Wednesday, September 3, 2008

झोपड़ियों का लैंड स्केप और गरीबी की रायल्टी


( करीब दो माह बाद ब्लॉग पर वापस लौटा हूँ। उपन्यास 'उत्तर -वनवास ' का काम लगभग पूरा हो गया है। अब थोड़ी राहत मिली है। एक छोटा -सा अंश यहाँ दे रहा हूँ। इस पर आप लोगों के विचार मेरे लिए मार्गदर्शक होंगे। कभी लघुकथा तक न लिखनेवाले ने सीधे उपन्यास में हाथ डाल दिया है। पता नहीं कुछ बात बन भी रही, या या वैसे ही कागज काले किए जा रहा हूँ। )
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घनी बबुराही और बंसवारी के बीच वह एक झोपड़ी थी।



नहीं, एक नहीं तीन झोपडिय़ां थीं, एक दूसरे से लगी हुई। जैसे एक मकान में कई कमरे होते हैं। यानी यह तीन झोपडिय़ों का मकान था। लेकिन मकान की प्रचलित अवधारणा के मुताबिक इसे मकान नहीं कहा जा सकता था। मकान के होने के लिए दीवारों और छत का होना जरूरी है। पर यहां तो छत के नाम पर तीन छप्पर थे, जो बबूल की थूनों और बांस की बड़ेर पर टिके हुए थे। दीवार की जगह एक झोपड़ी में फूस की टाटियां लगी हुई थीं, बाकी दो में वह भी नहीं थीं। बहरहाल आप इसे मकान मानें या न मानें, लेकिन सन् 1952 के लोकसभा चुनावों की मतदाता सूची में यह मकान नंबर 151 के रूप में दर्ज था, जिसमें दो मतदाता रहते थे। चूंकि गांव में कुल 151 मकान थे, इसलिए इसे गांव का अंतिम मकान और इसमें रहने वाले आदमी को गांव का अंतिम आदमी (या अंतिम मकान में रहने वाला आदमी) कहा जा सकता था। सूची में मकान नंबर एक की जगह दिनेश सिंह की हवेली तनी थी। दिनेश सिंह गांव के पूर्व जमींदार और वर्तमान सरपंच थे।



अंतिम आदमी या अंतिम मकान में रहने वाले आदमी का यह मकान नंबर 151 बबूल और बांस के झुरमुटों से घिरा होने के कारण किसी सुंदर भूदृश्य-सा लगता था।



बांस की कोठों में कई जहरीले सांप रहते थे, और बबूल के कांटे अक्सर इस घर में रहने वालों को चुभते थे; लेकिन यह बांस और बबूल ही थे, जो इस भूदृश्य में हरा रंग भरते थे। एक कलाकार इधर से गुजरते हुए इस मनोरम दृश्य को देखकर ठिठक गया था। उसने बबुराही और बंसवारी के बीच बसी इन झोपडिय़ों के कई स्केच बनाए थे। बाद में इन्हीं स्केचों में से एक को डेवलप करके उसने एक सुंदर भूदृश्य बनाया था, जिसे एक विदेशी कंपनी ने एक हजार डॉलर में खरीदा था।



मकान नंबर 151 में रहने वालों को तो पता भी नहीं होगा कि वे एक बहुमूल्य कलाकृति में रहते हैं। पता भी होता तो उनकी जीवनचर्या में क्या कोई फर्क पड़ जाता? क्या वे कलाकार से अपनी गरीबी की रॉयल्टी मांगते? ये सवाल काल्पनिक हैं, इनके जवाब भी काल्पनिक ही होंगे, लेकिन यह सच था कि वे एक हजार डॉलर की कीमत वाली कलाकृति की वास्तविकता के भीतर रह रहे थे और उन्हें इस बात का पता नहीं था। पता था तो सिर्फ इतना कि वे सांपों और कांटों के बीच एक कठिन जीवन जी रहे थे। लेकिन अपने जीवन-संघर्ष को लेकर वे चिंतित नहीं थे। उनकी एकमात्र चिंता अपने बेटे रामचंद्र के भविष्य को लेकर थी।



