Wednesday, December 10, 2008

जो किसी की प्यास बुझाना चाहते हैं


लोटे


देवताओं को जल चढ़ाने के काम आते रहे कुछ

कुछ ने वजू कराने में ढूंढ़ी अपनी सार्थकता

प्यासे होंठों का स्पर्श पाकर ही खुश रहे कुछ

कुछ को मनुष्यों ने नहाने या नित्यकर्म का पात्र बना लिया

बहुत समय तक अपनी अपनी भूमिका में सुपात्र बने रहे सब


पर आजकल बदल गई हैं इनकी भूमिकाएं

जल चढ़ाने और वजू कराने वाले लोटे

अब अकसर लड़ते झगड़ते हैं

और बाद में शांति अपीलें जारी करते हैं

काफी सुखी हैं ये लोटे

पर सबसे ज्यादा सुखी हैं वे, जो बिना पेंदी के हैं
परेशान और दुखी हैं वे, जो किसी की प्यास बुझाना चाहते हैं

आजकल पात्रों की सूची से गायब होता जा रहा है उनका नाम

जग -मग के इस दौर में लोटों का क्या काम?


राष्ट्रीय लुढ़कन के इस दौर में

जब गेंद की तरह इस पाले से उस पाले में

लुढ़क रही हैं अंतरात्माएं

कितना आसान है वोटों का लोटों में तब्दील हो जाना

ये जो आसानी है

कितनी बड़ी परेशानी है ।


- अरुण आदित्य

(मध्य प्रदेश साहित्य परिषद की पत्रिका साक्षात्कार में प्रकाशित। हिमाचल के युवा कवि प्रकाश बादल इस कविता को यहां देने के लिए बार-बार आग्रह करते रहे हैं। )

Friday, October 24, 2008

पहाड़ झांकता है नदी में


मनाली

पहाड़ झांकता है नदी में
और उसे सिर के बल खड़ा कर देती है नदी
लहरों की लय पर
हिलाती-डुलाती, नचाती-कंपकंपाती है उसे

पानी में कांपते अपने अक्स को देखकर भी
कितना शांत निश्चल है पहाड़
हम आंकते हैं पहाड़ की दृढ़ता
और पहाड़ झांकता है अपने मन में -
अरे मुझ अचल में इतनी हलचल
सोचता है और मन ही मन बुदबुदाता है-
किसी नदी के मन में झांकने की हिम्मत करे कोई पहाड़


-अरुण आदित्य
यह कविता मनाली शीर्षक कविता शृंखला की छह कविताओं में से एक है। वागर्थ में प्रकाशित।
साथ में प्रकाशित पेंटिंग विश्वप्रसिद्ध चित्रकार निकोलाई रोरिक की है। पेंटिंग का शीर्षक है-शी हू लीड्स।

Monday, September 29, 2008

विष्णु नागर की कविता, रवीन्द्र व्यास की पेंटिंग



नागर जी की ये कविता जब पहली बार पढ़ी तो सचमुच गागर में सागर भरने वाला मुहावरा याद आ गया था। और जब रवीन्द्र की ये पेंटिंग देखी तो फ़िर नागर जी की ये कविता याद आई।रविवार शाम कुछ पुराने मित्रों के साथ नागर जी से आत्मीय मुलाकात हुई। मैंने पूछा कि आपकी कविता अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर दूँ। बोले , बेहिचक डाल दो। रवीन्द्र पहले ही कह चुके हैं कि उनकी पेंटिंग्स का उपयोग करने की पूरी छूट है। तो लीजिये पेश है यह जबरदस्त जुगलबंदी।



जहाँ हरा होगा



जहाँ हरा होगा


वहां पीला भी होगा


गुलाबी भी होगा


वहां गंध भी होगी


उसे दूर-दूर ले जाती हवा भी होगी


और आदमी भी वहां से दूर नहीं होगा।

- विष्णु नागर

Sunday, September 21, 2008

ज्ञानरंजन के कबाड़खाने से


'भोर' पत्रिका का मुख पृष्ठ और ज्ञान दद्दा
...................................................................
(करीब डेढ़ दशक पूर्व मैंने और प्रदीप मिश्र ने मिलकर 'भोर - सृजन संवाद ' नामक पत्रिका शुरू की थी। वरिष्ठ कथाकार और हिन्दी की अत्यन्त महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका 'पहल' के संपादक ज्ञानरंजन जी ने इसका लोकार्पण किया था और उस अवसर पर एक अत्यन्त विचारोत्तेजक व्याख्यान दिया था। बाद में यह व्याख्यान हमने भोर के अगले अंक में प्रकाशित भी किया। भाई रवीन्द्र व्यास ने संभवतः चौथा संसार अख़बार में भी इसे छापा था। ज्ञान जी की पुस्तक कबाड़खाना में भी इसे शामिल किया गया है और ज्ञान जी की उदारता ही है कि इस लेख के अंत में फुट नोट में लिखा है कि यह व्याख्यान इन्दौर में भोर पत्रिका को जारी करते समय दिया गया। यहाँ हम उसी व्याख्यान के कुछ चुनिन्दा टुकड़े दे रहे हैं। देखेंगे कि जैसे यह बिल्कुल आज की बात है। )



हिंदुत्व, भाजपा, कांग्रेस और फासिज्म

ज्ञानरंजन

किसी भी रूप में इतिहास के क्षणों में विफल हो जाना एक लम्बी दिक्कत पैदा कर सकता है, जो आज हमारे देश में पैदा हो गई है। गलती हम सब कर रहे हैं। भाजपा अगर यह सोचती है कि हिंदुत्व जागृत होगा तो यह नासमझी है। शांत, कोमल धर्मात्मा और सात्विक हिंदू पहले से ही अलग है। हिंदू किसान और गरीब श्रमिक पहले ही इस पचडे से अलग है। एक विशाल हिंदू समुदाय है जो हिंदू-अत्याचार का शिकार है। और अब तो हिंदू के और भी विभाजित होने के दिन आ गए हैं। पत्रकार गिरिलाल जैन अपने लेख अपनी जड़ से उध्वस्त राष्ट्रीयता में सही लिखा है कि आज देश में जितने भी विघटन हैं वे सब हिंदू विघटन हैं। पिछड़ी और उन्नत जातियां, दलित और सवर्ण तथा निम्न और उच्च वर्ग- ये सब हिंदू विघटन हैं और आज भारतीय जनता पार्टी और उसके कुसंगियों ने हिन्दुओं के सर्वनाश की पूरी व्यस्था कर ली है। अब एक विशाल कट्टर,अपराधी हिंदू वर्ग का विकास हो रहा है। इसी की लहर में, इसी की रक्त-रंजित चाल-ढाल में पूरा देश तहस-नहस हो रहा है।

...................................................

