Saturday, February 13, 2010

उत्तर वनवास : नामवर सिंह और राजेंद्र यादव की राय

इसी 6 फरवरी को पुस्तक मेला प्रांगण में आधार प्रकाशन के स्टाल पर नामवर सिंह और राजेंद्र यादव ने मेरे पहले उपन्यास 'उत्तर-वनवास ' का लोकार्पण किया। अल्प सूचना पर दिल्ली जैसे बेदिल कहे जाने वाले शहर में जिस तादाद में मित्रों और शुभचिंतकों ने उपस्थिति दर्ज कराई, उससे मैं अभिभूत और दिल से शुक्रगुजार हूं। समारोह में न पहुंच सके मित्र धीरेश और कई अन्य मित्रों का लगातार आग्रह रहा है कि लोकार्पण समारोह की तस्वीरें जारी कर दी जाएं। कुछ और मित्रों का आग्रह था कि इस मौके पर वक्ताओं ने क्या कहा, वह भी जारी कर दूं क्योंकि समारोह में काफी भीड़ थी और माइक न होने से पीछे खड़े लोग ठीक-ठीक सुन नहीं पाए थे कि वक्ताओं ने क्या कहा। संयोग से बिटिया शुचि ने रेकार्डिंग कर ली थी। तो प्रस्तुत है समारोह की एक झलक-

लीलाधर मंडलोई (मंच-संचालक) :
अरुण आदित्य मेरे अभिन्न मित्र हैं। मध्यप्रदेश में रहे हैं। हमने साथ में कविता शुरू की थी। लेकिन राजेंद्र यादव के कहने पर उन्होंने कविता छोड़ उपन्यास लिख डाला है (समवेत हंसी और उसी के बीच फंसी मेरी सफाई, कि कविता छोड़ी नहीं है)। बहुत अद्भुत उपन्यास है, इसके कुछ अंश मैंने पढ़े हैं। नामवर जी और राजेंद्र जी से आग्रह है कि आप दोनों इसका लोकार्पण करें। (लोकार्पण संपन्न होता है)

नामवर सिंह :
अरुण आदित्य को मैं कवि रूप में जानता था। अब चूंकि पत्रकारिता का पेशा ऐसा है कि कविता में पत्रकारिता नहीं हो सकती। उसके लिए नित्य गद्य से ही जूझना पड़ेगा। मुझे लगता है कि पत्रकारिता ने अपने बीच से एक उपन्यासकार पैदा किया है। तो उस पेशे को मैं दाद दूंगा जिसने इन्हें कथाकार बनाया। और मैं उपन्यास को उलट-पलटकर देख रहा था तो मुझे लगा कि यह बिलकुल सही जगह है। यहां पेशे में और उपन्यास लेखन में कोई टकराव नहीं है। एक बात और, सीधे ये उपन्यास की ओर ही गए। आमतौर पर लोग कहानियों की छोटी पगडंडी से चलकर उपन्यास के राजमार्ग तक आते हैं। लेकिन पहली ही छलांग में इन्होंने उपन्यास लिख दिया। यह भी इन्होंने अच्छा काम किया, क्योंकि आम तौर पर कहानियां लिखते-लिखते लोग जब उपन्यास पर जाते हैं उपन्यासों में भी कहानी ही लिखते हैं। बेहतर है तुम उपन्यास के रास्ते ही रहो, और कहानियां कम ही लिखो। मैं बधाई देता हूं उत्तर-वनवास के लिए, जो आभास देता है एक पौराणिक नाम और कथा का, परंतु वास्तव में आज के यथार्थ की सच्ची कहानी है।


