Monday, February 1, 2010

समय न मिले तब भी आना

आजकल क्या लिख रहे हो?
इस सवाल के जवाब में 'एक उपन्यास पर काम चल रहा है' कई वर्षों से मेरे लिए लिखने से बचने का एक खूबसूरत बहाना बना हुआ था। मित्रों ने घेराबंदी करके वह बहाना खत्म करवा दिया। लंबे समय से 'शीघ्र प्रकाश्य' बना रहा उपन्यास उत्तर वनवास अंतत: प्रकाशित हो गया है।
पुस्तक मेले में इसी शनिवार को उसका लोकार्पण है।









लोकार्पण करेंगे
हिंदी साहित्य के दो शिखर-व्यक्तित्व
नामवर सिंह और राजेंद्र यादव।


स्थान : आधार प्रकाशन का स्टाल
स्टाल नंबर- 81
हॉल नंबर- 12 ए
पुस्तक मेला प्रांगण, प्रगति मैदान, नई दिल्ली।

समय : 6 फरवरी, 2010, शाम 04 : 00 बजे


समय मिले तो जरूर आइएगा। और समय न मिले तो भी।
आपको कवि केदार नाथ सिंह की इन काव्य पंक्तियों का वास्ता :
आना
जब
समय मिले
जब
समय मिले
तब
भी आना।




Monday, January 25, 2010

जब इस तरह घना हो कोहरा




'कोहरा 'कविता द पब्लिक एजेंडा मैगजीन के ताजा अंक में छपी है। द पब्लिक एजेंडा से हिंदी के दो सुप्रसिद्ध कवि जुड़े हुए हैं। इसके संपादक मंगलेश डबराल और साहित्य संपादक मदन कश्यप हैं।

कोहरा


कई दिनों से छाया हुआ है कोहरा घना
कंपकंपाती ठंड और सूरज का कहीं अता पता नहीं
जहां तक नजर जाए बस धुआं ही धुआं
और धुएं में उलझे हुए जलविंदु अतिसूक्ष्म

जरा सी दूर की चीज भी नजर नहीं आ रही साफ-साफ
टीवी अखबार से ही पता चलता है
कि क्या हो रहा है हमारे आस-पास

45 रेलगाड़ी से कट मरे
54 सड़क दुर्घटनाओं में
140 ठंड से
अलग-अलग कारणों से मरे नजर आते हैं ये 239 लोग
पर वास्तव में तो ये कोहरा ही है इनकी मौत का जिम्मेदार

इनके अलावा और कितने लोग
और कितनी चीजें हुई हैं इस कोहरे की शिकार
इसका हिसाब तो मीडिया भी कैसे दे सकता है
जो स्वयं है इस धुंध की चपेट में

जब इस तरह घना हो तो कोहरे में देखते हुए
सिर्फ कोहरे को ही देखा जा सकता है
और उसे भी बहुत दूर तक कहां देख पाते हैं हम
थोड़ी दूर का कोहरा
दिखने ही नहीं देता बहुत दूर के कोहरे को
और बहुत पास का कोहरा भी कहां देख पाते हैं हम

घने से घने कोहरे में भी
हम साफ-साफ देख लेते हैं अपने हाथ-पांव
इसलिए लगता है
कि एक कोहरा मुक्त वृत्त में है हमारी उपस्थिति
जबकि हकीकत में इस वृत्त में भी
होता है कोहरा उतना ही घना
कि दस गज दूर खड़ा मनुष्य भी नहीं देख सकता हमें
ठीक उसी तरह जैसे उसे नहीं देख पाते हैं हम

इस घने कोहरे में
जब जरा से फासले पर खड़ा मूर्त मनुष्य ही नहीं दिखता मनुष्य को
तो मनुष्यता जैसी अमूर्त चीज के बारे में क्या कहें?

महर्षि पराशर !
आपने अपने रति-सुख के लिए
रचा था जो कोहरा
देखो, कितना कोहराम मचा है उसके कारण

इस बात से पता नहीं तुम खुश होगे या दुखी
कि धुंध रचने के मामले में
तुम्हारे वंशज भी कुछ कम नहीं
अपने स्वार्थ के लिए
और कभी-कभी तो सिर्फ चुहल के लिए ही
रच देते हैं कोहरा ऐसा खूबसूरत
कि उसमें भटकता हुआ मनुष्य
भूल जाता है धूप-ताप और रोशनी की जरूरत

भूल ही नहीं जाता बल्कि कभी-कभी तो
उसे अखरने भी लगती हैं ये चीजें
जो करती हैं इस मनोरम धुंध का प्रतिरोध।

- अरुण आदित्य

चित्र यहाँ से साभार

Wednesday, January 13, 2010

उत्तर वनवास के बारे में वरिष्ठ कथाकार संजीव की राय


उपन्यास उत्तर वनवास का आवरण तैयार हो गया है। वरिष्ठ चित्रकार-कथाकार प्रभु जोशी की पेंटिंग से सज्जित यह आवरण आपको कैसा लग रहा है, जरूर बताएं। उम्मीद है कि उपन्यास दिल्ली के पुस्तक मेले में आधार प्रकाशन के स्टाल पर उपलब्ध रहेगा। बहरहाल उपन्यास के आने से पहले आइए देखते हैं कि वरिष्ठ कथाकार और हंस के कार्यकारी संपादक संजीव की इस उपन्यास के बारे में
क्या राय है?