हमें एक मिथक से उबरना होगा की हिंदू तो बेचारा है, विनम्र है और मूलतः अहिंसक है। भारत के अहिंसक समाज में सर्वाधिक हिंसा है। सारे धर्मान्तरण हिंदू धर्म की असहिष्णुता और शोषण के कारण हैं। बौद्ध और जैन समाजों के प्रति हिन्दुओं का आक्रामक रुख रहा है। हजारों जैन मूर्तियों और कलाकृतियों को तोड़ने और ग्रंथों को भस्मीभूत करने की शर्म हिंदू समाज के माथे पर इतिहास में लिखी हुई है। श्रीकाकुलम में काले-कलूटे आदिवासिओं को उजाड़ देने और उनकी जनचेतना को कुचलने का काम हिंदू सत्ता ने किया। तुर्कमान गेट के इलाके में आपातकाल के दौर में जो हुआ वह मदांध हिंदू सत्ता का कारनामा था। संजय गाँधी इसी वास्ते आर एस एस का प्रियतम व्यक्ति था। इंदिरा गाँधी भी पीर-पैगम्बरों,मंदिरों और तंत्र-मंत्र के साथ शंकराचार्यों से संपर्क बनाये रखती थीं। नेहरू के बाद किसी न किसी रूप में हिन्दूपन कांग्रस का एक प्रमुख लक्षण था। और मुसलमानों का तुष्टिकरण एक रणनीति मात्र थी। भाजपा एक दबी-छुपी हिंदू कांग्रेस का विस्फोट है, विकास है। दिल्ली में ८४ के दंगों में ४००० सिखों को बर्बरतम तरीकों से जिन्दा मारा गया। इतिहास पर आज जितनी धूल फेन फेंकी जाए, ये न्रिशंशताएँ अमिट रहेंगी। विभूति नारायण राय ने अपने सम्पादकीय में ठीक ही लिखा है कि हिंदू ही एकमात्र ऐसा समुदाय है, जिसमें बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में स्त्रियाँ जला दी जाती हैं। किसी दुसरे समुदाय में यह बर्बरता नहीं है। हमें इस सत्य को भी सर्वसाधारण तक पहुँचा देना चाहिए कि देश का एक भी दंगा ऐसा नहीं है जिसमें मरने वाले हिन्दुओं की तादाद ज्यादा रही हो। हिटलर भी चुना हुआ व्यक्ति था। फासिज्म, एक हद के बाद इतना चमकदार हो जाता है कि लुभाने लगता है।

............................................................................

इस समय हिंदू की लडाई हिंदू से है। आप अपने को एक आदर्श हिंदू के रूप में बचाने में सफल हों , यही सबसे जरुरी है। विवेकानंद ने कहा था , ''अगर कोई यहाँ पर आशा करता है कि एकता, किसी एक धर्म की विजय तथा दूसरे के विनाश से स्थापित होगी तो यह आशा एक मृग मरीचिका के सिवाय कुछ नहीं। ''

चर्च ने यूरोप में साम्यवाद की विफलता के लिए अपूर्व भूमिका अदा की। इरान, मिस्र और अफगानिस्तान में इस्लामिक कट्टरता ने विध्वंशक कार्य किया। भारत में चर्च, इस्लाम और हिंदुत्व मिलकर जनतंत्र का मुखौटा चला रहे हैं। इसलिए यहाँ विनाश और ज्यादा गंभीर होगा।

-ज्ञानरंजन

Wednesday, September 3, 2008

झोपड़ियों का लैंड स्केप और गरीबी की रायल्टी


( करीब दो माह बाद ब्लॉग पर वापस लौटा हूँ। उपन्यास 'उत्तर -वनवास ' का काम लगभग पूरा हो गया है। अब थोड़ी राहत मिली है। एक छोटा -सा अंश यहाँ दे रहा हूँ। इस पर आप लोगों के विचार मेरे लिए मार्गदर्शक होंगे। कभी लघुकथा तक न लिखनेवाले ने सीधे उपन्यास में हाथ डाल दिया है। पता नहीं कुछ बात बन भी रही, या या वैसे ही कागज काले किए जा रहा हूँ। )
-------------------------------------




घनी बबुराही और बंसवारी के बीच वह एक झोपड़ी थी।



नहीं, एक नहीं तीन झोपडिय़ां थीं, एक दूसरे से लगी हुई। जैसे एक मकान में कई कमरे होते हैं। यानी यह तीन झोपडिय़ों का मकान था। लेकिन मकान की प्रचलित अवधारणा के मुताबिक इसे मकान नहीं कहा जा सकता था। मकान के होने के लिए दीवारों और छत का होना जरूरी है। पर यहां तो छत के नाम पर तीन छप्पर थे, जो बबूल की थूनों और बांस की बड़ेर पर टिके हुए थे। दीवार की जगह एक झोपड़ी में फूस की टाटियां लगी हुई थीं, बाकी दो में वह भी नहीं थीं। बहरहाल आप इसे मकान मानें या न मानें, लेकिन सन् 1952 के लोकसभा चुनावों की मतदाता सूची में यह मकान नंबर 151 के रूप में दर्ज था, जिसमें दो मतदाता रहते थे। चूंकि गांव में कुल 151 मकान थे, इसलिए इसे गांव का अंतिम मकान और इसमें रहने वाले आदमी को गांव का अंतिम आदमी (या अंतिम मकान में रहने वाला आदमी) कहा जा सकता था। सूची में मकान नंबर एक की जगह दिनेश सिंह की हवेली तनी थी। दिनेश सिंह गांव के पूर्व जमींदार और वर्तमान सरपंच थे।



अंतिम आदमी या अंतिम मकान में रहने वाले आदमी का यह मकान नंबर 151 बबूल और बांस के झुरमुटों से घिरा होने के कारण किसी सुंदर भूदृश्य-सा लगता था।



बांस की कोठों में कई जहरीले सांप रहते थे, और बबूल के कांटे अक्सर इस घर में रहने वालों को चुभते थे; लेकिन यह बांस और बबूल ही थे, जो इस भूदृश्य में हरा रंग भरते थे। एक कलाकार इधर से गुजरते हुए इस मनोरम दृश्य को देखकर ठिठक गया था। उसने बबुराही और बंसवारी के बीच बसी इन झोपडिय़ों के कई स्केच बनाए थे। बाद में इन्हीं स्केचों में से एक को डेवलप करके उसने एक सुंदर भूदृश्य बनाया था, जिसे एक विदेशी कंपनी ने एक हजार डॉलर में खरीदा था।



मकान नंबर 151 में रहने वालों को तो पता भी नहीं होगा कि वे एक बहुमूल्य कलाकृति में रहते हैं। पता भी होता तो उनकी जीवनचर्या में क्या कोई फर्क पड़ जाता? क्या वे कलाकार से अपनी गरीबी की रॉयल्टी मांगते? ये सवाल काल्पनिक हैं, इनके जवाब भी काल्पनिक ही होंगे, लेकिन यह सच था कि वे एक हजार डॉलर की कीमत वाली कलाकृति की वास्तविकता के भीतर रह रहे थे और उन्हें इस बात का पता नहीं था। पता था तो सिर्फ इतना कि वे सांपों और कांटों के बीच एक कठिन जीवन जी रहे थे। लेकिन अपने जीवन-संघर्ष को लेकर वे चिंतित नहीं थे। उनकी एकमात्र चिंता अपने बेटे रामचंद्र के भविष्य को लेकर थी।