हालांकि उनके नाम दशरथ और कौशल्या नहीं, मायाराम और मंगला थे, लेकिन उन्होंने राम नवमी के दिन जनमे इस बेटे का नाम रामचंद्र रखा था। रामचंद्र के जन्म के समय पुरोहित जी ने कहा था— मायाराम! तुम्हारी तो किस्मत चमक उठी। यह तो कस्तूरी है, कस्तूरी। देखना, इसकी सुगंध बहुत दूर तक जाएगी। वाकई इस कस्तूरी के आते ही दो लोगों का यह परिवार हिरन की तरह चौकड़ी भरने लगा था। मायाराम और मंगला को लगता जैसे उनका अपना बचपन लौट आया हो। जिस समय वे बच्चों की भूमिका में होते, गरीबी नेपथ्य में चली जाती। इस पवित्र खेल को बिगाडऩे की हिम्मत शायद उसमें नहीं थी। या फिर वह थोड़ी ढील देकर देखना चाहती होगी कि देखो कितना उड़ पाते हैं। रामचंद्र जैसे-जैसे बड़े हो रहे थे, वैसे-वैसे कस्तूरी की सुगंध भी तीव्र हो रही थी। हिरन को नहीं पता होता है कि कस्तूरी उसकी नाभि में है, इसलिए वह उसकी सुगंध की खोज में पागल बना भटकता रहता है। यदि उसे पता चल जाए कि कस्तूरी उसकी नाभि में है और उसकी सुगंध ही उसकी सबसे बड़ी दुश्मन है तो संभव है कि इस सुगंध के बारे में उसके विचार बदल जाएं। शायद न भी बदलें, क्योंकि हिरन आखिर हिरन है, कोई मनुष्य नहीं। शायद उसे फख्र हो कि उसके पास एक ऐसी कीमती चीज है, जिसके लिए कोई उसकी जान भी ले सकता है। लेकिन गांव के अंतिम मकान में रहने वाला यह परिवार हिरन नहीं था, बल्कि कस्तूरी मिलने के आह्लाद में हिरन हो गया था। शुरू-शुरू में कस्तूरी की महक परिवार वालों को अच्छी लगी थी। लेकिन वे दुनियादार लोग थे, उन्हें बहुत जल्दी समझ में आ गया कि हिरन की सबसे बड़ी दुश्मन कस्तूरी ही होती है। लिहाजा जैसे-जैसे कस्तूरी की सुगंध तीव्र हो रही थी, वैसे-वैसे उनका डर बढ़ रहा था ।



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इस तरह बबूल के कांटों, बांस-कोठ के सांपों और मां-बाप के डर के बीच रामचंद्र बड़े हो रहे थे। उनका बड़ा होना कुछ लोगों को छोटा बना रहा था। रामचंद्र की ऐसी कोई इच्छा नहीं थी। पर, इच्छा से क्या होता है? भगवान राम भी कहां चाहते थे कि सीता स्वयंवर का वर्णन करते हुए तुलसीदास को लिखना पड़े कि - प्रभुंहि देखि नृप सब हिय हारे, जनु राकेश उदय भएं तारे।



यदि राम चंद्र मकान नंबर एक में पैदा हुए होते तो उनके बड़े होने से दूसरों का छोटा होते जाना मां-बाप के लिए गर्व का विषय होता। लेकिन उनके मकान का नंबर 151 था, लिहाजा यह गर्व का नहीं चिंता का विषय था। पर हमेशा से ही ऐसा ऐसा नहीं था। शुरू-शुरू में एक बार उन्हें भी गर्व हुआ था। राम चंद्र उस समय नौ साल के थे। चौथी कक्षा का रिजल्ट लेकर आए थे। रिजल्ट क्या था, सपनों का एक घोड़ा था! आते ही घोड़े की रास पिता को थमा दी थी- ''पूरी कक्षा में अव्वल आया हूं। छोटे कुंवर को दूसरा स्थान मिला है।'' राम चंद्र का वाक्य पूरा होते-होते पिता सपनों के इस घोड़े पर सवार होकर अपनी झोपड़ी बनाम एक हजार डॉलर की कलाकृति से बाहर निकल गए थे। बाहर जाते हुए चूंकि वे घोड़े पर सवार थे, इसलिए न तो कोई कांटा चुभा था और न ही कोई सांप दिखा था। जिंदगी भर कांटों और सांपों के बीच पैदल घिसटने वाले पिता को इस घोड़े पर बड़ा आनंद आ रहा था। थोड़ी दूर जाकर उन्होंने पलट कर देखा। मकान नंबर 151 के आस-पास का दृश्य वाकई एक सुंदर कलाकृति-सा लगा। यह कलाकृति उस पेंटर द्वारा बनाए गए भूदृश्य जैसी ही थी। बस एक छोटा सा अंतर था — तीन झोपडिय़ों की जगह तीस कमरों की हवेली नजर आ रही थी । हवेली का नक्शा बिल्कुल मकान नंबर एक की तरह था।