उत्तर वनवास : एक अभिनव प्रयास

संजीव
हिंदी पट्टी के लोकजीवन में 'राम चरित मानस का प्रभाव बहुत गाढ़ा रहा है। वर्षों पहले प्रतापगढ़ में बाबा रामचंद्र दास ने किसान आंदोलन में इसकी चौपाइयों-दोहों का धनात्मक उपयोग किया था। अग्रणी बांग्ला कथाकार सतीनाथ भादुड़ी ने रामचरित मानस का अपने उपन्यास 'ढोंड़ाय चरित मानस' में पुन: उपयोग किया। इस बार का मानस तुलसी के मानस का एंटी मैटर था। एक राजनीतिक पार्टी के लिए 'राम चरित मानस' को सीढ़ी बनाकर सत्ता तक पहुंचना जितना आसान है, एक रचनाकार के लिए उसका सकारात्मक उपयोग उतना ही मुश्किल होता है।
इधर अक्सर ही कहा जाने लगा है कि हिंदी की युवा पीढ़ी के पास अपना कोई उपन्यास नहीं है या कि उसमें उपन्यास लेखन की क्षमता नहीं है। दूसरी तरफ भाषा की सामथ्र्य के दोहन का भी मुद्दा है। भाषा के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने को इच्छुक हर शब्द साधक का पहले की अपेक्षा अधिक सामथ्र्य संपन्न होना लाजमी हो गया है। इन सारी चुनौतियों का जवाब बन कर आया है युवा कथाकार अरुण आदित्य का उपन्यास उत्तर-वनवास।
कथानायक रामचंद्र की मुठभेड़ उन तत्वों से होती है जो राम का उपयोग अपने निहित स्वार्थों के लिए करना चाहते हैं। अंत:, वाह्य दोनों स्तरों पर यह द्वंद्वात्मकता परवान चढ़ती है, स्थूल रुप में भी और प्रतीक रूप में भी। वहां राम का चौदह वर्षों का वनवास है, यहां सत्रह वर्षों का, रामचंद्र का ही नहीं, उनकी चेतना का भी।
सामंती मानसिकता के क्रोड़ में रचे-रसे अवध के गांव, गांव के ठाकुरों और ब्राह्मणों में वर्चस्व का द्वंद्व, द्वंद्व में पिसते दलित और स्त्रियां, धर्म, अध्यात्म, राजनीति और कदाचार, वर्ण और वर्ग, गत और अनागत, परछाइयां और आहटें - सब को अपने ढंग से पिरोता, पछींटता, खंगालता अपने भाषिक वितान में फैलाता चलता है उपन्यास। पारदर्शिता के स्तर पर, मौजूदा व्यवस्था की कारक शक्तियों के चेहरों और चरित्रों को आसानी से पहचाना जा सकता है; भाषा के स्तर पर, विश्लेषण के स्तर पर, फंतासी और कल्पनाशीलता के स्तर पर अरुण का यह एक अभिनव प्रयोग है।
बानगी के तौर पर उपन्यास के कुछ अंश- 'दरअसल हम एक डरे हुए समय में जी रहे हैं। डरी हुई राजनीति, डरा हुआ धर्म और डरा हुआ समाज बहुत खतरनाक होते हैं। और इन सब से ज्यादा खतरनाक होती है डरी हुई पत्रकारिता। और ये हमारे देस का दुर्भाग्य है कि हमें इन डरी हुई चीजों के बीच ही रहना पड़ रहा है।'
'... रामचंद्र उसके पीछे इतनी तेजी से लपके कि नींद से बाहर निकल गए। नींद से बाहर आने के बाद भी सपने से बाहर आने में उन्हें काफी देर लगी।'
................................................

पुनश्च:
कुछ मित्रों ने आधार प्रकाशन का पता जानना चाहा है। पता इस प्रकार है:
आधार प्रकाशन
एस सी एफ-267, सेक्टर-16
पंचकूला, हरियाणा।

ई-मेल - aadhar_prakashan@yahoo.com
आधार प्रकाशन के संचालक और साहित्यिक पत्रिका पल-प्रतिपल के संपादक देश निर्मोही का मोबाइल नंबर है- 09417267004

Saturday, December 12, 2009

लिख ही डाला अंतिम वाक्य अंतिम बार

लिखो, काटो...फिर लिखो, फिर काटो। इसका क्या कोई अंत है। अंतत: यही सोचकर उपन्यास उत्तर वनवास का अंतिम वाक्य अंतिम बार लिख कर खुद को मुक्त किया। फाइनल स्क्रिप्ट आधार प्रकाशन के संचालक श्री देश निर्मोही जी के पाले में पहुंच गई है। देश जी का कहना है कि जनवरी तक छाप कर ठिकाने लगा देंगे।
उपन्यास का आवरण चित्र सुपरिचित चित्रकार और कहानीकार प्रभु जोशी का है।
उपन्यास का एक अंश साहित्यिक पत्रिका पाखी के दिसंबर अंक में प्रकाशित हुआ है, जिस पर काफी उत्साहवर्धक प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं।
एक और अंश साहित्यिक पत्रिका गुंजन के आगामी अंक में आने वाला है।
सब कुछ सामान्य रहा तो बहुत जल्द किताब आपके हाथ में होगी और मेरा सिर कढ़ाई में...