हालांकि उनके नाम दशरथ और कौशल्या नहीं, मायाराम और मंगला थे, लेकिन उन्होंने राम नवमी के दिन जनमे इस बेटे का नाम रामचंद्र रखा था। रामचंद्र के जन्म के समय पुरोहित जी ने कहा था— मायाराम! तुम्हारी तो किस्मत चमक उठी। यह तो कस्तूरी है, कस्तूरी। देखना, इसकी सुगंध बहुत दूर तक जाएगी। वाकई इस कस्तूरी के आते ही दो लोगों का यह परिवार हिरन की तरह चौकड़ी भरने लगा था। मायाराम और मंगला को लगता जैसे उनका अपना बचपन लौट आया हो। जिस समय वे बच्चों की भूमिका में होते, गरीबी नेपथ्य में चली जाती। इस पवित्र खेल को बिगाडऩे की हिम्मत शायद उसमें नहीं थी। या फिर वह थोड़ी ढील देकर देखना चाहती होगी कि देखो कितना उड़ पाते हैं। रामचंद्र जैसे-जैसे बड़े हो रहे थे, वैसे-वैसे कस्तूरी की सुगंध भी तीव्र हो रही थी। हिरन को नहीं पता होता है कि कस्तूरी उसकी नाभि में है, इसलिए वह उसकी सुगंध की खोज में पागल बना भटकता रहता है। यदि उसे पता चल जाए कि कस्तूरी उसकी नाभि में है और उसकी सुगंध ही उसकी सबसे बड़ी दुश्मन है तो संभव है कि इस सुगंध के बारे में उसके विचार बदल जाएं। शायद न भी बदलें, क्योंकि हिरन आखिर हिरन है, कोई मनुष्य नहीं। शायद उसे फख्र हो कि उसके पास एक ऐसी कीमती चीज है, जिसके लिए कोई उसकी जान भी ले सकता है। लेकिन गांव के अंतिम मकान में रहने वाला यह परिवार हिरन नहीं था, बल्कि कस्तूरी मिलने के आह्लाद में हिरन हो गया था। शुरू-शुरू में कस्तूरी की महक परिवार वालों को अच्छी लगी थी। लेकिन वे दुनियादार लोग थे, उन्हें बहुत जल्दी समझ में आ गया कि हिरन की सबसे बड़ी दुश्मन कस्तूरी ही होती है। लिहाजा जैसे-जैसे कस्तूरी की सुगंध तीव्र हो रही थी, वैसे-वैसे उनका डर बढ़ रहा था ।



#######



इस तरह बबूल के कांटों, बांस-कोठ के सांपों और मां-बाप के डर के बीच रामचंद्र बड़े हो रहे थे। उनका बड़ा होना कुछ लोगों को छोटा बना रहा था। रामचंद्र की ऐसी कोई इच्छा नहीं थी। पर, इच्छा से क्या होता है? भगवान राम भी कहां चाहते थे कि सीता स्वयंवर का वर्णन करते हुए तुलसीदास को लिखना पड़े कि - प्रभुंहि देखि नृप सब हिय हारे, जनु राकेश उदय भएं तारे।



यदि राम चंद्र मकान नंबर एक में पैदा हुए होते तो उनके बड़े होने से दूसरों का छोटा होते जाना मां-बाप के लिए गर्व का विषय होता। लेकिन उनके मकान का नंबर 151 था, लिहाजा यह गर्व का नहीं चिंता का विषय था। पर हमेशा से ही ऐसा ऐसा नहीं था। शुरू-शुरू में एक बार उन्हें भी गर्व हुआ था। राम चंद्र उस समय नौ साल के थे। चौथी कक्षा का रिजल्ट लेकर आए थे। रिजल्ट क्या था, सपनों का एक घोड़ा था! आते ही घोड़े की रास पिता को थमा दी थी- ''पूरी कक्षा में अव्वल आया हूं। छोटे कुंवर को दूसरा स्थान मिला है।'' राम चंद्र का वाक्य पूरा होते-होते पिता सपनों के इस घोड़े पर सवार होकर अपनी झोपड़ी बनाम एक हजार डॉलर की कलाकृति से बाहर निकल गए थे। बाहर जाते हुए चूंकि वे घोड़े पर सवार थे, इसलिए न तो कोई कांटा चुभा था और न ही कोई सांप दिखा था। जिंदगी भर कांटों और सांपों के बीच पैदल घिसटने वाले पिता को इस घोड़े पर बड़ा आनंद आ रहा था। थोड़ी दूर जाकर उन्होंने पलट कर देखा। मकान नंबर 151 के आस-पास का दृश्य वाकई एक सुंदर कलाकृति-सा लगा। यह कलाकृति उस पेंटर द्वारा बनाए गए भूदृश्य जैसी ही थी। बस एक छोटा सा अंतर था — तीन झोपडिय़ों की जगह तीस कमरों की हवेली नजर आ रही थी । हवेली का नक्शा बिल्कुल मकान नंबर एक की तरह था।



मकान नंबर एक मायाराम की कल्पना का घर था। उनके पिता ने बताया था कि चार पुश्त पहले यह हवेली उन्हीं के पूर्वजों की थी। यह हवेली मायाराम के पुरखों के हाथ से निकल कर दिनेश सिंह के पुरखों के पास कैसे पहुंच गई, इसकी एक लंबी गाथा है, जिसे अगर अभी यहां लिखना शुरू किया तो 'ढाई घर' जैसा एक उपन्यास तो इसी प्रसंग में पूरा हो जाएगा और रामचंद्र की कथा अलग ही पड़ी रह जाएगी। मायाराम के पिता ने जो बताया था, उसका सार यह था कि उनके पुरखे बहुत सीधे थे और उनकी सीधाई का फायदा उठाकर दिनेश सिंह के पुरखों ने हवेली पर कब्जा कर लिया था। उधर दिनेश सिंह की तरफ से बताया जाने वाला इतिहास कुछ और कहता था। इतिहास हमेशा विजेता का पक्ष लेता है, सो राम चंद्र के परिवार को छोडक़र सारा गांव दिनेश सिंह के द्वारा बताए जाने वाले इतिहास को सही मानता था। पर गांव में एक दो ऐसे लोग भी थे जो दोनों के इतिहास से अलग एक नया ही इतिहास बताते थे। मतलब यह कि इतिहास पर काफी धूल थी... और इतिहासकारों के पास पहले ही इतने विवादास्पद मुद्दे पेंडिंग हैं कि उन्हें एक और विवाद में उलझाने के बजाय आइए फिलहाल की चिंता करें।