मकान नंबर एक मायाराम की कल्पना का घर था। उनके पिता ने बताया था कि चार पुश्त पहले यह हवेली उन्हीं के पूर्वजों की थी। यह हवेली मायाराम के पुरखों के हाथ से निकल कर दिनेश सिंह के पुरखों के पास कैसे पहुंच गई, इसकी एक लंबी गाथा है, जिसे अगर अभी यहां लिखना शुरू किया तो 'ढाई घर' जैसा एक उपन्यास तो इसी प्रसंग में पूरा हो जाएगा और रामचंद्र की कथा अलग ही पड़ी रह जाएगी। मायाराम के पिता ने जो बताया था, उसका सार यह था कि उनके पुरखे बहुत सीधे थे और उनकी सीधाई का फायदा उठाकर दिनेश सिंह के पुरखों ने हवेली पर कब्जा कर लिया था। उधर दिनेश सिंह की तरफ से बताया जाने वाला इतिहास कुछ और कहता था। इतिहास हमेशा विजेता का पक्ष लेता है, सो राम चंद्र के परिवार को छोडक़र सारा गांव दिनेश सिंह के द्वारा बताए जाने वाले इतिहास को सही मानता था। पर गांव में एक दो ऐसे लोग भी थे जो दोनों के इतिहास से अलग एक नया ही इतिहास बताते थे। मतलब यह कि इतिहास पर काफी धूल थी... और इतिहासकारों के पास पहले ही इतने विवादास्पद मुद्दे पेंडिंग हैं कि उन्हें एक और विवाद में उलझाने के बजाय आइए फिलहाल की चिंता करें।

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फिलहाल तो मायाराम तीन झोपडिय़ों की हैसियत से बाहर स्वप्न-अश्व पर सवार हैं। और इस समय उन्हें तीन झोपडिय़ों की जगह तीस कमरों की हवेली नजर आ रही है। वे इस घोड़े से उतरना नहीं चाहते हैं। इस पर सवार कोई भी व्यक्ति उतरना नहीं चाहता है। पर कोई ज्यादा समय तक इसकी पीठ पर टिक भी नहीं सकता है। अधिकांश लोग औंधे मुंह गिरकर ही इसकी पीठ खाली करते हैं। चंद लम्हों की सवारी के बाद मायाराम के साथ भी यही हुआ । घोड़े से गिरने पर उन्होंने देखा कि उनके सपने लहूलुहान हैं। सपने ही नहीं, उन्हें अपना यथार्थ भी लहूलुहान दिखा : राम चंद्र के सिर से बुरी तरह खून बह रहा था। बेटे के सिर से खून बहता देखकर मायाराम का अपना खून खौल उठा। गुस्से में उन्होंने तलवार निकालने के लिए कमर की तरफ हाथ बढ़ाया, लेकिन वहां न तो तलवार थी और न म्यान। अलबत्ता एक चुनौटी जरूर वहां खुंसी हुई थी। तलवार की जगह चुनौटी हाथ में आने पर उन्हें होश आया कि वे घोड़े पर चढ़े जमींदार नहीं, अपनी झोपड़ी के बाहर खड़े मायाराम हैं। होश में आते ही जोश ठंडा हो गया। रौद्र रस को पीछे धकेल कर करुण रस आगे आ गया। आदि कवि की कविता की पहली पंक्ति सरीखा आर्त-वाक्य उनके मुंह से निकला — ''किस कसाई ने किया मेरे लाल का ये हाल? ''



जवाब में चुप्पी।



मतलब, कविता को समझने वाला वहां कोई नहीं था। इसलिए वे सीधे अकविता पर आ गए — ''किस मादरचोद ने....'' मायाराम वाक्य पूरा कर पाते इसके पहले ही किसी ने उनका मुंह दाब दिया।



