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Saturday, June 21, 2008

तेजी से सरकती कास्टिंग की पंक्तियों में


बाबा नागार्जुन ने 6 अगस्त 1992 को उनकी डायरी में लिखा था- 'प्रिय हरि मृदुल, तुम्हारी रचनाओं में बेहद ताजगी मिली। आप बहुत आगे जाओगे, सुदूर निकलोगे।' और हरि मृदुल ने बाबा की भविष्यवाणी को गलत नहीं साबित होने दिया है। हाल ही में प्रकाशित हरि के कविता संग्रह 'सफेदी में छुपा काला की कविताएं बाबा की बातों की तसदीक करती हैं। इसी संग्रह पर हरि को हेमंत स्मृति सम्मान भी मिला है। संग्रह की भूमिका में निदा फाजली ने लिखा है, 'इनके रचना संसार के केंद्र में जो दृष्टि उभरती है जो उन्हें उस कबीले से जोड़ती है, जिसका हिस्सा समाज में तीन चौथाई है। यहां सड़क, पानी, रोशनी और अनाज की ओर दौड़ता हुआ वह इंसान है, जो आज का सच्चा हिंदुस्तान है।' हरि मृदुल कवि के साथ-साथ पत्रकार और सुपरिचित फिल्म समीक्षक भी हैं। आजकल अमर उजाला के मुंबई ब्यूरो में कार्यरत हैं। पेश हैं उनकी दो कविताएं जो उनकी कविता की रेंज की एक झलक देती हैं ...

नाम तुम्हारा
जुहू बीच की नम रेत पर
नाम तुम्हारा लिखता हूं
मिटाता नहीं
लहरों को यह काम सौंप रखा है
मैं खड़ा रहता हूं जैसे पहरेदार।

स्पॉट बॉय

स्पॉट बॉय ने फिल्म रिलीज के पहले दिन के
पहले शो का टिकट लिया
बड़े गौर से निहारा हजारों किलोमीटर
दूर देश-विदेश की उन जगहों को
जो बड़ी बारीकी से अभी तक उसकी स्मृति में थीं
परदे पर एकदम अलग अंदाज में उन्हें देखकर
वह थोड़ा विस्मित हुआ लेकिन आश्चर्यचकित कतई नहीं

उसे हीरोइन का दुख देखकर
ग्लिसरीन की एक बड़ी सी शीशी याद आई
हीरो की बहादुरी देखकर नकली बंदूक
हीरोइन के बाप का गुस्सा देखकर निर्देशक की फूहड़ डांट
और हीरो के बाप का झुंझलाना देखकर
प्रोड्यूसर का बार-बार सिर पीटना

परदे पर बम विस्फोट और खून ही खून देखकर उसने
एक बार माथा जरूर पकड़ा
फिर बिना अगल-बगल बैठे लोगों की परवाह किए
अपनी सीट के नीचे थूक दिया

हीरो-हीरोइन की अदायगी पर उसका कोई ध्यान नहीं था
बल्कि संवाद, गाने या किसी खास भाव-भंगिमा पर
तालियां बजते देख उसे बड़ी कोफ्त हुई
अलबत्ता कुछ एक्सट्रा कलाकारों को उसने
खास तौर पर देखना चाहा
जो हीरोइन के साथ लेकिन पीछे की तरफ नाची थीं
और उन्हें, जो हीरो के हाथों पिटते-पिटते
सचमुच घायल हो गए थे

फिल्म खत्म होते-होते उसने परदे पर
बड़ी सावधानी से अपनी नजर गड़ाई
और तीन घंटे की अवधि में पहली बार उसके चेहरे पर
संतोष पाया गया
तेजी से सरकती कास्टिंग की पंक्तियों में
वह सुरक्षित था अपने साथियों के साथ
स्पॉट बॉयज- भोला, आसिफ, नरोत्तम, जोसफ, बब्बन
और नारिया उर्फ नारायण।
- हरि मृदुल

Saturday, April 12, 2008

क्या अज़ब ये हो रहा है राम जी


प्रदीप कान्त इंदौर की हमारी प्रिय चंट-चौकड़ी (रजनीरमण शर्मा, प्रदीप मिश्र, देवेन्द्र रिणवा और प्रदीप कान्त ) की एक खास कड़ी हैं। फिजिक्स और मैथ्स में पोस्ट ग्रेजुएट प्रदीप यूं तो राजा रामन्ना सेंटर फॉर एडवांस्ड टेक्नोलोजी इंदौर में वैज्ञानिक अधिकारी हैं, लेकिन दिल से शायर हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। यहाँ प्रस्तुत दोनों गजलों में आप समय की धड़कन को सुन सकते हैं

कुछ मेरा भी खो रहा है राम जी


क्या अज़ब ये हो रहा है राम जी
मोम अग्नि बो रहा है राम जी

पेट पर लिखी हुई तहरीर को
आंसुओं से धो रहा है राम जी

आप का कुछ खो गया जिस राह में
कुछ मेरा भी खो रहा है राम जी

आंगने में चाँद को देकर शरण
ये गगन क्यों रो रहा है रामजी

सुलगती रहीं करवटें रात भर
और रिश्ता सो रहा है राम जी


उनका और हमारा पानी


उठता गिरता पारा पानी
पलकों पलकों खारा पानी

चट्टानें आईं पथ में जब
बनते देखा आरा पानी

नानी की ऐनक के पीछे
उफन रहा था गारा पानी

पानी तो पानी है फ़िर भी
उनका और हमारा पानी

देख जगत को रोया फ़िर से
यह बेबस बेचारा पानी

-प्रदीप कान्त

Thursday, March 27, 2008

प्रताप सोमवंशी की कवितायें

हमारे मित्र और अमर उजाला, कानपुर के संपादक प्रताप सोमवंशी संवेदनशील कवि हैं। उनकी ये दोनों कवितायें 1993 में जनसत्ता सबरंग के दीवाली विशेषांक में छपी थीं। उसी विशेषांक में मेरी भी एक कविता 'बम्बई इस गाँव के इतने करीब छपी ' थी। इन्ही कविताओं से मैंने प्रताप के कवि को पहली बार पहचाना था। आप देखेंगे कि छपने के चौदह साल बाद भी ये कवितायें कितनी प्रासंगिक हैं। हाल ही में प्रताप को के सी कुलिश अंतरराष्ट्रीय मीडिया मेरिट अवार्ड मिला है। बधाई ।

खाली है


कितना प्रतिभाशाली है

काम नहीं है, खाली है


केवल फल से मतलब है

कैसे कह दूँ माली है


थोड़ा और दहेज़ जुटा

बिटिया तेरी काली है


तुझसे कोई बैर न था

फ़िर क्यों आँख घुमा ली है


फल आने का मौसम है

पेड़ बेचारा खाली है


बाजीगर


लफ्जों का बाजीगर है

कब्जे में पूरा घर है


तेरा हाँ..हाँ..हाँ करना

लालच होगा, या डर है


तू मुझसे क्या छीनेगा

धरती अपना बिस्तर है


उससे कैसी उम्मीदें

पैदाइश से बेपर है


देश हुआ सब्जी मंडी

लाभ में ऊंचा स्वर है


- प्रताप सोमवंशी