######



फिलहाल तो मायाराम तीन झोपडिय़ों की हैसियत से बाहर स्वप्न-अश्व पर सवार हैं। और इस समय उन्हें तीन झोपडिय़ों की जगह तीस कमरों की हवेली नजर आ रही है। वे इस घोड़े से उतरना नहीं चाहते हैं। इस पर सवार कोई भी व्यक्ति उतरना नहीं चाहता है। पर कोई ज्यादा समय तक इसकी पीठ पर टिक भी नहीं सकता है। अधिकांश लोग औंधे मुंह गिरकर ही इसकी पीठ खाली करते हैं। चंद लम्हों की सवारी के बाद मायाराम के साथ भी यही हुआ । घोड़े से गिरने पर उन्होंने देखा कि उनके सपने लहूलुहान हैं। सपने ही नहीं, उन्हें अपना यथार्थ भी लहूलुहान दिखा : राम चंद्र के सिर से बुरी तरह खून बह रहा था। बेटे के सिर से खून बहता देखकर मायाराम का अपना खून खौल उठा। गुस्से में उन्होंने तलवार निकालने के लिए कमर की तरफ हाथ बढ़ाया, लेकिन वहां न तो तलवार थी और न म्यान। अलबत्ता एक चुनौटी जरूर वहां खुंसी हुई थी। तलवार की जगह चुनौटी हाथ में आने पर उन्हें होश आया कि वे घोड़े पर चढ़े जमींदार नहीं, अपनी झोपड़ी के बाहर खड़े मायाराम हैं। होश में आते ही जोश ठंडा हो गया। रौद्र रस को पीछे धकेल कर करुण रस आगे आ गया। आदि कवि की कविता की पहली पंक्ति सरीखा आर्त-वाक्य उनके मुंह से निकला — ''किस कसाई ने किया मेरे लाल का ये हाल? ''



जवाब में चुप्पी।



मतलब, कविता को समझने वाला वहां कोई नहीं था। इसलिए वे सीधे अकविता पर आ गए — ''किस मादरचोद ने....'' मायाराम वाक्य पूरा कर पाते इसके पहले ही किसी ने उनका मुंह दाब दिया।



'' जबान को लगाम दो मायाराम! बात आगे चली गई तो अनर्थ हो जाएगा।'' किसी और ने कहा।



''छोटे कुंवर को गाली देने का अंजाम जानते हो ? '' किसी तीसरे ने चेताया।



छोटे कुंवर का नाम सुनकर मायाराम सन्न रह गए — यह मैंने क्या कर दिया। ये तो पिट-पिटाकर आया ही है, अब मुझे भी हल्दी मट्ठा पिलवायेगा । मां की गाली बकने से पहले मैंने कुछ सोचा क्यों नहीं? पर मैं भी क्या करता, इसका खून देखकर मेरा दिमाग खराब हो गया था। सारी गलती तो इस पिल्ले की है। न ये छोटे कुंवर से पिट कर आता न मेरे मुंह से गाली निकलती। किसी दिन ये मुझे मरवाकर ही रहेगा। अपनी गलती के अंजाम से वे डर गए। पर वे ठाकुर थे। अपने को डरा हुआ कैसे दिखाते। सो डर को मन के एक कोने में दफन कर दिया और वहां से एक सवाल निकाल लाए- '' मेरे राम ने उनका बिगाड़ा क्या था? '' माया राम ने इस सवाल को दोहराया-तिहराया, लेकिन वहां जवाब देने वाला कोई नहीं था। भीड़ तो कब की छंट चुकी थी।

Sunday, June 29, 2008

इस आग के पीछे क्यों पड़े हैं लोग


विचार मर चुका है। विचार मर नहीं सकता है। विचार जिंदाबाद। विचार अमर रहे। पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में जब विचार(धारा) का अंत होने और न होने को लेकर इस तरह का विमर्श जोरों पर था, उसी दौरान इस कविता का जन्म हुआ था। उन दिनों विचार के साथ ही कविता के अंत की भी उद्घोषणाएं की जा रही थीं। यह दीगर बात है कि नई शताब्दी में भी न विचार मरा है न कविता, पर यह जरूर है कि दोनों के जिंदा रहने की शर्तें लगातार विकट होती गई हैं। यह कविता दस साल पूर्व मध्य प्रदेश साहित्य परिषद की पत्रिका साक्षात्कार के जनवरी 1998 के अंक में छपी थी।

और एक छोटी सी सूचना : इसी कविता के साथ कुछ समय के लिए ब्लागिंग से अवकाश ले रहा हूं। सात साल से एक उपन्यास अटका पड़ा है। प्रकाशक का दबाव है कि अगले दो तीन महीने में स्क्रिप्ट दे दूं। मित्रों का भी यही कहना है कि इसे ठिकाने लगाओ, तभी कुछ नया लिख पाओगे। तो दोस्तो, उपन्यास को ठिकाने लगाकर जैसे ही कुछ नया लिखा, हाजिर हो जाऊंगा। तब तक के लिए यह आग आपके पास छोड़कर जा रहा हूं।


इस आग के पीछे क्यों पड़े हैं लोग


कुछ दिनों पहले मिला मुझे एक विचार

आग का एक सुर्ख गोला

सुबह के सूरज की तरह दहकता हुआ बिलकुल लाल

और तब से इसे दिल में छुपाए घूम रहा हूं

चोरों, बटमारों, झूठे यारों और दुनियादारों से बचाता हुआ


सोचता हूं कि सबके सब इस आग के पीछे क्यों पड़े हैं


उस दोस्त का क्या करूं

जो इसे गुलाब का फूल समझ

अपनी प्रेमिका के जूड़े में खोंस देना चाहता है


एक चटोरी लड़की इसे लाल टमाटर समझ

दोस्ती के एवज में मांग बैठी है

वह इसकी चटनी बना मूंग के भजिए के साथ खाना चाहती है


माननीय नगर सेठ इसे मूंगा समझ

अपनी अंगूठी में जडऩा चाहते हैं

ज्योतिषियों के अनुसार मूंगा ही बचा सकता है उनका भविष्य


राजा को भी जरूरत आ पड़ी है इसी चीज की

मचल गया है छोटा राजकुमार इसे लाल गेंद समझ

लिहाजा, राजा के सिपाही मेरी तलाश में हैं


और भी कई लोग अलग-अलग कारणों से

मुझसे छीन लेना चाहते हैं यह आग

हिरन की कस्तूरी सरीखी हो गई है यह चीज

कि इसके लिए कत्ल तक किया जा सकता हूं मैं

फिर इतनी खतरनाक चीज को

आखिर किसलिए दिल में छुपाए घूम रहा हूं मैं


दरअसल मैं इसे

उस बुढिय़ा के ठंडे चूल्हे में डालना चाहता हूं

जो सारी दुनिया के लिए भात का अदहन चढ़ाए बैठी है

और सदियों से कर रही है इसी आग का इंतजार।

- अरुण आदित्य

(साक्षात्कार, जनवरी 1998 में प्रकाशित)

Saturday, June 21, 2008

तेजी से सरकती कास्टिंग की पंक्तियों में


बाबा नागार्जुन ने 6 अगस्त 1992 को उनकी डायरी में लिखा था- 'प्रिय हरि मृदुल, तुम्हारी रचनाओं में बेहद ताजगी मिली। आप बहुत आगे जाओगे, सुदूर निकलोगे।' और हरि मृदुल ने बाबा की भविष्यवाणी को गलत नहीं साबित होने दिया है। हाल ही में प्रकाशित हरि के कविता संग्रह 'सफेदी में छुपा काला की कविताएं बाबा की बातों की तसदीक करती हैं। इसी संग्रह पर हरि को हेमंत स्मृति सम्मान भी मिला है। संग्रह की भूमिका में निदा फाजली ने लिखा है, 'इनके रचना संसार के केंद्र में जो दृष्टि उभरती है जो उन्हें उस कबीले से जोड़ती है, जिसका हिस्सा समाज में तीन चौथाई है। यहां सड़क, पानी, रोशनी और अनाज की ओर दौड़ता हुआ वह इंसान है, जो आज का सच्चा हिंदुस्तान है।' हरि मृदुल कवि के साथ-साथ पत्रकार और सुपरिचित फिल्म समीक्षक भी हैं। आजकल अमर उजाला के मुंबई ब्यूरो में कार्यरत हैं। पेश हैं उनकी दो कविताएं जो उनकी कविता की रेंज की एक झलक देती हैं ...

