंने रामचंद्र को दो तीन थप्पड़ जड़ दिए। रामचंद्र की आंखें भर आईं। डबडबाई आंखों से उन्होंने मौजूद बड़े-बुजुर्गों की ओर देखा। पर वहां किसी को उनकी आंखों में उमड़ आए बादलों को देखने की फुर्सत नहीं थी, सब छोटे कुंवर की धूल झाडऩे में व्यस्त थे। बड़े-बुजुर्गों की यह उपेक्षा थप्पड़ से ज्यादा बड़ी चोट थी। आंखों में उमड़ रहे बादलों को इस चोट के बाद रोक पाना मुश्किल हो गया था। पहले एक बूंद टपकी। फिर दूसरी। फिर तीसरी। और फिर लगातार जलधार।

बहते आंसुओं के बीच रामचंद्र ने खुद से पूछा— आखिर मेरा अपराध क्या है? तालों के े शहर भोपाल के े जनवादी कवि राजेश जोशी की कविता मारे जायेंगे तब तक नहीं लिखी गई थी, वर्ना वे बड़ी आसानी से समझ जाते कि इस समय सबसे बड़ा अपराध है निहत्थे और निरपराध होना / जो अपराधी नहीं होंगे / मारे जाएंगे। परंतु राम चंद्र के े पास उस समय न तो समाजशास्त्रीय समझ थी और न ही राजेश जोशी की यह कविता, लिहाजा वे यह समझ पाने में असमर्थ थे कि उनका अपराध क्या है?

उस दिन के बाद वे छोटे कुंवर की साइकल के पीछे कभी नहीं दौड़े। जब भी वे उन्हें साइकल चलाते देखते हैं, उन्हें अपना अपमान याद आ जाता है। आज फिर उन्हें अपना अपमान याद आ गया। इस दृश्य से अपने को ओझल करने की गरज से वे तेज-तेज कदमों से चलने लगे। अचानक उन्हें छोटे कुंवर की आवाज सुनाई दी-

''रमुआ जरा इधर आ।"

राम चंद्र पास आ गए। अब तक छोटे कुंवर ने साइकल नीम के पेड़ से टिका दी थी। आते ही रामचंद्र के गाल पर दो तमाचे जड़ दिए। राम चंद्र ी समझ में कुछ नहीं आया पर अगले ही क्षण उन्हें यह बता दिया गया कि उनका अपराध क्या है—

''ससुरऊ सारे गांव में घूम-घूम के बता रहे हो कि तुम फस्ट आए हो और मैं सेकंड। ई लो फस्ट आने का इनाम।" कहते हुए छोटे कुंवर ने दो थप्पड़ और जड़ दिए थे।

''पर मैं तो गांव में किसी के े यहां गया ही नहीं था। स्कूल से सीधा अपने घर गया था। पिता जी को रिजल्ट दिया और गाय-बछिया लेकर े इधर आ गया। इस बीच न कोई मुझसे मिला और न ही मैंने किसी को कुछ बताया।"

राम चंद्र ये सब कहना चाहते थे, लेकिन सुनता कौन? छोटे कुंवर को तो लात-जूते चलाने से ही फुर्सत नहीं थी। पीटते-पीटते थक गए तो पीठ पर एक लात मार कर बोले — भाग साले। पर भागने की ताकत किसमें थी? राम चंद्र की आंखों के े आगेr तो अंधेरा छाने लगा था।काले अंधेरे में लाल-नीले पीले छल्ले नाचते हुए नजर आ रहे थे। जमीन गोल-गोल घूमती लग रही थी। हिम्मत बटोरकर खड़े हुए। दो कदम चले और फिर गिर पड़े।
इसके बाद वे कैसे अपने घर तक पहुंचे थे, यह एक पहेली है।

राम चंद्र का कहना है- ''जब मैं गिर पड़ा तो एक बड़ा सा बंदर और उसने मुझे अपने कंधे पर उठा लिया। इस·े बाद मुझे कुछ होश नहीं रहा। होश आया तो मैं अपने घर के सामने पड़ा था।"