Monday, August 3, 2009

कारगिल : तीन कवितायें, तीन किस्से



1999 की बरसात के दिन थे।
युद्ध के काले बादल बरसकर छंट चुके थे। मगर चुनावी युद्ध के बादल जनता की उम्मीदों पर बरस पडऩे को बेताब थे। चुनाव की रिपोर्टिंग के सिलसिले में उस दिन मैं खरगोन जिले में था। शाम को कहानीकार भालचंद्र जोशी के घर पर जुटान हुआ। संयोग से वसुधा के सहयोगी संपादक और कवि राजेंद्र शर्मा भी उस दिन खरगोन में ही थे। कुछ और मित्र जुट गए और भालचंद्र के घर पर ही इन कविताओं का पहला पाठ हुआ।
ये कविताएं इंदौर से खरगोन जाते हुए रास्ते में लिखी गई थीं। उसी राइटिंग पैड पर, जिस पर मैं रास्ते भर निमाड़ क्षेत्र के चुनावी गुणा भाग दर्ज करता आ रहा था। उन दिनों मेरे पास दैनिक भास्कर इंदौर में फीचर प्रभाग की जिम्मेदारी थी। और चुनाव डेस्क का अतिरिक्त प्रभार भी था। सो व्यस्तता के उन दिनों में कारगिल युद्ध को लेकर फैले उन्माद के बीच हर तीसरे दिन कोई न कोई तुक्कड़ कवि कोई तुकबंदी लेकर हाजिर हो जाता, मसलन 'लाहौर में गाड़ देंगे तिरंगा और शरीफ को टांग देंगे करके नंगा।' कोई अगर कह देता कि भइया यह कविता नहीं तो वहीं पर एक और कारगिल युद्ध करने को उतारू हो जाते। एक-दो लोगों ने तो सीधे-सीधे चुनौती दे डाली कि तुम्हीं कोई कविता लिखकर बता दो कि युद्ध पर ऐसे नहीं तो कैसे लिखना चाहिए। तो इन तीनों कविताओं का लिखा जाना एक तरह से उस सब को एक रचनात्मक जवाब था।
खरगोन में भालचंद जी के घर ये कविताएं सुनने के बाद राजेंद्र शर्मा ने कहा, पैड से ये पन्ने निकालकर मुझे दे दो। वसुधा का अंक कल-परसों में प्रेस में जाने वाला है, उसमें विशेष उल्लेख के साथ देना चाहता हूं। इसी अंक में इनका जाना बेहद जरूरी है। मैंने कहा कि यह फस्र्ट ड्राफ्ट है और अभी इस पर कुछ काम होना बाकी है। परसों मैं इंदौर पहुंचकर कोरियर कर दूंगा। लेकिन परसों कहां कभी आता है। इंदौर पहुंचकर मैं अपने काम-काज में लग गया और ध्यान ही नहीं रहा कि कविताओं को फेयर करके भेजना भी है। फिर चौथे-पांचवें दिन राजेंद्र जी का फोन आया, तुमने अभी तक कविताएं भेजी नहीं, मैंने अंक रोक रखा है।' सो उसी दिन इन्हें फेयर करके रवाना किया गया। अगले हफ्ते वसुधा का वह अंक हमारे हाथ में था। अंक की शुरुआत में ही कारगिल प्रसंग के तहत विशेष उल्लेख के साथ ये कविताएं और कैरन हेडाक के स्केच छपे थे।
दूसरा किस्सा
रात 11 बजे होंगे। अचानक फोन की घंटी बजती है। मैंने उठाकर जैसे ही कहा- हलो, उस तरफ से आवाज आई-
'गोली मेरी और चीख मेरे भाई की
फिर बधाइयां क्यों बटोर रहे हैं बांके बिहारी मास्साब?
ये किस कवि की पंक्तियां हैं?' उस तरफ चंद्रकांत देवताले जी थे।
मैंने निहायत संकोच के साथ कहा कहा, 'हैं तो मेरी ही, पर कुछ गड़बड़ तो नहीं है?'
देवताले जी बोले, 'वसुधा का अंक आ गया है। तुम्हें बहुत-बहुत बधाई, तीनों कविताएं बहुत अच्छी हैं। इतनी सादगी से ऐसी गहरी बात कहने वाले बहुत कम हैं। आज ऐसी कविताओं की बहुत जरूरत है।'
'ऐसी कविताओं की बहुत जरूरत है,' यह सुनकर मुझे लगा जैसे कोई मेडल मिल गया हो, युद्ध लड़े बिना ही।

तो आप भी वसुधा-45-46 से साभार इन कविताओं को पढ़ें। और हां, तीसरा किस्सा इन कविताओं को पढ़ लेने के बाद।




अलक्षित

अभी-अभी जिस दुश्मन को निशाना बनाकर
एक गोली चलाई है मैंने
गोली चलने और उसकी चीख के बीच
कुछ पल के लिए मुझे उसका चेहरा
बिलकुल अपने छोटे भाई महेश जैसा लगा
जिस पर सन् 1973 में
जब मैं आठवीं का छात्र था और वह छठीं का
इसी तरह गोली चलाई थी मैंने
स्कूल में खेले जा रहे बंग-मुक्ति नाटक में
मैं भारतीय सैनिक बना था और वह पाकिस्तानी

बंदूक नकली थी पर भाई की चीख इतनी असली
कि भीतर तक कांप गया था मैं
लेकिन तालियों की गडग़ड़ाहट के बीच
जिस तरह नजर अंदाज कर दी जाती हैं बहुत सी चीजें
अलक्षित रह गया था मेरा कांप जाना

सब दे रहे थे बांके बिहारी मास्साब को बधाई
जो इस नाटक के निर्देशक थे
और जिन्होंने कुछ तुकबंदियां लिखी थीं जिन्हें कविता मान
मुहावरे की भाषा में लोग उन्हें कवि हृदय कहते थे

नाटक खत्म होने के बाद
गदगद भाव से बधाइयां ले रहे थे बांके बिहारी मास्साब
और तेरह साल का बच्चा मैं, सोच रहा था
कि गोली मेरी और चीख मेरे भाई की
फिर बधाइयां क्यों ले रहे हैं बांके बिहारी मास्साब

अभी-अभी जब असली गोली चलाई है मैंने
तो मरने वाले के चेहरे में अपने भाई की सूरत देख
एक पल के लिए फिर कांप गया हूं मैं
पर मुझे पता है कि इस बार भी अलक्षित ही रह जाएगा
मेरा यह कांप जाना

दर्शक दीर्घा में बैठे लोग मेरे इस शौर्य प्रदर्शन पर
तालियां बजा रहे होंगे
और बधाइयां बटोर रहे होंगे कोई और बांके बिहारी मास्साब।


दुश्मन के चेहरे में

वह आदमी जो उस तरफ बंकर में से जरा सी मुंडी निकाल
बाइनोकुलर में आंखें गड़ा देख रहा है मेरी ओर
उसकी मूंछे बिलकुल मेरे पिता जी की मूंछों जैसी हैं
खूब घनी काली और झबरीली
किंतु पिता जी की मूंछें तो अब काली नहीं
सन जैसे सफेद हो गए हैं उनके बाल
और पोपले हो गए हैं गाल दांतों के टूटने से
पर जब पिता जी सामने नहीं होते
और मैं उनके बारे में सोचता हूं
तो काली घनी मूंछों के साथ
उनका अठारह बीस साल पुराना चेहरा ही नजर आता है
जब मैं उनकी छाती पर बैठकर
उनकी मूंछों से खेलता था
खेलता कम था, मूंछों को नोचता और उखाड़ता ज्यादा था
जिसे देख मां हंसती थी
और हंसते हुए कहती थी-
बहुत चल चुका तुम्हारी मूंछों का रौब-दाब
अब इन्हें उखाड़ फेंकेगा मेरा बेटा
बरसों से नहीं सुनी मां की वो हंसी
पिता की मिल में हुई जिस दिन तालाबंदी
उसी दिन से मां के होठों पर भी लग गए ताले
जिनकी चाबी खोजता हुआ मैं
जैसे ही हुआ दसवीं पास
एक दिन बिना किसी को कुछ बताए भर्ती हो गया सेना में