नाम तुम्हारा
जुहू बीच की नम रेत पर
नाम तुम्हारा लिखता हूं
मिटाता नहीं
लहरों को यह काम सौंप रखा है
मैं खड़ा रहता हूं जैसे पहरेदार।

स्पॉट बॉय

स्पॉट बॉय ने फिल्म रिलीज के पहले दिन के
पहले शो का टिकट लिया
बड़े गौर से निहारा हजारों किलोमीटर
दूर देश-विदेश की उन जगहों को
जो बड़ी बारीकी से अभी तक उसकी स्मृति में थीं
परदे पर एकदम अलग अंदाज में उन्हें देखकर
वह थोड़ा विस्मित हुआ लेकिन आश्चर्यचकित कतई नहीं

उसे हीरोइन का दुख देखकर
ग्लिसरीन की एक बड़ी सी शीशी याद आई
हीरो की बहादुरी देखकर नकली बंदूक
हीरोइन के बाप का गुस्सा देखकर निर्देशक की फूहड़ डांट
और हीरो के बाप का झुंझलाना देखकर
प्रोड्यूसर का बार-बार सिर पीटना

परदे पर बम विस्फोट और खून ही खून देखकर उसने
एक बार माथा जरूर पकड़ा
फिर बिना अगल-बगल बैठे लोगों की परवाह किए
अपनी सीट के नीचे थूक दिया

हीरो-हीरोइन की अदायगी पर उसका कोई ध्यान नहीं था
बल्कि संवाद, गाने या किसी खास भाव-भंगिमा पर
तालियां बजते देख उसे बड़ी कोफ्त हुई
अलबत्ता कुछ एक्सट्रा कलाकारों को उसने
खास तौर पर देखना चाहा
जो हीरोइन के साथ लेकिन पीछे की तरफ नाची थीं
और उन्हें, जो हीरो के हाथों पिटते-पिटते
सचमुच घायल हो गए थे

फिल्म खत्म होते-होते उसने परदे पर
बड़ी सावधानी से अपनी नजर गड़ाई
और तीन घंटे की अवधि में पहली बार उसके चेहरे पर
संतोष पाया गया
तेजी से सरकती कास्टिंग की पंक्तियों में
वह सुरक्षित था अपने साथियों के साथ
स्पॉट बॉयज- भोला, आसिफ, नरोत्तम, जोसफ, बब्बन
और नारिया उर्फ नारायण।
- हरि मृदुल

Wednesday, June 4, 2008

हवा चूमती है फूल को



अन्योन्याश्रित


हवा चूमती है फूल को

और फिर नहीं रह जाती है वही हवा

कि उसके हर झोंके पर

फूल ने लगा दी है अपनी मुहर


और फूल भी कहां रह गया है वही फूल

कि उसकी एक-एक पंखुड़ी पर

हवा ने लिख दी है सिहरन


फूल के होने से महक उठी है हवा

हवा के होने से दूर-दूर तक फैल रही है फूल की खुशबू


इस तरह एक के स्पर्श ने

किस तरह सार्थक कर दिया है दूसरे का होना।


- अरुण आदित्य

(प्रगतिशील वसुधा के अंक 73 में प्रकाशित। स्वर्गीय हरिशंकर परसाई द्वारा संस्थापित इस पत्रिका के प्रधान संपादक कमला प्रसाद और संपादक स्वयं प्रकाश व राजेंद्र शर्मा हैं। पता है- कमला प्रसाद, एम-31, निराला नगर, दुष्यंत मार्ग, भदभदा रोड, भोपाल

और हां इस कविता के साथ फूल का सुंदर-सा जो चित्र लगा है, उसके छायाकार इंदौर के युवा कवि प्रदीप कांत हैं। प्रदीप केट में वैज्ञानिक अधिकारी हैं। शायरी का शौक पुराना था, छायाकारी का चस्का अभी नया-नया लगा है। प्रदीप ने पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या पर कल जब यह फोटो भेजा तो मुझे अपनी यह पुरानी प्रेम-कविता याद आ गई। फिर सोचा कि आप सब को पढ़वा दिया जाए।


Friday, May 30, 2008

ठोकर तो पत्थर को भी लगती है


ठोकर


हम अपनी रौ में जा रहे होते हैं

अचानक किसी पत्थर की ठोकर लगती है

और एक टीस सी उठती है

जो पैर के अंगूठे से शुरू होकर झनझना देती है दिमाग तक को


एक झनझनाहट पत्थर में भी उठती है

और हमारे पैर की चोट खाया हुआ हत-मान वह

शर्म से लुढ़क जाता है एक ओर


एक पल रुककर हम देखते हैं ठोकर खाया हुआ अपना अंगूठा

पत्थर को कोसते हुए सहलाते हैं अपना पांव

और पत्थर के आहत स्वाभिमान को सहलाती है पृथ्वी

झाड़ती है भय संकोच की धूल और ला खड़ा करती है उसे

किसी और के गुरूर की राह में।

-अरुण आदित्य

(पल-प्रतिपल के सितंबर-दिसंबर2 000 अंक में प्रकाशित। पल प्रतिपल का पता है : पल प्रतिपल, एससीएफ-267, सेक्टर-16, पंचकूला। देश निर्मोही इसके संपादक हैं। )

Sunday, May 18, 2008

शमीम फरहत को जानते हैं आप

उर्दू की लिपि में उनकी कोई किताब नहीं

कुछ रंग थे। थोड़ी खुशबू थी। थोड़ी धूप थी, कुछ रूप था। इन सब को मिला दो तो एक आदमी बनता था। आदमी से थोड़ा ज्यादा आदमी। दुनियादार से थोड़ा कम दुनियादार। नाम शमीम था और तखल्लुस फरहत। काम था शायरी और कमजोरी थी शराब। दोनों में एक साथ इस कदर डूबा हुआ कि न इसमें से निकलना आसां न उसमें से। शायरी के बारे में वो लिखता है,
गीत गाना जो छोड़ देता हूँ, गीत ख़ुद मुझको गाने लगते हैं।
और शराब के बारे में भी उसकी राय बहुत आशिकाना थी-
ये तौहीने बादानोशी है, लोग पानी मिला के पीते हैं
जिनको पीने का कुछ सलीका है, जिंदगानी मिला के पीते हैं।