''निश्चित ही वे हनुमान जी थे, जो मेरे राम की मदद के लिए आए थे।" यह मां का विश्वास था। मां अत्यंत धार्मिक महिला थीं। एक डेढ़ घंटे रोज पूजा-पाठ करती थीं।रामचरित मानस का सुंदर कांड और गीता का आठवां अध्याय रोज पढ़ती थीं। हनुमान जी पर उनका विश्वास अटल था। पर गांव में दो-तीन लोग ऐसे भी थे जिनका दावा था कि उन्होंने राम चंद्र को गिरते-पड़ते, उठते-संभलते-घिसटते हुए झोपड़ी तक आते अपनी आंखों से देखा था।

बहरहाल यह आपबीती और आंखों-देखी की विश्वसनीयता का द्वंद्व था और लोग किसी एक पर एकमत नहीं थे। कुछ लोग आपबीती के े पक्ष में खड़े थे तो कुछ आंखिन-देखी के े े समर्थन में। सबके पास अपने-अपने तर्क थे और तर्कों की पेंच-लड़ाई के े बीच सच की पहचान मुश्किल हो गई थी।
लेकिन माया राम इस सच को समझ गए थे कि रामचंद्र का कस्तूरी होना अब रंग दिखाने लगा है। इस घटना के बाद से वे इस कस्तूरी को अपने भय की गोदड़ी में छुपा कर रखने लगे थे। पर वे इसे छुपाने की जितनी कोशिश कर रहे थे, सुगंध उतनी ही तेजी से फैलती जा रही थी।

Wednesday, December 10, 2008

जो किसी की प्यास बुझाना चाहते हैं


लोटे


देवताओं को जल चढ़ाने के काम आते रहे कुछ

कुछ ने वजू कराने में ढूंढ़ी अपनी सार्थकता

प्यासे होंठों का स्पर्श पाकर ही खुश रहे कुछ

कुछ को मनुष्यों ने नहाने या नित्यकर्म का पात्र बना लिया

बहुत समय तक अपनी अपनी भूमिका में सुपात्र बने रहे सब


पर आजकल बदल गई हैं इनकी भूमिकाएं

जल चढ़ाने और वजू कराने वाले लोटे

अब अकसर लड़ते झगड़ते हैं

और बाद में शांति अपीलें जारी करते हैं

काफी सुखी हैं ये लोटे

पर सबसे ज्यादा सुखी हैं वे, जो बिना पेंदी के हैं
परेशान और दुखी हैं वे, जो किसी की प्यास बुझाना चाहते हैं

आजकल पात्रों की सूची से गायब होता जा रहा है उनका नाम

जग -मग के इस दौर में लोटों का क्या काम?


राष्ट्रीय लुढ़कन के इस दौर में

जब गेंद की तरह इस पाले से उस पाले में

लुढ़क रही हैं अंतरात्माएं

कितना आसान है वोटों का लोटों में तब्दील हो जाना

ये जो आसानी है

कितनी बड़ी परेशानी है ।


- अरुण आदित्य

(मध्य प्रदेश साहित्य परिषद की पत्रिका साक्षात्कार में प्रकाशित। हिमाचल के युवा कवि प्रकाश बादल इस कविता को यहां देने के लिए बार-बार आग्रह करते रहे हैं। )

Friday, October 24, 2008

पहाड़ झांकता है नदी में


मनाली

पहाड़ झांकता है नदी में
और उसे सिर के बल खड़ा कर देती है नदी
लहरों की लय पर
हिलाती-डुलाती, नचाती-कंपकंपाती है उसे

पानी में कांपते अपने अक्स को देखकर भी
कितना शांत निश्चल है पहाड़
हम आंकते हैं पहाड़ की दृढ़ता
और पहाड़ झांकता है अपने मन में -
अरे मुझ अचल में इतनी हलचल
सोचता है और मन ही मन बुदबुदाता है-
किसी नदी के मन में झांकने की हिम्मत न करे कोई पहाड़


-अरुण आदित्य
यह कविता मनाली शीर्षक कविता शृंखला की छह कविताओं में से एक है। वागर्थ में प्रकाशित।
साथ में प्रकाशित पेंटिंग विश्वप्रसिद्ध चित्रकार निकोलाई रोरिक की है। पेंटिंग का शीर्षक है-शी हू लीड्स।