पहली तनख्वाह से लेकर आज तक
हर माह भेजता रहा हूं पैसा
पर घर नहीं हो सका पहले जैसा

मेरे पालन-पोषण और पढ़ाई लिखाई के लिए
जो-जो चीजें बिकी या रेहन रखी गई थीं
एक-एक करके वे फिर आ गई हैं घर में
नहीं लौटी तो सिर्फ मां की हंसी
और पिता जी के चेहरे का रौब
छोटे भाई के ओवरसियर बनने और
मेरे विवाह जैसे शुभ प्रसंग भी
नहीं लौटा सके ये दोनों चीजें
मैं जिन्हें घर से आए पत्रों में ढूंढ़ता हूं हर बारा

आज ही मिले पत्र में लिखा है पिता जी ने-
तीन साल बाद छोटा घर आया है दस दिन के लिए
तुम भी आ जाते तो मुलाकात हो जाती
बहू भी बहुत याद करती है
और अपनी मां को तो तुम जानते ही हो
इस समय भी जब मैं लिख रहा हूं यह पत्र
उसकी आंखों से हो रही है बरसात

बाइनोकुलर से आंख हटा
जेब से पत्र निकालता हूं
इस पर लिखी है बीस दिन पहले की तारीख
यानी पत्र में जो इस समय है
वह तो बीत चुका है बीस दिन पहले
फिर ठीक इस समय क्या कर रही होगी मां
सोचता हूं तो दिखने लगता है एक धुंधला-सा दृश्य
मां बबलू को खिला रही है
और उसकी हरकतों में मेरे बचपन की छवियों को तलाशती हुई
अपनी आंखों की कोरों में उमड़ आई बूंदों को
टपकने के पहले ही सहेज रही है अपने आंचल में

पिता जी संध्या कर रहे हैं
और मेरी चिंता में बार-बार उचट रहा है उनका मन
पत्नी के बारे में सोचता हूं
तो सिर्फ दो डबडबाई आंखें नजर आती हैं
बार-बार सोचता हूं कि याद आए उसकी कोई रूमानी छवि
और हर बार नजर आती हैं दो डबडबाई आंखें

बहुत हो गई भावुकता
बुदबुदाते हुए पत्र को रखता हूं जेब में
और बाइनोकुलर में आंखें गड़ाकर
देखता हूं दुश्मन के बंकर की ओर

बंकर से झांक रहे चेहरे की मूंछें
बिलकुल पिताजी की मूंछों जैसी लग रही हैं
क्या उसे भी मेरे चेहरे में
दिख रही होगी ऐसी ही कोई आत्मीय पहचान?


स्वगत

खून जमा देने वाली इस बर्फानी घाटी में
किसके लिए लड़ रहा हूं मैं
पत्र में पूछा है तुमने
यह जो बहुत आसान सा लगने वाला सवाल
दुश्मन की गोलियों का जवाब देने से भी
ज्यादा कठिन है इसका जवाब

अगर किसी और ने पूछा होता यही प्रश्न
तो, सिर्फ अपने देश के लिए लड़ रहा हूं
गर्व से कहता सीना तान
पर तुम जो मेरे बारीक से बारीक झूठ को भी जाती हो ताड़
तुम्हारे सामने कैसे ले सकता हूं इस अर्धसत्य की आड़
देश के लिए लड़ रहा हूं यह हकीकत है लेकिन
कैसे कह दूं कि उनके लिए नहीं लड़ रहा मैं
जो मेरी जीत-हार की विसात पर खेल रहे सियासत की शतरंज
और कह भी दूं तो क्या फर्क पड़ेगा
जब कि जानता हूं इनमें से कोई न कोई
उठा ही लेगा मेरी जीत-हार या शहादत का लाभ

मेरा जवाब तो छोड़ो
तुम्हारे सवाल से ही मच सकता है बवाल
सरकार सुन ले तो कहे-
सेना का मनोबल गिराने वाला है यह प्रश्न
विपक्ष के हाथ पड़ जाए
तो वह इसे बटकर बनाए मजबूत रस्सी
और बांध दे सरकार के हाथ-पांव
इसी रस्सी से तुम्हारे लिए
फांसी का फंदा भी बना सकता है कोई

इसलिए तुम्हारे इस सवाल को
दिल की सात तहों के नीचे छिपाता हूं
और इसका जवाब देने से कतराता हूं।
- अरुण आदित्य

.................