और वो शायर जो रंग, रूप और खुशबू की बात करता था, खून की उल्टियाँ करने लगा। वरिष्ठ जनवादी लेखक राम प्रकाश त्रिपाठी ने प्रगतिशील वसुधा के अंक ७० में शमीम पर एक अद्भुत संस्मरण लिखा है। जनवादी लेखक संघ ने उनका एक संग्रह छापा है, दिन भर की धूप। शीर्षक दुष्यंत के संग्रह साए में धूप से मिलते-जुलता लगता है, लेकिन यह शमीम के एक चर्चित शेर - वो आदमी है रंग का खुशबू का रूप का/कैसे मुकाबला करे दिन भर की धूप का- से लिया गया था। राम प्रकाश जब शमीम साहब को इसकी स्क्रिप्ट दिखाने ले गए तो फर्श पर खून की उलटी देखी। राम प्रकाश ने चिंता जतायी तो इस इन्कलाबी शायर ने हंस कर कहा- अपनी जितनी कुब्बत है, उतनी धरती पर तो लाल रंग बिछा जायें। और उनसे जितनी धरती लाल हो सकती थी, उतनी लाल करके शमीम साहब ९ अगस्त १९८५ की रात ५१ बरस की उम्र में दुनिया को नमस्कार कर गए।
एक जमाने में निदा फाजली और शमीम फरहत ग्वालियर की उभरती हुई पहचान थे। बाद में निदा मुम्बई चले गए। स्टार हो गए। शमीम पद्मा विद्यालय में उर्दू पढाते रहे। मोहल्ले में इन दिनों उर्दू के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण बहस चल रही है। इस सन्दर्भ में राम प्रकाश त्रिपाठी की ये पंक्तियाँ भी बहुत कुछ कहती हैं- '' अफ़सोस है कि शमीम उर्दू के थे। उनकी कोई किताब उर्दू की लिपि में नहीं है। (जनवादी लेखक संघ ने जो संग्रह छापा है वह देवनागरी में है।) मध्य प्रदेश की उर्दू अकादमी इस पशोपेश में रही कि hindi में छपी हुई किताब को उर्दू में लाना , कहीं उर्दू की तौहीन तो नहीं होगी।'' शमीम साहब भी अगर मुम्बई चले गए होते तो शायद स्टार बन जाते। प्रकाशक उनके आगे पीछे घूमते। अकादमियां उन्हें आगे बढ़ कर सम्मानित करतीं। पर क्या तब भी यह लिख पाते-

हम हकीकत की तरह दिल में चुभेंगे यारों

हम कहानी की तरह याद नहीं आयेंगे।

उनके संग्रह दिन भर की धूप से पेश हैं उनकी दो गजलें


एक

जीने से चढ़ के छत पे खड़ी हो गई है वो

रगोशियाँ हुईं कि बड़ी हो गई है वो


मलबूस में उभरते हुए जिस्म के नुकूश

देखो तो मोतियों की लड़ी हो गई है वो



बेबाक शोखियों पे मैं शरमा के रह गया

ऐसा लगा कि मुझसे बड़ी हो गई है वो



तय कर लिए हैं उसने समंदर के रास्ते

यादों के पास आके खड़ी हो गई है वो ।


दो


न तेरे नाम का कूचा न मेरे नाम का शहर

कहीं अल्लाह की बस्ती है कहीं राम का शहर



जिंदगी जह्दे मुसलसल के सिवा कुछ भी नहीं

यार मैंने भी बसाया नहीं आराम का शहर



कितने खामोश मोहल्ले कई उतरे चेहरे

तुम मेरे जाम में देखो तो मेरे जाम का शहर



जंग है भूख है अफ्लास है बेकारी है

जिस जगह जाऊँ मिले है दिले नाकाम का शहर



अब भी जलते हैं उम्मीदों के दिए गम के चराग

तूने देखा नहीं अब तक दिले बदनाम का शहर

- शमीम फरहत









Sunday, May 11, 2008

अम्मा की चिट्ठी

( शहर को खून से लथपथ कर रथ आगे बढ़ चुका है। अब शहर में कर्फ्यू है। इसी कर्फ्यू और दंगाग्रस्त शहर में बेटा फंसा हुआ है। माँ गाँव में है। उसके पास पहुँचती खबरों में दहशत है, आशंका है।दिल्ली में वी पी सिंह की सरकार लाचार है और गाँव में माँ । उसी दौर में लिखी गई थी यह कविता।लिखने के बाद मुझे ख़ुद यह सामान्य तुकबंदी जैसी ही लगी थी परन्तु इसमें पता नहीं ऐसा क्या है कि इसे पढ़कर मेरे मित्र और कला समीक्षक राजेश्वर त्रिवेदी की माँ की आँखें भर आई थीं। कवि संदीप श्रोत्रिय की माँ को भी यह कविता बहुत पसंद थी। चंडीगढ़ के पंजाब कलाभवन में इस कविता को सुनाकर मंच से उतरते ही वरिष्ठ नाटककार और जन संस्कृति मंच के पूर्व अध्यक्ष गुरशरण सिंह ने मुझे गले लगा लिया था।)


अम्मा की चिट्ठी



गांवों की पगडण्डी जैसे

टेढ़े अक्षर डोल रहे हैं

अम्मा की ही है यह चिट्ठी

एक-एक कर बोल रहे हैं



अड़तालीस घंटे से छोटी

अब तो कोई रात नहीं है

पर आगे लिखती हैअम्मा

घबराने की बात नहीं है



दीया बत्ती माचिस सब है

बस थोड़ा सा तेल नहीं है

मुखिया जी कहते इस जुग में

दिया जलाना खेल नहीं है



गाँव देश का हाल लिखूं क्या

ऐसा तो कुछ खास नहीं है

चारों ओर खिली है सरसों

पर जाने क्यों वास नहीं है



केवल धड़कन ही गायब है

बाकी सारा गाँव वही है

नोन तेल सब कुछ महंगा है

इंसानों का भाव वही है



रिश्तों की गर्माहट गायब

जलता हुआ अलाव वही है

शीतलता ही नहीं मिलेगी

आम नीम की छाँव वही है



टूट गया पुल गंगा जी का

लेकिन अभी बहाव वही है

मल्लाहा तो बदल गया पर

छेदों वाली नाव वही है


बेटा सुना शहर में तेरे

मार-काट का दौर चल रहा

कैसे लिखूं यहाँ आ जाओ

उसी आग में गाँव जल रहा



कर्फ्यू यहाँ नहीं लगता

पर कर्फ्यू जैसा लग जाता है

रामू का वह जिगरी जुम्मन

मिलने से अब कतराता है



चौराहों पर वहां, यहाँ

रिश्तों पर कर्फ्यू लगा हुआ है

इसकी नजरों से बच जाओ

यही प्रार्थना, यही दुआ है



पूजा-पाठ बंद है सब कुछ

तेरी माला जपती हूँ

तेरे सारे पत्र पुराने

रामायण सा पढ़ती हूँ



तेरे पास चाहती आना

पर न छूटती है यह मिटटी

आगे कुछ भी लिखा न जाए

जल्दी से तुम देना चिट्ठी।


- अरुण आदित्य

(मेरे पहले कविता संग्रह 'रोज ही होता था यह सब' से)




