Friday, October 24, 2008

पहाड़ झांकता है नदी में


मनाली

पहाड़ झांकता है नदी में
और उसे सिर के बल खड़ा कर देती है नदी
लहरों की लय पर
हिलाती-डुलाती, नचाती-कंपकंपाती है उसे

पानी में कांपते अपने अक्स को देखकर भी
कितना शांत निश्चल है पहाड़
हम आंकते हैं पहाड़ की दृढ़ता
और पहाड़ झांकता है अपने मन में -
अरे मुझ अचल में इतनी हलचल
सोचता है और मन ही मन बुदबुदाता है-
किसी नदी के मन में झांकने की हिम्मत करे कोई पहाड़


-अरुण आदित्य
यह कविता मनाली शीर्षक कविता शृंखला की छह कविताओं में से एक है। वागर्थ में प्रकाशित।
साथ में प्रकाशित पेंटिंग विश्वप्रसिद्ध चित्रकार निकोलाई रोरिक की है। पेंटिंग का शीर्षक है-शी हू लीड्स।

32 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सोचता है और मन ही मन बुदबुदाता है-
किसी नदी के मन में झांकने की हिम्मत न करे कोई पहाड़

बहुत बढ़िया .शब्द और पेंटिंग्स भी ..शुक्रिया इसको यहाँ देने के लिए

Pratyaksha said...

vaah !

महेन said...

कोई न करे हिम्मत।

वर्षा said...

नदी के मन में झांके भी तो कैसे

Vidhu said...

पहाड़ और नदी अपनी नियति से बंधे है और खुश भी,लेकिन किसी नदी के मन मैं झाकने की ...कोई पहाड़ ...पंक्तियाँ अद्वितीय है बधाई.

मीत said...

बहुत बढ़िया.

सोचना पडेगा said...

पहाड़ कहीं का....।

Dr. Nazar Mahmood said...

बहुत् ही सुन्दर

Ek ziddi dhun said...

वो पहाड़ का मन..

cartoonist ABHISHEK said...

happy diwali..
"नदी के मन men jhankne ki himmat na kare koi pahaad..." bahut umda..

Arun Aditya said...

ranjana, pratyaksha, mahen,varsha, vidhu, meet, sochna padega, dhiresh,dr, nazar mehmoodaur abhishek aap sab ko bahut-bahut dhanyavaad. happy diwali.

BrijmohanShrivastava said...

सर आपकी तस्वीर देखी .हंसमुख चेहरे ने आकर्षित किया आपको देखा ,आपकी कविता देखी =अब उलझन ये हुई की आपको देखूं की आपकी कविता पढूं /आपने देखा शांत निश्चल पहाड़ मेने देखा आपके चेहरे पर शान्ति ,निश्चलता /आपने पहाड़ में द्रढ़ता देखी मैंने आपके विचारों में / जहाँ तक आपका निर्देश है की कोई पहाड़ नदी में न झांके तो यह प्रेक्टिकल न होगा /पहाडों की जन्मजात आदत होती है कि वे नदी में झांकें /और कमोबेश नदी की भी इच्छा तो रहती होगी कि कोई पहाड़ उसको जाने देखे उसकी गहराई की थाह ले उसमें झांके /पहली मुलाकात में इससे ज़्यादा कुछ नहीं /हैपी दिवाली

Arun Aditya said...

धन्यवाद ब्रजमोहन जी। वैसे पहाड़ को नदी के मन में झांकने की कोई मनाही नही है, लेकिन उससे पहले पहाड़ को अपने मन में भी झांक लेना चाहिए। उसके बाद भी अगर हिम्मत पड़े तो....

Ajey said...

kavita aap
k mukh se sun rakhi hai, kahan hain aaj kal?
bahut ghoom fir k aap k blog tak pahuncha hoon. ise khangaaloonga. aur react karoonga k bhai ne naya kya likha hai in dino......

with regards , AJEY.

संगीता पुरी said...

बहुत ही अच्‍छी कविता। बधाई।

Pradeep Kant said...

Padhvate rahiye

anup said...

अरुण भाई, यही तो है वो कविता जिसे हिमाचल मित्र में छापने के लिए आप से मांग रहा था.

डॉ .अनुराग said...

अद्भुत ...कैसे चूक गया इतनी शानदार कविता ....शीर्षक खास तौर से खीच लेता है .

Dr. Chandra Kumar Jain said...

अचल और अतल में साथ-साथ
हलचल पैदा करती अचूक रचना.
=========================
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

pallavi trivedi said...

bahut khoobsurat kavita...aur painting bhi.

Ashutosh Seetha said...

Dear sir ,

Aapne es blog par aapni sabhi krutiyon ko bahut aache se piroya hai es ke liye aap bahut badhai ke patra hai , Dhanyawad.


Ashutosh Seetha
Bureaucratsnews.com

bahadur patel said...

arun bhai kavita umda hai isme koi do rai nahi. ab apako padhate rahane ka mouka milega.

sandhyagupta said...

Ek bahut achchi kavita ke liye badhai sweekar karen.

guptasandhya.blogspot.com

अजित वडनेरकर said...

गहराई....गहराई...
हिम्मत ज़रूर करे पहाड़ नदी में झांकने की
मगर सच्चा पहाड़ ही करे...
उच्चता,कठोरता के दम्भ में चूर न करे
ये हिमाकत
सच्चे पहाड़ ही इस पारदर्शी नतीजे पर पहुंच सकते हैं-
अरे मुझ अचल में इतनी हलचल...

तीसरा कदम said...

मैंने आज पहली बार आपका ब्लॉग पढ़ा बहुत ही अच्छा और गहराई के साथ लिखते हैं आप. शायद मैं तो उस गहराई को अच्छे से भी न समझा होऊं .
बहुत ही अच्छा.

neeraj badhwar said...

beautiful.

Parul said...

waah ..kya baat hai

ताऊ रामपुरिया said...

आदित्य जी शा्नदार पेन्टिन्ग और लाजवाब कविता ! मनाली ३ बार तीन टिन सप्ताहो तक रह कर भी वहां से मन नही भरता ! मनाली नाम मे ही जादू है ! फ़िर जाना चाहुन्गा !

राम राम !

प्रकाश बादल said...

अरुण भाई 'शब्द'और 'लोटे' कब पढ़्वाएंगे?

rakeshindore.blogspot.com said...

Bahi arun ji ,
thanks for sendin comments.your readers are waiting for new poems pl. post.

pradeep said...

is series ki kavitayen aapse kullu mein bahut pahle suni thi...aaj yaadein taaza ho gayi.....mujhe bahut pasand hai ye kavita...jo hamesha bhitar bachi rahi....pradeep saini....

pradeep said...

is series ki kavitayen aapse kullu mein bahut pahle suni thi...aaj yaadein taaza ho gayi.....mujhe bahut pasand hai ye kavita...jo hamesha bhitar bachi rahi....pradeep saini....