तीसरा किस्सा
राजेंद्र नगर (इंदौर) का आपले वाचनालय। 14 सितंबर या उसके आस-पास की कोई तारीख। हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में कवि सम्मेलन था। मित्र प्रदीप मिश्र संचालन कर रहे थे। कारगिल युद्ध के बाद का ताजा-ताजा उल्लास-उन्माद था। वीर रस की कविताओं की बाढ़ थी। एक कवि ने मुशर्रफ की छाती पर तिरंगा फहराने जैसी कोई कविता इतने जोश से पढ़ी कि काफी देर तक तालियां गूंजती रहीं। वह एक दुबला पतला सा युवक था। प्रदीप ने उसके बाद मुझे कविता पाठ के लिए आमंत्रित किया। मैं यही कविताएं ले गया था पढऩे के लिए, लेकिन माहौल देखकर मेरा विश्वास डगमगा गया। लगा कि उल्लास-उन्माद के इस माहौल में इन कविताओं को कौन सुनेगा? मन में विचार आया कि कुछ प्रेम कविता वगैरह पढ़ देना चाहिए। प्रेम तो सदाबहार है। लेकिन जब डायस पर पहुंचा तो मन बदल गया। मैंने खुद से पूछा, क्या मुझे अपनी कविता पर भरोसा नहीं है? अगर आज इस उन्मादी माहौल में मैं इन्हें नहीं पढ़ सकता हूं, तो वह शुभ घड़ी कब आएगी जब इनका पाठ किया जाएगा। सो मैंने सोच लिया कि यही कविताएं पढ़ूंगा, चाहे लोग वाह-वाह कहें या हाय-हाय। मैंने थोड़ी सी भूमिका बांधी। उपस्थित श्रोताओं से सीधे सवाल किया, 'क्या हमें वीर रस की कविता लिखने का हक है? हम अपने जीवन में कितनी वीरता दिखा पाते हैं?' आज मुझे लगता है कि उस दिन मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था, लेकिन मैंने उस वीर रस के कवि की ओर इंगित करके कहा- 'अभी-अभी जो सज्जन मुशर्रफ की छाती पर तिरंगा फहराने की बात कर रहे थे, यही जब इस हाल के बाहर निकलेंगे तो गली का एक मरियल सा गुंडा भी अगर चाकू दिखा देगा तो अपने कपड़े तक उतार कर दे देंगे। चंद बरदाई जब पृथ्वीराज रासो लिखता था तो वह खुद युद्धक्षेत्र में मोर्चा भी लेता था। सच तो यह है कि मित्रो, युद्ध का मतलब हम समझ ही नहीं सकते हैं। इसका मतलब उस मां के दिल की धड़कन ही बता सकती है, जिसका बेटा युद्ध क्षेत्र में लड़ रहा होता है। युद्ध का मतलब वह पत्नी बता सकती है जो एक-एक पल गिनकर मोर्चे से पति के लौटने का इंतजार कर रही है। उस बाप से पूछो जिसके हंसते मुस्कराते बेटे की जगह उसका ताबूत अभी-अभी अभी आया है। मित्रो, मैं जो पढऩे जा रहा हूं वह कविता नहीं एक सैनिक के मन के तीन पन्ने हैं। अगर इन पन्नों को पढ़कर आपके मन में जरा भी उथल-पुथल मचे तो मैं अपनी मेहनत सफल समझूंगा।'
इसके बाद लोगों ने जिस धैर्य से इन कविताओं को सुना और बाद में जिस तरह की प्रतिक्रियाएं मिलीं, उससे कविता पर मेरा विश्वास और दृढ़ हो गया।
मित्रो, मैं जानता हूं ये बहुत साधारण कविताएं हैं और उससे भी साधारण ये किस्से हैं। पर इन में कुछ ऐसा है जो कविता पर मेरे विश्वास को दृढ़ करता है। आपका क्या कहना है...

Monday, June 8, 2009

हबीब साहब ने कहा था- मेरे पास वक्त बहुत कम है

फोटो सौजन्य : हिंदू

बढ़ते बाजार, चढ़ते सेंसेक्स से विकास को मत आंको

हबीब साहब ने दुनिया के इस रंगमंच से विदाई ले ली है. उन्हें याद करते हुए पेश है उनका एक पुराना साक्षात्कार, जो अभी
24 मई २००९ को अमर उजाला, सन्डे आनंद में प्रकाशित हुआ है।

हबीब तनवीर से अरुण आदित्य की बातचीत

जुलाई 2007 की वह एक बेहद सुहानी शाम थी। उस खुशगवार मौसम में भोपाल के श्यामला हिल्स इलाके में हबीब साहब के घर जाते हुए मुझे यूं ही कवि ओम भारती के एक कविता संग्रह का शीर्षक याद आ गया- ‘इस तरह गाती है जुलाई।’ गाती हुई जुलाई की उस शामहबीब साहब पूरी रौ में थे। बात करना शुरू किया तो रुकने का नाम नहीं। उनके पास अनुभव का अथाह भंडार है और हम भी सब कुछ जान लेने को उत्सुक थे। बात आजादी की हीरक जयंती के संदर्भ में थी, लेकिन जब सिलसिला चल निकला तो थिएटर, साहित्य, समाज सबका जिक्र होना लाजिमी था।
हमने पूछा, ‘आजकल क्या कर रहे हैं। बोले, ‘करना तो बहुत कुछ चाहता हूं, लेकिन वक्त मेरे पास बहुत कम है।’ ‘हबीब साहब आपने अभी तक जितना काम किया है, वही करने में हम जैसे लोगों को तो शायद कई जनम लग जाएंगे।’ हमने यह बात उन्हें तुष्ट करने के लिए नहीं कही थी, बल्कि यह एक सचाई थी। पर इस सचाई से वे खुश नहीं हुए थे। खुश हो भी कैसे सकते थे। दुनिया की बेहतरी के सपने जिसकी आंखोें में बस जाएं, उसे इन हालात में खुशी कैसे नसीब हो सकती है। हालांकि तब तक मंदी की दस्तक नहीं हुई थी और न दूर-दूर तक कहीं उसकी आहट सुनाई दे रही थी, लेकिन हबीब साहब की दूर दृष्टि जैसे उसे देख रही थी। आजादी के बाद आर्थिक विकास की चर्चा चली। उस समय देश की विकास दर 9 प्रतिशत होने से बाजार में जश्न का माहौल था। हमने कहा, ‘देश की विकास दर बढ़ी है तो इसका मतलब है कि देश में विकास तो हुआ है?’ हबीब साहब का जवाब आंखें खोलने वाला था, ‘अरबपतियों की बढ़ती तादाद से ही देश के विकास का लेखा-जोखा मत कर डालो। एक नजर जरा गरीबों पर भी डाल लो। असंतुलित विकास से समस्याएं और बढ़ेंगी। बढ़ते बाजार और चढ़ते सेंसेक्स से विकास को मत आंको। बाजार आपको वह खरीदने के लिए भी मजबूर कर देता है, जिसकी आपको जरूरत नहीं है। इसके जाल में फंसोगे तो मुश्किल होगी।’

