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Saturday, April 12, 2008

क्या अज़ब ये हो रहा है राम जी


प्रदीप कान्त इंदौर की हमारी प्रिय चंट-चौकड़ी (रजनीरमण शर्मा, प्रदीप मिश्र, देवेन्द्र रिणवा और प्रदीप कान्त ) की एक खास कड़ी हैं। फिजिक्स और मैथ्स में पोस्ट ग्रेजुएट प्रदीप यूं तो राजा रामन्ना सेंटर फॉर एडवांस्ड टेक्नोलोजी इंदौर में वैज्ञानिक अधिकारी हैं, लेकिन दिल से शायर हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। यहाँ प्रस्तुत दोनों गजलों में आप समय की धड़कन को सुन सकते हैं

कुछ मेरा भी खो रहा है राम जी


क्या अज़ब ये हो रहा है राम जी
मोम अग्नि बो रहा है राम जी

पेट पर लिखी हुई तहरीर को
आंसुओं से धो रहा है राम जी

आप का कुछ खो गया जिस राह में
कुछ मेरा भी खो रहा है राम जी

आंगने में चाँद को देकर शरण
ये गगन क्यों रो रहा है रामजी

सुलगती रहीं करवटें रात भर
और रिश्ता सो रहा है राम जी


उनका और हमारा पानी


उठता गिरता पारा पानी
पलकों पलकों खारा पानी

चट्टानें आईं पथ में जब
बनते देखा आरा पानी

नानी की ऐनक के पीछे
उफन रहा था गारा पानी

पानी तो पानी है फ़िर भी
उनका और हमारा पानी

देख जगत को रोया फ़िर से
यह बेबस बेचारा पानी

-प्रदीप कान्त