राजेन्द्र यादव :
यह उपन्यास एक पत्रकार और कवि का लिखा हुआ है। इनकी भाषा में जहां पत्रकारिता की चुटकी है, विवरण हैं, वहीं कविता का स्पर्श भी जगह-जगह मिलता है। जिस तैयारी से अरुण आदित्य आए हैं, मेरा ख्याल है कि दुनिया के बहुत बड़े बड़े उपन्यासकार चाहे वे हैमिंग्वे हों, चाहे सामरसेट मॉम हों, सारे लोग पत्रकार ही थे, मैं समझता हूं कि यह उनके लिए संभावनाओं का एक नया क्षेत्र है। इसमें उन्होंने रामचंद्र नाम के आदमी को लेकर उसकी जीवन यात्रा को लिखा है। कथा रामचंद्र के गांव से शुरू होती है, जहां आपसी झगड़े हैं, ठाकुरों और ब्राह्मणों में वर्चस्व की लड़ाई है। गांव के एक झगड़े में उसके हाथों एक आदमी मर जाता है या घायल हो जाता है। वहां से भागकर वह एक साधु के चक्कर में पड़ जाता है। और एक आश्रम में चला आता है। अंत में वह बीजेपी जैसी किसी सांस्कृतिक राष्ट्रवादी पार्टी के साथ जुड़ जाता है और वहां की जो भीतरी बिडंबनाएं हैं, जो अंतर्विरोध हैं, आडंबर हैं, उन्हें गहराई से देखता है, जिससे धीरे-धीरे उसका मोहभंग होता है। और वह वापस उस जगह, उस व्यक्ति के पास लौट आता है, जिसकी बातें उसे रीजनेबल लगती हैं। और जहां उसे मन की शांति मिलती है। इस तरह से मैं समझता हूं कि यह उपन्यास पहला उपन्यास है, और अगले उपन्यासों की बहुत आशापूर्ण संभावना जगाता है।
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आभार :
आधार
प्रकाशन के स्टाल पर उपस्थित जिन मित्रों-शुभचिंतकों के नाम मुझे इस समय याद आ रहे हैं : मुरली
मनोहर प्रसाद सिंह, रेखा अवस्थी, संजीव, कर्मेंदु शिशिर, मदन कश्यप, अजीत अंजुम, गीताश्री, मनमोहन, शुभा, प्रेमपाल शर्मा, सत्यपाल सहगल, लाल्टू, देश निर्मोही, प्रेम भारद्वाज, मनोज सिंह, अजय नावरिया, अजित राय, वैभव सिंह, सुदीप ठाकुर, निरंजन श्रोत्रिय, हरि मृदुल, लता शर्मा, प्रदीप मिश्र, अविनाश, रवीश कुमार, राजेश जैतली, सत्येंदु मिश्रा, कल्लोल चक्रवर्ती, चंद्रकांत सिंह, ब्रजमोहन, उमाशंकर सिंह, उमाशंकर चौधरी, ज्योति चावला, रोहित प्रकाश, अवनीश मिश्र, लल्लन बघेल, पल्लव, कुमार सर्वेश, आशीष अलेक्जेंडर, वेदविलास उनियाल, अभिलाष वर्मा। पीछे खड़े कई मित्रों-शुभचिंतकों को मैं भीड़ में घिरे होने के कारण देख नहीं सका, और कई के नाम इस समय याद नहीं आ पा रहे हैं, उन सब के प्रति भी मैं दिल से कृतज्ञ हूं।

एक
और सूचना :

उत्तर
वनवास की बिक्री को लेकर आधार प्रकाशन के संचालक देश निर्मोही काफी उत्साहित हैं। विमोचन के मौके पर डेढ़-दो घंटे में ही करीब 30-35 प्रतियां मेरे हस्ताक्षर के साथ बिक गईं। मेले में उपन्यास की प्रतियां 3 फरवरी को पहुंच पाई थीं। 25 से अधिक प्रतियां लोकार्पण के पहले ही बिक गई थीं। मजेदार बात यह है कि देश निर्मोही ने कम से कम तीन लोगों को उपन्यास की पहली प्रति बेच दी है। मित्र गीत चतुर्वेदी ने एसएमएस कर बताया कि लोकार्पण के पहले ही 'पहली प्रति 'खरीद ली है। इसी तरह हरि मृदुल के पास भी पहली प्रति है। उमाशंकर सिंह ने तो देश निर्मोही से पूछ ही लिया कि आपने मुझे जो 'पहली प्रति ' बेची है, वह 'पहली-पहली ', 'दूसरी-पहली 'या फिर 'तीसरी-पहली 'प्रति है। मैं इस आत्मीयता के लिए आप सब का हृदय से आभारी हूं। मेले के लिए सिर्फ 100 प्रतियां ही छपकर आ पाई थीं। 7 फरवरी को मेले की आखिरी शाम जब देश निर्मोही पैकअप कर रहे थे तो मैंने लेखकीय प्रतियां मांगी, उस समय उनके पास मात्र चार-पांच ही बची थीं। जानता हूं कि पांच दिन में पचासी-नब्बे प्रतियां बिक जाना कोई बड़ी बात नहीं है, पर जिस तरह कहा जा रहा है कि किताबों के पाठक नहीं हैं, उसमें यह आंकड़ा किंचित संतोष तो देता ही है।

ऊपर की पहली तस्वीर को छोड़कर बाकी तस्वीरें इंदौर से आए कवि मित्र प्रदीप मिश्र ने खींची हैं।




20 comments:

शरद कोकास said...