बात से बात निकल रही थी और हबीब साहब हर मुद्‌दे पर बेबाक थे। हमने दुखती रग पर हाथ रखने की कोशिश की, ‘आपके नाटकों को लेकर पिछले दिनों काफी विवाद हुए थे।’ हबीब साहब बोले, ‘सवाल सिर्फ मेरे नाटकों का नहीं है। सवाल अभिव्यक्ति की आजादी का है। आप कोई फिल्म बनाते हैं, तो बवाल हो जाता है। पेंटिंग बनाएं तो बवाल। लेखक को भी लिखने से पहले दस बार सोचना पड़ता है कि इससे पता नहीं किसकी भावना आहत हो जाए और जान-आफत में। दुख की बात यह है कि सरकार इस सब पर या तो चुप है, या उन्मादियों के साथ खड़ी नजर आती है। ऐसे में संस्कृति का विकास कैसे हो सकता है।’

उन्होंने संस्कृति का मुद्‌दा उठाया तो हमें अगला सवाल मिल गया, ‘जब संस्कृति के क्षेत्र में हालात इतने विकट हैं तो ऐसे में देश के सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों की भूमिका क्या होनी चाहिए?’ इस सवाल पर उनका दर्द आक्रोश बन कर आंखों में उतर आया, ‘आप किन प्रतिष्ठानों की बात कर रहे हैं। वहां ऐसे लोगों की ताजपोशी की जा रही है जिनमें न टैलेंट है न विजन, और न ही कुछ कर गुजरने की लगन। ऐसे बौने लोगों से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं। इन बौने लोगों ने संस्कृति का कद भी घटा दिया है। पद-पुरस्कार के लिए आत्मसम्मान को गिरवी रख देते हैं।’

संस्कृतिकर्मियों के लाभ-लोभ की बात चली तो हबीब साहब को वह पुराना किस्सा याद आ गया, जब उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया था। बोले, ‘1972 की बात है। मार्च महीने में सोवियत प्रकाशन विभाग से मेरी नौकरी छूट गई थी। उस समय मेरे पास कोई काम नहीं था। पैसे की तंगी चल रही थी। अगले महीने अचानक एक दिन एक पुलिस जवान मेरे घर आया। उसने एक नंबर दिया और कहा इस पर बात कर लीजिएगा, जरूरी है। फोन लगाया तो दूसरी तरफ आर के धवन थे। इंदिरा गांधी के निजी सचिव। सीधा सवाल किया- क्या मुझे राज्यसभा में मनोनयन स्वीकार है। मेरे लिए यह अप्रत्याशित था। मैंने कहा, ‘सोच-विचारकर बता दूंगा।’ धवन ने कहा कि सोचने-विचारने के लिए ज्यादा समय नहीं है। बीस-पच्चीस मिनट में बता दीजिए, क्योंकि शाम पांच बजे घोषणा करनी है। मैंने कहा, ‘मैं पलटकर आप को फोन करता हूं।’ घर आकर मोनिका से बात की, मोनिका को भी राज्यसभा की जिम्मेदारी के बारे में कुछ पता नहीं था। फिर एक दोस्त मेंहदी को फोन लगाया। वे छूटते ही बोले, ‘बेवकूफ मत बनो, तुरंत हां कर दो।’ तो उस जमाने में इस तरह चयन-मनोनयन होता था। आज तो बौने लोग खुद ही राजनेताओं के चक्कर लगाते रहते हैं कि कुछ मिल जाए।’

‘और राजनीति में भी तो कितने बौने लोग आ गए हैं?’ हबीब साहब बोले, ‘राजनीति में अब राजनेता बचे ही कितने हैं। वहां तो अपराधियों की भरमार हो गई है। धनबल-बाहुबल के दम पर चुनाव जीते जाते हैं। ऐसे नुमाइंदों से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं।’
थिएटर के भविष्य की बात चली तो वे उदास हो गए। कहने लगे, ‘आज थिएटर पैसे और दर्शक दोनों के लिए मोहताज है। लोक नाट्‌य और लोक परंपराओं में भी लोगों की रुचि कम हो रही है। हमारे छत्तीसगढ़ में नाचा देखने के लिए लोग रात-रात भर जागते थे। अब किसे फुर्सत है।’

‘तो क्या आपको कोई उम्मीद नहीं है?’

‘नहीं, नहीं, मैं इतना नाउम्मीद नहीं हूं। मुझे नौजवानों से काफी उम्मीद है। वे करप्शन के खिलाफ हैं। उनमें तर्कशक्ति है, कुछ करने का जज्बा है। अपना भविष्य वे खुद गढ़ना चाहते हैं।’ यह सब कहते हुए हबीब साहब की बूढ़ी आंखों में चमक आ गई थी। उस चमक को देखकर मुझे उनके नाटक कामदेव का अपना, वसंत ऋतु का सपना का एक नाट्‌य-गीत याद आ गया-

खेत खार में जाऊं

मैं नदी पहाड़ में जाऊं

मैं आग बनूं, तूफान बनूं

और घूम-घूम लहराऊं।

Monday, May 11, 2009

कृष्णा सोबती से बातचीत


जिंदगीनामा से लेकर समय सरगम तक फैला रचना संसार उनकी कलम के जादू का गवाह है। उनसे बात करना एक विलक्षण अनुभव हैहालाँकि वे आसानी से बातचीत के लिए तैयार नहीं होतीं, लेकिन बात शुरू हो जाए तो फ़िर बेलाग बोलती हैंहमने भी जब कृष्णा जी को बातचीत के लिए राजी कर लिया तो साहित्य से लेकर समाज और राजनीति तक पर काफी बातें हुईंपेश है उस विस्तृत बातचीत का एक अंश जो अमर उजाला के रविवारीय परिशिष्ट सन्डे आनंद में २६ अप्रैल २००९ को प्रकाशित हुआ है

लेखक की व्यक्तिगत सामाजिक और

मानसिक प्रतिबद्धता के पैमाने बदल गए


कृष्णा सोबती से अरुण आदित्य की बातचीत

'जिंदगीनामा' से 'समय सरगम' तक आपकी भाषा कथ्य के मुताबिक बदलती रही है, पर एक चीज जो नहीं बदली वह है एक विशिष्ट तरह की लयात्मकता, जिसके कारण आपकी कोई भी रचना पढ़ते हुए, लगता है जैसे हम किसी लहर के साथ तैर रहे हैं। भाषा की यह लय आपने अभ्यास से अर्जित की है, या उस इलाके की सहज देन है, जहां आपका जन्म हुआ है?