Saturday, April 12, 2008

क्या अज़ब ये हो रहा है राम जी


प्रदीप कान्त इंदौर की हमारी प्रिय चंट-चौकड़ी (रजनीरमण शर्मा, प्रदीप मिश्र, देवेन्द्र रिणवा और प्रदीप कान्त ) की एक खास कड़ी हैं। फिजिक्स और मैथ्स में पोस्ट ग्रेजुएट प्रदीप यूं तो राजा रामन्ना सेंटर फॉर एडवांस्ड टेक्नोलोजी इंदौर में वैज्ञानिक अधिकारी हैं, लेकिन दिल से शायर हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। यहाँ प्रस्तुत दोनों गजलों में आप समय की धड़कन को सुन सकते हैं

कुछ मेरा भी खो रहा है राम जी


क्या अज़ब ये हो रहा है राम जी
मोम अग्नि बो रहा है राम जी

पेट पर लिखी हुई तहरीर को
आंसुओं से धो रहा है राम जी

आप का कुछ खो गया जिस राह में
कुछ मेरा भी खो रहा है राम जी

आंगने में चाँद को देकर शरण
ये गगन क्यों रो रहा है रामजी

सुलगती रहीं करवटें रात भर
और रिश्ता सो रहा है राम जी


उनका और हमारा पानी


उठता गिरता पारा पानी
पलकों पलकों खारा पानी

चट्टानें आईं पथ में जब
बनते देखा आरा पानी

नानी की ऐनक के पीछे
उफन रहा था गारा पानी

पानी तो पानी है फ़िर भी
उनका और हमारा पानी

देख जगत को रोया फ़िर से
यह बेबस बेचारा पानी

-प्रदीप कान्त

Thursday, March 27, 2008

प्रताप सोमवंशी की कवितायें

हमारे मित्र और अमर उजाला, कानपुर के संपादक प्रताप सोमवंशी संवेदनशील कवि हैं। उनकी ये दोनों कवितायें 1993 में जनसत्ता सबरंग के दीवाली विशेषांक में छपी थीं। उसी विशेषांक में मेरी भी एक कविता 'बम्बई इस गाँव के इतने करीब छपी ' थी। इन्ही कविताओं से मैंने प्रताप के कवि को पहली बार पहचाना था। आप देखेंगे कि छपने के चौदह साल बाद भी ये कवितायें कितनी प्रासंगिक हैं। हाल ही में प्रताप को के सी कुलिश अंतरराष्ट्रीय मीडिया मेरिट अवार्ड मिला है। बधाई ।

खाली है


कितना प्रतिभाशाली है

काम नहीं है, खाली है


केवल फल से मतलब है

कैसे कह दूँ माली है


थोड़ा और दहेज़ जुटा

बिटिया तेरी काली है


तुझसे कोई बैर न था

फ़िर क्यों आँख घुमा ली है


फल आने का मौसम है

पेड़ बेचारा खाली है


बाजीगर


लफ्जों का बाजीगर है

कब्जे में पूरा घर है


तेरा हाँ..हाँ..हाँ करना

लालच होगा, या डर है


तू मुझसे क्या छीनेगा

धरती अपना बिस्तर है


उससे कैसी उम्मीदें

पैदाइश से बेपर है


देश हुआ सब्जी मंडी

लाभ में ऊंचा स्वर है


- प्रताप सोमवंशी






Wednesday, March 12, 2008

GAZA का मुसलमां हो या KASHMIR का हिंदू

ये तेरा अँधेरा है, वो मेरा अँधेरा

हर दिल में उतर जायेगी जज्बात की तरह
हो जाए अगर शायरी भी बात की तरह

सूरज है दफ्न फातिहा पढ़ता है अँधेरा
आए न कोई रात यूं गुजरात की तरह

महंगा है इतना सच कि खरीदार नहीं हैं
बाज़ार में कोई कहाँ सुकरात की तरह

गाज़ा का मुसलमां हो या कश्मीर का हिंदू
हर मौत है, इंसानियत की मात की तरह

ये तेरा अँधेरा है, वो मेरा अँधेरा
बांटो न यूं ज़ख्मों को जात-पात की तरह

इस शहर के पत्थर भी होते हैं तर बतर
बरसो तो जरा टूट के बरसात की तरह

सूरज का रंग लाल और लाल दिखेगा
लिखने लगोगे रात को जब रात की तरह

-अरुण आदित्य

Saturday, March 1, 2008

मेरे मठ में मेरा हठ है


सबका अपना-अपना मठ है

मेरे मठ में मेरा हठ है

मैं, मैं, मैं, मैं मंत्र हमारा

मैं की खातिर तंत्र हमारा

मेरा मैं है मुझको प्यारा

मैं अपने ही मैं से हारा

मेरे मैं की जय है, जय है

मेरा मैं ही मेरा भय है

मेरे मैं को आबाद करो

मुझको मैं से आजाद करो

मैं साधू , मेरा मैं शठ है

फ़िर भी मैं की खातिर हठ है।


- अरुण आदित्य

Saturday, February 23, 2008

चोखेर बाली और चोखेर अश्रु

शिल्प , शिल्पा, शिल्पायें

कश्मीर से कन्या कुमारी तक सजा है तोरण द्वार
पुष्प अक्षत बरसाए जा रहे हैं लगातार
वो आ रही है राष्ट्रीय गौरव की प्रतिमूर्ति
सफलता के गरुण पर सवार
हवा में चुम्बन उछालती जुल्फें लहराती
जताती देश वासियों के प्रति हार्दिक आभार

महात्मा गाँधी ने शुरू की थी जो लड़ाई
नेल्सन मंडेला जिसके लिए बरसों रहे जेल में
हमारी चित्र-पट नायिका ने जीत लिया उसे खेल-खेल में
नस्लभेद का चक्रव्यूह अपने आंसुओं से भेद
उसने बढ़ाया है देश का मान
उसके स्वागत में गाए जा रहे स्वस्तिगान

भारतीय संस्कृति की वह नई ब्रांड अम्बेस्डर
उसने दिखा दी है ब्रांड इंडिया की ताकत
कि झुक कर माफ़ी मांग रहा है इंग्लिस्तान
वाकई उसके आंसुओं में है बहुत जान
सलोने गालों पर कितने करीने से सजे हैं
मोतिओं की तरह झिलमिलाते

जिन्हें इतनी नजाकत से पोंछती है वह
कि लगता है आंसू पोंछना भी एक कला है


सारे चैनल्स पर छाया है उसका अश्रु-वैभव
पर चैनल्स के बाहर भी एक ऐसी दुनिया है
जहाँ नस्लभेद का होना ओर न होना
दोनों का मतलब है रोना और रोना


