Sunday, February 17, 2008

हत्यारे को मत कहिये हत्यारा है

हत्यारे को मत कहिये हत्यारा है।
लोकतंत्र को ये सब नहीं गवारा है।

तुम कहते हो 'हत्यारा'
जनता सुनती 'बेचारा' है।
बेचारे को बदनाम मत करो
उसने किसको मारा है।

जनता का जनता की खातिर
जो जनता के द्वारा है
उसकी ही तो मौत हुई है
और वही हत्यारा है।
हत्यारे को मत कहिये हत्यारा है।
लोकतंत्र को ये सब नहीं गवारा है।
-अरुण आदित्य
(जनविकल्प की साहित्य वार्षिकी में प्रकाशित)

9 comments:

बोधिसत्व said...

क्या बात है भाई...
आपने तो एकदम कबीराना अंदाज का कमाल पा लिया है...
बधाई हो..

प्रदीप मिश्र said...

अच्छी कविता के लिए बधाई।

आशीष said...

चुभ रही है यह कविता दिल को, और हां गुरुवर बोधिसत्‍व के शब्‍दों में कहूं तो कबीराना अंदाज

Parul said...

acchhi baat.....

Ek ziddi dhun said...

bahut achhi lagi..loktantra aur nagrik samaj ke hami ek kavi yaad aaye..ek patrkaar aur sahitykaar ne likhayee aap se ye kavita

परेश टोकेकर said...

अरूण भाई एकदम सटिक बात कहीं है जनता जर्नादन ही अपनी दुर्दशा की जिम्मेदार है लेकिन वह सब कुछ देख सुन समझ रहीं है बस यथास्थितिवाद से ग्रस्त है जो ज्याद समय तक बरकरार नहीं रहने वाला हैं।

Sudeep said...

क्या बात है! अरुण जी बिल्कुल अलग अंदाज. यह हमारे समय का सच है. बधाई...

Dr. Chandra Kumar Jain said...

जनता .....................हत्यारा है.
इन चार पंक्तियों में प्रजातन्त्र के लिए
जो प्रतीक आपने चुने हैं,
उनमें ही कविता की ज़ान है.
यह कविता बरास्ते ज़म्हूरियत
आम आदमी की बेबसी का सबब भी बताती है !

अशोक कुमार पाण्डेय said...

वाह अरुण भाई…

यह कविता कैसे अनपढ़ी रह गयी?
उपलब्ध कराने के लिये आभार