- जिस भाषाई लयात्मकता की ओर आपका संकेत है, उसकी खूबी इतनी लेखक की नहीं, जितनी रचनात्मक विचार और पात्रों के निजी संवेदन की है। पात्र की सामाजिकता, उसका सांस्कृतिक पर्यावरण उसके कथ्य की भाषा को तय करते हैं। उसके व्यक्तित्व के निजत्व को, मानवीय अस्मिता को छूने और पहचानने के काम लेखक के जिम्मे हैं। भाषा वाहक है उस आंतरिक की जो अपनी रचनात्मक सीमाओं से ऊपर उठकर पात्रों के विचार स्रोत तक पहुंचता है। सच तो यह है कि किसी भी टेक्स्ट की लय को बांधने वाली विचार-अभिव्यक्ति को लेखक को सिर्फ जानना ही नहीं होता, गहरे तक उसकी पहचान भी करनी होती है। अपने से होकर दूसरे संवेदन को समझने और ग्रहण करने की समझ भी जुटानी होती है। एक भाषा वह होती है जो हमने मां-बोली की तरह परिवार से सीखी है- एक वह जो हमने लिखित ज्ञान से हासिल की है। और एक वह जो हमने अपने समय के घटित अनुभव से अर्जित की है। जिस लयात्मकता की बात आपने की, समय को सहेजती और उसे मौलिक स्वरूप देती वैचारिक अंतरंगता का मूल इसी से विस्तार पाता है।

पंजाब के गुजरात में जहां मेरा जन्म हुआ था वहां का भाषाई ध्वनि संस्कार काफी कडिय़ल, दो टूक और खुरदरा है। स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले की राजधानी दिल्ली और शिमला में बचपन के जिस देशी-विदेशी अनुशासित आबो-हवा में बड़ी हुई उसमें भाषा का अजीब सम्मिश्रण था। उसमें एक साथ विदेशी का स्वीकार और भारतीयता के अपनत्व के नाते देशी भाषा जो नागरी थी, उसका गहरा सत्कार था। अंग्रेजी हुकूमत के रोबीले अहंकार के सामने हर दिल में इसके लिए आदर और विश्वास का भाव था। ऊपरी सतह पर सत्ता का जो भी प्रभाव था, नेपथ्य से झांकता देसी पोथियों का साहित्य संसार था। हमारा भाषाई संसार समय के साथ बदलता भी रहा। शासित होने और आजादी के संघर्ष में जीवट वाली भाषा और बोलियां उभरीं। फिर विभाजन की विभीषिका और स्वाधीन होने का आत्मविश्वास। नए भाषाई तेवर उभरे। इस प्रक्रिया को जानने और पहचानने की क्षमता और सामथ्र्य मिली अपने परिवार से, जिसने इन बारीकियों को देखने, समझने और ग्रहण कर शब्दों को नए अर्थ देने की तालीम दी।

भारतीय ज्ञानपीठ पाने वाले हिंदी लेखकों में कवियों की संख्या अधिक है। पंत, दिनकर, अज्ञेय, श्रीनरेश मेहता, निर्मल वर्मा और कुंवर नारायण, इनमें से विशुद्ध कथाकार सिर्फ निर्मल वर्मा हैं। बाकी या तो कवि हैं या कवि-कथाकार। अज्ञेय कवि-कथाकार थे, लेकिन पुरस्कार कविता-कृति के लिए ही मिला। विशुद्ध कथा विधा के एकमात्र लेखक निर्मल वर्मा को पुरस्कार पूरा नहीं मिला, बल्कि गुरदयाल सिंह के साथ साझा मिला। यह संयोग मात्र है या हमारे निर्णायक गण कविता को कहानी की अपेक्षा ज्यादा महत्व देते हैं?

यह तो मानना ही होगा कि साहित्य की तमाम विधाओं में कविता मानवीय मन की विशिष्टतम अभिव्यक्ति है। इसका स्रोत मानवीय मन की उस गहन अनुभूति से है जो आत्मा रूह से जुड़ी है। इसे लेकर परेशान होने की जरूरत नहीं है। साहित्य संगठनों द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कार-सम्मानों की चुनाव प्रक्रियाएं संगठन और उसके द्वारा बनाए गए न्यास के माननीय सदस्यों पर निर्भर हैं। आज के समयों में उस पर विश्वास करने के अलावा कोई और चारा नहीं। यह निर्णय संगठन की आचार संहिता और राजनीति से अलग नहीं किए जा सकते। चुनाव प्रक्रियाएं असंख्य बारीकियों से घिरी रहती हैं। उदाहरण के लिए निर्मल वर्मा और गुरदयाल सिंह को दिया गया ज्ञानपीठ सम्मान विवाद के घेरे में रहा, जो इतना गलत भी नहीं था। राजनीति की दो विरोधी धाराओं की नुमाइंदगी करने वाली दो भाषाओं हिंदी और पंजाबी को बीच में रखकर सम्मान की बांट कर दी गई। जिससे दोनों भाषाओं के महत्वपूर्ण लेखकों की गौरव-हानि हुई। वैसे निर्मल जी चाहते तो कह सकते थे कि अपनी भाषा के सम्मान के लिए मैं इस साझेदारी का विरोध करता हूं।

आज देश के जो हालात हैं और जिस तरह की बयानबाजियां हो रही हैं...