हमारे पड़ोस में एक शिल्पा रो रही है
कि उसे घुसने नहीं दिया ठाकुर जी के मन्दिर में
उससे भी ज्यादा करुण स्वर में रो रही है एक और शिल्पा
कि अब वह ठाकुर के लिए अछूत नहीं रही

बार-बार रोना न पड़े इसलिए एक शिल्पा
मार दी गई माँ की कोख में
एक और शिल्पा जो नहीं मरी तमाम प्रयासों के बावजूद
अब मार खा रही है
कि क्यों खा गई भाई के लिए रखी रोटी


और भी हैं हजारों हजार शिल्पायें
जिल्लत और किल्लत का शिकार
अपनी नियति पर रोती जार-जार
पर किसी काम का नहीं है उनका रोना
कि उनके पास नहीं है रोने का शिल्प


उनके आंसुओं की चर्चा नहीं होती कहीं
कि वे फकत आंसू हैं मोती नहीं

- अरुण आदित्य

वसुधा के अंक-७३ में प्रकाशित। प्रगतिशील लेखक संघ की पत्रिका वसुधा के प्रधान संपादक कमला प्रसाद और संपादक राजेंद्र शर्मा और स्वयं प्रकाश हैं। पता है-
एम-३१, निराला नगर, भदभदा रोड, भोपाल - ४६२००३







Sunday, February 17, 2008

हत्यारे को मत कहिये हत्यारा है

हत्यारे को मत कहिये हत्यारा है
लोकतंत्र को ये सब नहीं गवारा है

तुम कहते हो 'हत्यारा'
जनता सुनती 'बेचारा' है
बेचारे को बदनाम मत करो
उसने किसको मारा है

जनता का जनता की खातिर
जो जनता के द्वारा है
उसकी ही तो मौत हुई है
और वही हत्यारा है।

हत्यारे को मत कहिये हत्यारा है

लोकतंत्र को ये सब नहीं गवारा है

-अरुण आदित्य

(जनविकल्प की साहित्य वार्षिकी में प्रकाशित)

Sunday, February 3, 2008

फरवरी

विदा होती बेटी
जैसे पलट-पलट कर देखती है माँ की देहरी
जाते-जाते अचानक ठिठक कर देखती है ठंड
और कांप उठते हैं दिन- रात
जैसे कांपता है मां का हृदय बेटी की सिसकियों के साथ

कांपते समय को पीछे छोड़ आगे बढ़ती है ठंड
और मौसम वसंत हो जाता है
जिसकी हवाओं पर
बर्फ के फाहों की तरह जमा हैं जनवरी की स्मृतियाँ
जिन्हें हौले-हौले पिघला रही है मार्च के आने की उम्मीद

जनवरी के जाने और मार्च के आने के बीच
यह जो अलग सी ठंड है, और अलग सी गरमी है
और यह जो न ठंड है, न गरमी है
जिसे न तीस चाहिए न इकतीस
उनतीस या अट्ठाईस दिन पाकर भी
जिसकी झोली भरी है
वही तो फरवरी है

ये फकत एक माह नहीं
जीने की राह है प्यारे

-अरुण आदित्य
( गौरीनाथ द्वारा संपादित साहित्यिक पत्रिका बया में प्रकाशित)

Sunday, January 20, 2008

डर के पीछे जो कैडर है

यह केसरिया करो थोड़ा और गहरा
और यह हरा बिल्कुल हल्का
यह लाल रंग हटाओ यहाँ से
इसकी जगह कर दो काला
हमें तस्वीर के बड़े हिस्से में चाहिए काला




यह देवता जैसा क्या बना दिया जनाब
इसके बजाय बनाओ कोई सुंदर भूदृश्य
कोई पहाड़, कोई नदी




अब नदी को स्त्री जैसी क्यों बना रहे हो तुम
अरे, यह तो गंगा मैया हैं
इन्हें ठीक से कपड़े क्यों नहीं पहनाये
कर्पूर धवल करो इनकी साड़ी का रंग



कहाँ से आ रही है ये आवाज
इधर-उधर देखता है चित्रकार
कहीं कोई तो नहीं है
कहीं मेरा मन ही तो नहीं दे रहा ये निर्देश




पर मन के पीछे जो डर है
और डर के पीछे जो कैडर है
जो सीधे-सीधे नहीं दे रहा है मुझे धमकी या हिदायत
उसके खिलाफ कैसे करूं शिक़ायत?


इस कविता के सहित मेरी पांच कवितायें हरिगंधा पत्रिका में छपी हैं। हरियाणा साहित्य अकादमी की यह पत्रिका काफी समय से निकल रही थी, लेकिन कोई नोटिस ही नहीं लेता था। देश निर्मोही जब से इसके संपादक बने हैं यह वाकई समकालीन साहित्य की पत्रिका लगाने लगी है। हरिगंधा का पता है -
हरियाणा साहित्य अकादमी
169 , sector 12, panchkula-134112

Saturday, January 12, 2008

इस तरह मत आओ जैसे रथों पर सवार आते हैं महारथी

आवाहन

शब्द आओ मेरे पास
जैसे मानसून में आते हैं बादल
जैसे बादलों में आता है पानी

जैसे पगहा तुड़ाकर गाय के थनों की ओर दौड़ता है बछड़ा
जैसे थनों में आता है दूध

इस तरह मत आओ जैसे
रथों पर सवार आते हैं महारथी
बस्तियों को रौंदते हुए
किसी रौंदी हुई बस्ती से आओ मेरे शब्द
धूल से सने और लहू लुहान
कि तुम्हारा उपचार करेगी मेरी कविता
और तुम्हारे लहू से उपचारित होगी वह स्वयं

याचक की तरह मत मांगो किसी कविता में पनाह
आओ तो ऐसे, जैसे चोट लगते ही आती है कराह

संतों महंतों की बोली बोलते हुए नहीं
तुतलाते हुए आओ मेरे शब्द
वस्त्राभूषणों से लदे-फंदे नहीं
नंग-धड़ंग आओ मेरे शब्द

किसी किताब से नहीं
गरीबदास के ख्वाब से निकलकर आओ मेरे शब्द

कि मैं सिर्फ एक अच्छी कविता लिखना चाहता हूँ
और उसे जीना चाहता हूँ तमाम उम्र ।

Monday, January 7, 2008

अ आ यानी...

अ आ यानी वर्णमाला सीखने की शुरुआत !

अ आ यानी भी !

अ आ यानी नसुनी वाज

अ आ यानी पना समान !

अ आ यानी भिव्यक्ति- नंद !

अ आ यानी भय - क्रोश !

अ आ यानी न्तिम दमी !

और अंततः

अ आ यानी रुण दित्य भी समझ सकते हैं !



तो शुरुआत हो चुकी है। और इस शुरुआत का श्रेय है कवि-कथाकार-फिल्मकार उदय प्रकाश को। ब्लाग पर आने को लेकर मन में कुछ उधेड़बुन थी, लेकिन उदय जी से चर्चा के बाद लगा कि अभिव्यक्ति के इस नए माध्यम की ताकत का इस्तेमाल अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए करना चाहिए। इस तरह यह अ आ अब आपके सामने है।

जल्दी ही नई पोस्ट के साथ मिलेंगे।