Monday, September 29, 2008

विष्णु नागर की कविता, रवीन्द्र व्यास की पेंटिंग



नागर जी की ये कविता जब पहली बार पढ़ी तो सचमुच गागर में सागर भरने वाला मुहावरा याद आ गया था। और जब रवीन्द्र की ये पेंटिंग देखी तो फ़िर नागर जी की ये कविता याद आई।रविवार शाम कुछ पुराने मित्रों के साथ नागर जी से आत्मीय मुलाकात हुई। मैंने पूछा कि आपकी कविता अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर दूँ। बोले , बेहिचक डाल दो। रवीन्द्र पहले ही कह चुके हैं कि उनकी पेंटिंग्स का उपयोग करने की पूरी छूट है। तो लीजिये पेश है यह जबरदस्त जुगलबंदी।



जहाँ हरा होगा



जहाँ हरा होगा


वहां पीला भी होगा


गुलाबी भी होगा


वहां गंध भी होगी


उसे दूर-दूर ले जाती हवा भी होगी


और आदमी भी वहां से दूर नहीं होगा।

- विष्णु नागर

14 comments:

ravindra vyas said...

नागरजी की यह कविता मुझे भी बहुत पसंद है। और इसके साथ मेरी पेंटिंग लगाने के लिए आभार।

डॉ .अनुराग said...

दोनों यहाँ बांटने के लिए आभार

शायदा said...

सुंदर कविता, सुंदर पेंटिंग।

Udan Tashtari said...

बेहतरीन जुगलबन्दी!! आभार.

Ek ziddi dhun said...

मैंने पूछा कि आपकी कविता अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर दूँ। बोले , बेहिचक डाल दो।....NAGAR ji se amooman yahi jawab milna tay hota hai. han koi manch janvirodhi hi ho to bat deegar hai. In dino unka gady khaskar kaviyon aur kavitaon par unkee tippaniyan padhi, behad dhardaar, majedaar bhi aur bahut se `bhagwan sahitykaaron` ko chubhne waali bhi

Dr. Chandra Kumar Jain said...

प्रकृति और मनुष्य के
सह संबंध का संसार
समय की पुकार है....यह
कविता कुछ ऐसा ही संदेश
देती प्रतीत होती है.
================
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

प्रदीप मिश्र said...

मजा आ गया. बेहतरीन जुगलबंदी है.

महेन said...

लगता है पेंटिंग और कविता एक दूसरे को काम्प्लिमेंट कर रही हैं।

Arun Aditya said...

रवींद्र, शायदा, डॉक्टर अमर, धीरेश, प्रदीप, महेन, समीर लाल जी और डॉक्टर जैन साहेब, आप सब को बहुत-बहुत धन्यवाद.

Geet Chaturvedi said...

दोनों सुंदर.

Pradeep Kant said...

सुंदर कविता, सुंदर पेंटिंग।

शिरीष कुमार मौर्य said...

अच्छी जुगलबंदी है अरुण जी !

krishna said...

bahut jyada sundar.

Anonymous said...

aisa lagta hai ki kavita aur painting ek dusare ke liye hi rachi gayi hain.
santosh k singh.