ये तेरा अँधेरा है, वो मेरा अँधेरा
हर दिल में उतर जायेगी जज्बात की तरह
हो जाए अगर शायरी भी बात की तरह
सूरज है दफ्न फातिहा पढ़ता है अँधेरा
आए न कोई रात यूं गुजरात की तरह
महंगा है इतना सच कि खरीदार नहीं हैं
बाज़ार में कोई कहाँ सुकरात की तरह
गाज़ा का मुसलमां हो या कश्मीर का हिंदू
हर मौत है, इंसानियत की मात की तरह
ये तेरा अँधेरा है, वो मेरा अँधेरा
बांटो न यूं ज़ख्मों को जात-पात की तरह
इस शहर के पत्थर भी होते हैं तर बतर
बरसो तो जरा टूट के बरसात की तरह
सूरज का रंग लाल और लाल दिखेगा
लिखने लगोगे रात को जब रात की तरह
-अरुण आदित्य
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Wednesday, March 12, 2008
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