देखिए राम कितने मितभाषी थे और लोग उनके नाम को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं। यह मर्यादा पुरुषोत्तम की प्रतिष्ठा का हनन है। प्रधानमंत्री के बारे में कहा जा रहा है कि वे कमजोर हैं। हमको एक मर्द प्रधानमंत्री चाहिए। कमजोर कहना प्रधानमंत्री पद की गरिमा का हनन है। अगर यह कहते कि वे राजनीतिक दृष्टि से कमजोर हैं तो कोई बात नहीं थी। हो सकता है कि वे यही कहना चाह रहे हों लेकिन शब्दों के चयन में समझदारी दिखानी चाहिए। आज अगर हम माइनॉरिटी को, दलितों को, पिछड़ों को अपमानित करने वाली बात करेंगे, तो देश की एकता कैसे कायम रह पाएगी। लेकिन राजनीतिज्ञ ऐसी टिप्पणियां कर रहे हैं। और हमारा लेखक समाज भी इस पर मौन है।

एक तरफ लेखक देश की राजनीति को लेकर निस्संग है, दूसरी तरफ साहित्य की राजनीति में पूरी तरह डूबा हुआ है। पिछले दिनों महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की पत्रिका हिंदी के संपादन को लेकर गगन गिल द्वारा ममता कालिया को मीडियॉकर कहना और बदले में 'नया ज्ञानोदय' का संपादकीय। फिर एक अखबार में गगन जी का लेख। इस तरह के विवाद समाज में लेखक की किस तरह की छवि प्रस्तुत कर रहे हैं?

देश के राजनीतिक सांस्कृतिक परिदृश्य को बारीकी से देखें तो महसूस करेंगे कि लेखक वर्ग की व्यक्तिगत सामाजिक और मानसिक प्रतिबद्धता के पैमाने बदल गए हैं। लेकिन इसके लिए मात्र लेखक समाज ही जिम्मेदार नहीं। साहित्य को नियंत्रित करते राजनीतिक और सांस्कृतिक गलियारों के गठबंधन ने रचनात्मक मैनेजमेंट की अपनी बारीकियों से लेखकों के दृष्टिकोण को आर्थिक गुणा-भाग के स्वहित-साध्य में परिवर्तित कर दिया है। इस स्थिति ने लेखक की आंतरिक जटिलताओं, गहराइयों को निहायत हलके स्तर में रूपांतरित कर दिया है। लेखक बिरादरी की मनमौजी असावधान समझदारी ने देखते-देखते अपने अनुशासन को संस्थानों की रीति-नीति के अनुरूप ढाल लिया है। अकारण नहीं कि स्वयं लेखक खुद को और साहित्य को हाशिए पर देखने का आदी हो गया है। लेखक अपने आत्मपक्षी उत्साह उछाह में लेखकीय अस्मिता को फीका तो कर ही रहे हैं। साहित्यिक विवादों पर कुछ भी कहना नहीं चाहती। जब अनुभवी संपादक राजधानी के डेस्क से राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को न उठाकर घरेलू प्रसंगों वाले संपादकीय लिखें, तो क्या पाठक भी उसे समयानुकूल समझ कर आदर और श्रद्धा से स्वीकार करेंगे?

हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में इतना अच्छा लेखन हो रहा है, लेकिन उसे अंग्रेजी के बराबर महत्व क्यों नहीं मिल पाता?

हर भाषाई परिवार की संस्कृति और संस्कार गहरे तक उसके पाठक समाज से जुड़े होते हैं। भारतीय भाषाओं की रचनात्मक ऊर्जा नि:संदेह अंग्रेजी से कम नहीं। लेकिन अंग्रेजी के साहित्यिक वैभव, विभिन्न अनुशासनों के प्रकाशन और अंतरराष्ट्रीय बाजार के पाठक वर्ग तक पहुंच पाना हमारे भाषा लेखकों के लिए आज इतना आसान नहीं। भाषायी साहित्य का पाठक वर्ग सीमित है। इलीट अंग्रेजी को तरजीह देता है। भारतीय भाषाओं के अनुवाद के लिए एक अंतर्भारतीय और अंतरराष्ट्रीय अनुवाद संस्थान का होना जरूरी है, ताकि विविध भारतीय भाषाओं की रचनाओं के अनुवाद हो सकें।

आपने व्यास सम्मान अस्वीकार कर दिया, ताकि युवा पीढ़ी को मौका मिले। जबकि हिंदी के कई वरिष्ठ लेखक साल भर पुरस्कारों के लिए जोड़-तोड़ करते रहते हैं और न मिलने पर विवाद खड़ा कर देते हैं। आखिर हमारे लेखकगण पुरस्कारों को इतना महत्व क्यों देते हैं?

'समय सरगम' के लिए व्यास सम्मान को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर मैं माननीय निर्णायक मंडल का ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहती थी कि लेखकों को पुरस्कृत करने की नीति में कुछ बदलाव हो। युवा पीढ़ी और अपेक्षाकृत प्रौढ़ पुरानी पीढ़ी की लेखकीय ऊर्जा और उनसे जुड़ी संभावनाओं को ध्यान में रखकर निर्णायक मंडल निर्णय लें। किसी भी अच्छी कृति को एक सम्माननीय पुरस्कार तक पहुंचने में अगर आठ दस बरस लगें, तो उसे अनदेखा करना ही साहित्य के स्वास्थ्य के लिए अच्छा होगा। पुरानी पीढ़ी और पुरानी कृति के सन्मुख नई कृति के पुरस्कृत होने के संयोग को निरर्थक हो जाने देना ठीक नहीं है। यहां यह कहना भी जरूरी है कि साहित्य अकादमी के खासे बड़े बजट में आज भी पुरस्कार राशि पचास हजार ही क्यों ? हर भाषा के लिए कम से कम लाख का प्रावधान तो होना ही चाहिए। यहां छोटे व्यक्तिगत पुरस्कारों के बारे में भी यह कहना अप्रासंगिक न होगा कि लेखकों की दयनीय स्थिति के प्रसंग उभारकर उन्हें पुरस्कार देना उनका ही नहीं, शब्द- संस्कृति का भी अपमान है। हम व्यवस्था, संगठनों और लेखकों से यह कहना चाहते हैं कि एकांत क्षेत्र में लेखकों के आवास और कार्यकारी सुविधाओं की बात हम क्यों नहीं सोचते। हर प्रदेश ऐसी योजना को अंजाम दे सकता है। साहित्य अकादमी और नेशनल बुक ट्रस्ट भी ऐसी पहल कर सकते हैं।