'' जबान को लगाम दो मायाराम! बात आगे चली गई तो अनर्थ हो जाएगा।'' किसी और ने कहा।



''छोटे कुंवर को गाली देने का अंजाम जानते हो ? '' किसी तीसरे ने चेताया।



छोटे कुंवर का नाम सुनकर मायाराम सन्न रह गए — यह मैंने क्या कर दिया। ये तो पिट-पिटाकर आया ही है, अब मुझे भी हल्दी मट्ठा पिलवायेगा । मां की गाली बकने से पहले मैंने कुछ सोचा क्यों नहीं? पर मैं भी क्या करता, इसका खून देखकर मेरा दिमाग खराब हो गया था। सारी गलती तो इस पिल्ले की है। न ये छोटे कुंवर से पिट कर आता न मेरे मुंह से गाली निकलती। किसी दिन ये मुझे मरवाकर ही रहेगा। अपनी गलती के अंजाम से वे डर गए। पर वे ठाकुर थे। अपने को डरा हुआ कैसे दिखाते। सो डर को मन के एक कोने में दफन कर दिया और वहां से एक सवाल निकाल लाए- '' मेरे राम ने उनका बिगाड़ा क्या था? '' माया राम ने इस सवाल को दोहराया-तिहराया, लेकिन वहां जवाब देने वाला कोई नहीं था। भीड़ तो कब की छंट चुकी थी।

20 comments:

Sandeep Singh said...

पहले लगा काफी लंबी पोस्ट है बाद में इत्मीनान से पढ़ी जाएगी...पर मन नहीं माना और पढ़ना शुरू किया तो अंत में आकर यही लगा कि काश माया राम की जिज्ञासा( "राम ने आखिर किसी का क्या बिगाड़ा था ?") समाप्त होने तक पोस्ट जारी रहती तो अच्छा लगता....

शैलेश भारतवासी said...

अरूण जी,

आज आपकी असक्रियता की शिकायत हुई और आप सक्रिय हो गये, क्या बात है! आप तो पहली ही बार में छक्का मार गये। पुस्तक खरीदूँगा। आपकी शैली पर हल्का-हल्का विनोद कुमार शुक्ल का प्रभाव है और चूँकि मैं उनका फैन हूँ तो आपका तो हो ही गया।

मनीषा said...

आदाब सर....

Udan Tashtari said...

बहुत अच्छा लगा-आप पुनः सक्रिय हो रहे हैं, आपका उपन्यास सफल रहे.शुभकामनाऐं.

cartoonist ABHISHEK said...

shailesh bharatvasi ki baat men dam hai...."आप तो पहली ही बार में छक्का मार गये।"

ravindra vyas said...

मुझे खुशी है कि आपने अपना काम पूरा कर लिया। आशा है, इतने ही बड़े कुछ और अंश भी पढ़वाएंगे। तब शायद कुछ कह पाना संभव हो। अभी तो जल्दबाजी होगी लेकिन इतना जरूर कि इस पर विनोदकुमार शुक्ल का तो कोई असर नहीं दिखता।
बधाई और शुभकामनाएं।

शिरीष कुमार मौर्य said...

मैं विनोद कुमार शुक्ल के असर के बारे में रवीन्द्र व्यास जी की बात से सहमत हूं। एक हिस्सा पढ़कर उत्सुकता जगी है - जल्दी छपे और हमें मिले, यही कामना है।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

अरुण भाई,
आपके इस महत्त्वपूर्ण
सृजन पड़ाव हेतु बधाई.
....और यह अंश मात्र पढ़कर
हम भी हिय हार-से गए हैं !
शीर्षक भी प्रभावशाली है....
जिज्ञासा बढ़ा दी आपने.
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शुभकामनाएँ
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

Arun Aditya said...