अरुण भाई , सबसे पहले तो इस किताब की बधाई स्वीकार कीजिये । मै दिल्ली नहीं आ पाया वरना इस विमोचन समारोह मे मै भी शामिल रहता । कविता लिख्नी आपने छोड़ी नहीं है , मुझे पता है । बाकी समाचार तो मित्रों से मिल गये हैं । शुभकामनायें । मेरा ब्लॉग देखियेगा ।

http://kavikokas.blogspot.com

Priyankar said...

बधाई ! बहुत-बहुत बधाई !

Suman said...

nice

pallav said...

Muje bhi pahli prati milne ki ummeed hai.

शशिभूषण said...

आपको मेरी भी बधाई.राजेन्द्र यादव जी की बातें ग़ौर करने लायक है.प्रदीप मिश्र जी ने अच्छी भूमिका निभाई है.

Geet Chaturvedi said...

उपन्‍यास की बधाई.
पर ...
इस 'देश' का यारो क्‍या कहना...

शिरीष कुमार मौर्य said...

badai ho arun ji.

शिरीष कुमार मौर्य said...

badhai ho arun ji.

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

Arun Aditya bhai, bahut-bahut badhai!

अजेय said...

सब ठीक है, पर कहीं हम एक कवि को खो न दें.

sidheshwer said...

अरे ! मैं तो समझ रहा था कि मेरे पास ही 'पहली' प्रति है जो मेला घूमने के दौरान खरीदी गई थी ३ फरवरी २०१० को शाम ३ बजकर २३ मिनट पर !

खैर,
बधाई !आदित्य भाई!

हरे प्रकाश उपाध्याय said...

bahut badhaee! mai lokarpan ke din ek gharelu jhanjhat me fans gya aur aa n saka , itna sundar mauka gwane ka khed hai...
baharhal badhaee!

varsha said...

badhayee arunji...sab kuch ek saan mein padh gayee.delhi aane ka man tha.agla mouka miss nahin karungi.love to shuchi and badi badhayee kamleshji ko.

mera anubhav said...

sarv pratham aapko badhai sir,
aur dusraa aapka bahut bahut dhanyawad ki aap ke blog ke madham se namvar singh jee aur rajendra sir ke vicharon ko janne ka mauka mil saka. ek bar punah aapko badhai.

mera anubhav said...

sir, sarvpratham aapko bahut bahut badhai.
aur aapne vimochan samaroh ko blog pr post kiya isse hame namvar singh aur rajendra sir ke vicharo ko janne ka mauka mil saka iske lie aapka tahe dil se dhanyawad.

Arun Aditya said...

धन्यवाद, शुक्रिया, आभार, बहुत सा प्यार दोस्तो।
@ गीत: वाकई गीत जी, इस 'देश' का यारों क्या कहना।
@ पल्लव: तुहारी पहली प्रति बहुत जल्द तुहें मिल जाएगी।

vijay gaur/विजय गौड़ said...

बहुत बहुत बधाई। एक प्रति तो मेरे पास भी है ६ फ़रवरी को ही खरीदी थी, पता नहीं पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी--- कौन सी है। विमोचन के दौरान रहने का मन था पर पहले ही निकल जाना पड़ा। उपस्थित न रह पाया उसका अफ़सोस। पुनः बधाई।

प्रदीप कांत said...

फिर से बधाई। यह शायद तीसरी है। जब तक उत्तर वनवास की बात करोगे बधाई देता रहूंगा।

Ek ziddi dhun said...

हाँ ये ठीक है कि आपको यह सफाई देनी पड़ी होगी कि भाई लोगों कविता छोड़ी नहीं है. और ये जरूरी भी नहीं है कि कोई लेखक जो समझ रहा है और जिसे अभिव्यक्त करना चाहता है, उसे किसी निश्चित विधा में ही अभिव्यक्त करे या कर पाए. यहाँ तो अभी तक बहस होती हैं कि कविता कविता जैसी नहीं है...
और बुक फेयर में इतनी किताबें पाठकों तक चली गयीं, उत्साहवर्धक है ये बात.

Arun Aditya said...

शुक्रिया दोस्तो! पहली प्रति की पहेली पर देश जी का कहना है कि लोकार्पण से पहले हर प्रति पहली ही प्रति है।
वाकई, ये 'देश' है दुनिया का गहना।