शैलेष भाई , विनोद कुमार शुक्ल जी बहुत बड़े लेखक हैं , उनके जैसा लिख पाना मेरे बस की बात कहाँ। मैं रवींद्र और शिरीष जी की बात से आश्वस्त हुआ हूँ कि अच्छा बुरा जैसा भी लिख रहा हूँ, अपनी तरह से लिख रहा हूँ. फ़िर भी आपको मेरे लिखे में आपको शुक्ल जी जैसा कुछ दिखा तो इसे आपकी उदार दृष्टि ही कहूँगा। शुक्रिया।
अभिषेक जी, आप तो अपने कार्टूनों से रोज ही छक्का मरते हैं। संदीप जी और मनीषा, आप दोनों को भी धन्यवाद। संदीप जी आगे का किस्सा भी कुछ दिनों में पढने को मिलेगा।
डॉ जैन साहेब और समीर लाल जी, आप दोनों का शुक्रिया कैसे अदा करूँ।

ब्रजेश said...

उपनयास के लिए शुभकामनाएं। तारीफ के चककर में न पडें तो बेहतर। जहां तक मेरी समझ है। हवेली से निकल कर कोई झोपडी में आ जाना और एकदम से दरिद बन जाने वाला हिससा थोडा जमा नहीं। अगर हवेली मायाराम के पुरखों की थी और उसके मन में दिनेश सिह के परिवार के पति भय नहीं घणा जयादा होगी। उसमें इतना भय थोडी अतिशयोकित सा लग रहा है। एक समय मायाराम के पूवज का बहुत धनी होना अब उसका बिलकुल दरिद होना। उसके बेटे का टाप करना। खुशी से कलपना के घोडे पर सवार होना और गुससे से गाली बकना और भय से सन्न हो जाना। सब अति में घटित लग रहाहै। पूरा उपनयास पढे बिना इस तरह की टिपपणी का दुससाहस कर रहा हूं। शायद आगे उपनयास में मुझे मेरा जवाब मिल सके।

Arun Aditya said...

प्रिय ब्रजेश तुमने कुछ सवाल उठाए, अच्छा लगा। आखिर एक रचना लिखी ही इसलिए जाती है कि उससे कुछ सवाल उठें। वैसे तो तुम्हारे अधिकांश सवालों के जवाब उपन्यास में मिल जाएंगे, फिर भी कुछ बातें करना चाहता हूं, उनमें शायद तुम्हें अपने सवालों के जवाब मिल सकेंगे।
पहला सवाल- हवेली से निकलकर झोपड़ी में आ जाना और एकदम से दरिद्र बन जाना...
- माया राम हवेली से निकलकर अचानक झोपड़ी में नहीं आए हैं। हवेली चार पीढ़ी पहले उनके पूर्वजों के पास थी। पता नहीं कितनी प्राकृतिक और मानव-निर्मित आपदाओं को झेलते हुए क्रमिक अवनति के शिकार इस वंश का साक्षात्कार तीन झोपडिय़ों की नियति से हुआ था। मैंने उपन्यास में संकेत भी दिया है कि अगर पूरा किस्सा लिखने बैठ गए तो ढाई घर जैसा एक उपन्यास तो इसी प्रसंग में पूरा हो जाएगा और रामचंद्र का किस्सा तो अलग ही धरा रह जाएगा। वैसे भी सुरा-सुंदरी, जुए और पारिवारिक रंजिशों से ही कई जमींदार घरानों को तबाह होते तो आपने भी देखा होगा। हवेली से झोपड़ी में आ जाना नाटकीय लग सकता है, लेकिन कई बार असल जिन्दगी नाटक से भी ज्यादा नाटकीय होती है।
दूसरा सवाल : भय और घृणा के संदर्भ में....
- जिससे आप घृणा करते हैं अगर वह क्रूर और ताकतवर है तो उससे आपको डर भी लगेगा। गुजरात दंगों के दौरान एक रोते-गिडगिडाते मुस्लिम युवक का फोटो सभी अखबारों में छपा था। उसके मन में दंगाइयों के लिए घृणा और भय दोनों रहे होंगे? लेकिन उसका चेहरा तो भय और कातरता को ही अभिव्यक्त कर रहा था। इसके विपरीत जब सद्दाम हुसेन को फांसी दी जा रही थी तो उनके चेहरे पर मौत का भय कम, बुश के प्रति नफरत का भाव ज्यादा झलक रहा था। मतलब यह कि भय और घृणा अलग-अलग व्यक्तियों और अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग तरह से अभिव्यक्ति पाते हैं।
तीसरा सवाल : सब अति में घटित हो रहा है...
-अति कहां है भाई..गरीब के बेटे का टॉप करना क्या अति है। मैंने ऐसे उदाहरण अनेक देखे हैं, आपने भी देखे होंगे। गरीब का बेटा टॉप करे तो पिता का खुश होना और कल्पना के घोड़े पर सवार हो जाना क्या अति है। लगभग हर पिता अपने दमित सपनों को पुत्र के जरिए साकार होते देखना चाहता है। किसी के बेटे का सिर फोड़ दिया गया हो तो गुस्से में उसके गाली बकने को अति मत कहो भइया। इससे सहज अभिव्यक्ति और क्या हो सकती है। और जब माया राम को यह पता चला कि जिसे उन्होंने गाली बकी है, वे सर्वशक्तिमान जमींदार के पुत्र छोटे कुंवर हैं तो उनका डर जाना भी स्वाभाविक ही है। मुझे तो इन सारे कार्य-व्यवहारों में कहीं अति नहीं दिखती।
शुक्रिया कि तुमने सवाल उठाए और मुझे उपन्यास को इस नजर से देखने और इतनी बातें करने का मौका मिला। आगे भी जो सवाल मन में आएं, उठाते रहना।

Anonymous said...

दाज्यू , बहुत बहुत बधाई। दाज्यू का मतलब आप जानते ही होंगे। वही शेखर जोशी वाला दाज्यू। उपन्यास अंश काफी रुचिकर है। शिल्प और कथ्य एकमेव होकर असरदार प्रस्तुति के तौर पर सामने आते हैं। विनोद कुमार शुक्ल की भाषा का प्रभाव तो कहीं नहीं दिखाई देता। आपने खुद की खिलंदड़ी भाषा गढऩे की कोशिश की है। निर्वाह कितना कर पाए हैं, यह तो अगले अंश देखने पर ही तय किया जा सकेगा। अभी तो एक पंखुड़ी ही खुली है। इस पंखुड़ी को देखते हुए फूल के खिलने की उम्मीद निश्चित रूप से की जा सकती है। खिलेगा तो देखेंगे।
- हरि मृदुल

varsha said...

upanyas ka intazaar rahega. apni tippani me jo ghrna aur bhay ki vyakhya ki, bahut behtar he.

kaushlendra said...

उत्तर वनवास उपन्यास के अंश को पढ़कर अच्छा लगा.पाठको को यह बांधे रखने में सफल है.प्लाट को लेकर असहमति हो सकती है ,इसमें थोड़े वास्तविक तथ्य और डाले जाये तो रोचकता बढ़ जायेगी .पकवान की खुसबू मिल रही है ,जल्द परोसा जाये तो स्वाद का भी पता चले.

नव्‍यवेश नवराही said...

आपकी शैली अच्‍छी है. नॉवेल पाठक को अपने साथ-साथ चलाने में सक्षम है.

Ek ziddi dhun said...

mujhe pata hi nahi tha ki aap laut aye hain blog par. abhi post nahee padhee, ab padhoonga

Arun Aditya said...

हरी जी, वर्षा जी, नवराही जी कौशलेन्द्र जी और धीरेश भाई आप सब को भी धन्यवाद।

प्रदीप मिश्र said...

इस उपन्यास से बहुत उम्मीद है। तुम्हारी भाषा से खूब परिचित हूँ। यहाँ पर-खालिस अरूण है। वही अरूण जो भाषा संस्कार कविताओं से ग्रहण करता है। जल्दी पूरा करों। छपने दो, फिर बाँचेंगे और जाँचेंगे। अगर कुछ और अंश क्रम से दे सको तो अच्छा होगा। माफ करना काफी देर से पढ़ रहा हूँ।

Roushan Jha said...

sir itna padhne ke baad man bechain sa ho raha hai, ho raha hai ki kab pura upnyas padhne ko milega. pata nahi yahan jo aapne upnyas ka ansh post kiya hai uska jo antim hissa hai wahi upnyas ka bhi antim hissa hai, lekin ye sach ke bilkul karib hai. aaj sataye hue log dabi juban se hi sahi lekin pratikar karne lage hain jo ki bilkul sahi hai.

hemant sharma said...

अरुण जी, कैसे हैं? हमें भी 'उत्तर वनवास' का इंतज़ार है. हेमंत शर्मा, मुंबई