Tuesday, January 6, 2009

राम चंद्र ने उनका बिगाड़ा क्या था


(आधार प्राशन से शीघ्र प्राश्य उपन्यास उत्तर वनवास ा ए अंश आप पहले पढ़ चुे हैं। पेश है उसकेआगे ी ए ड़ी। पिछले अंश पर ाफी प्रेर और विचारोत्तेज टिप्पणियां मिली थीं। इस अंश पर भी आपी प्रति्रिया ा इंतजार है। )
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'' मेरे राम ने उनका बिगाड़ा क्या था?

माया राम ने इस सवाल को दोहराया-तिहराया, लेकिन वहां जवाब देने वाला कोई नहीं था। भीड़ तो कब की छंट चुकी थी।

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राम ने उनका बिगाड़ा क्या था... बताने क लिए रामचंद्र ने मुंह खोलने की कोशिश की, लेकिन मुंह नहीं खुल सका। पूरा मुंह सूजा हुआ था। आंखों के नीचे और गालों पर कत्थई धब्बे पड़ गए थे। राम चंद्र अगर बड़े होते तो समझ जाते कि छोटे कुंवर के खिलाफ मुंह खोलना वाकई बहुत कठिन काम है। पर वे तो बालक थे सो मुंह खोलने की कोशिश कर रहे थे। मुंह से सिवाय एक हल्की सी चीख के कुछ नहीं निकला, लेकिन आंखों से दो बूंद आंसू जरूर टपक कर गालों पर आ गए । रामचंद्र को अपने ही आंसुओं में पूरा घटनाक्रम किसी चल-चित्र की तरह नजर आने लगा—
रिजल्ट पिता को देकर वे गाय चराने जा रहे थे। रास्ता मकान नंबर एक के सामने से था। हवेली के सामने चबूतरे पर दिनेश सिंह का दरबार लगा हुआ था। छोटे कुंवर, यानी दिनेश सिंह के पुत्र राहुल सिंह, चबूतरे के चारों ओर गोल घेरे में साइकल चला रहे थे। तीन-चार बच्चे उनके पीछे-पीछे दौड़ रहे थे। छोटे कुंवर के पास गांव की एकमात्र बच्चा-साइकल थी। इस पर सवारी करना गांव के अधिकांश बच्चों के े लिए एक सपना था। सपना पकड़ से बाहर था, इसलिए वे दौड़ती साइकल के पीछे-पीछे दौड़कर ही छोटे कुंवर के आनंद केे हिस्सेदार बन जाते थे। यह अनोखी हिस्सेदारी थी, जिसमें छोटे कुंवर का मजा कम नहीं होता था और दूसरों को भी अपने हिस्से का मजा मिल जाता था। पर ये ऐसा मजा था जिसके साथ-साथ सजा भी थी। छोटे कुंवर जिस पर गुस्सा होते, लात मार कर भगा देते। पता नहीं यह उस साइकल का आकर्षण था या लगातार लात खाते-खाते उन बच्चों का स्वाभिमान इस तरह मर गया था कि लात खाने के े थोड़ी देर बाद वे फिर साइकल के े पीछे दौड़ते नजर आते। राम चंद्र भी एक बार इस साइकल केे पीछे दौड़े थे। शायद उसी दिन की बात है जिस दिन यह सपन-सवारी खरीद कर लाई गई थी। गांव की गतिहीन जिंदगी में अजूबे की तरह दाखिल हुई इस साइकल को घेर कर बच्चे बूढ़े और जवान लोगों का एक हुजूम खड़ा था। रामचंद्र भी इस भीड़ का हिस्सा थे। छोटे कुंवर साइकल पर बैठ गए। रामचंद्र और दो तीन लड़कों ने साइकल को थाम लिया ताकि गिरे नहीं। छोटे कुंवर धीरे-धीरे पैडल चला रहे थे। चबुतरे के चार-पांच चक्कर लगाने केे बाद अचानक न जाने कैसे संतुलन गड़बड़ा गया और साइकल समेत छोटे कुंवर जमीन पर आ गिरे। उठते ही उन्होंने रामचंद्र को दो तीन थप्पड़ जड़ दिए। रामचंद्र की आंखें भर आईं। डबडबाई आंखों से उन्होंने मौजूद बड़े-बुजुर्गों की ओर देखा। पर वहां किसी को उनकी आंखों में उमड़ आए बादलों को देखने की फुर्सत नहीं थी, सब छोटे कुंवर की धूल झाडऩे में व्यस्त थे। बड़े-बुजुर्गों की यह उपेक्षा थप्पड़ से ज्यादा बड़ी चोट थी। आंखों में उमड़ रहे बादलों को इस चोट के बाद रोक पाना मुश्किल हो गया था। पहले एक बूंद टपकी। फिर दूसरी। फिर तीसरी। और फिर लगातार जलधार।

बहते आंसुओं के बीच रामचंद्र ने खुद से पूछा— आखिर मेरा अपराध क्या है? तालों के े शहर भोपाल के े जनवादी कवि राजेश जोशी की कविता मारे जायेंगे तब तक नहीं लिखी गई थी, वर्ना वे बड़ी आसानी से समझ जाते कि इस समय सबसे बड़ा अपराध है निहत्थे और निरपराध होना / जो अपराधी नहीं होंगे / मारे जाएंगे। परंतु राम चंद्र के े पास उस समय न तो समाजशास्त्रीय समझ थी और न ही राजेश जोशी की यह कविता, लिहाजा वे यह समझ पाने में असमर्थ थे कि उनका अपराध क्या है?

उस दिन के बाद वे छोटे कुंवर की साइकल के पीछे कभी नहीं दौड़े। जब भी वे उन्हें साइकल चलाते देखते हैं, उन्हें अपना अपमान याद आ जाता है। आज फिर उन्हें अपना अपमान याद आ गया। इस दृश्य से अपने को ओझल करने की गरज से वे तेज-तेज कदमों से चलने लगे। अचानक उन्हें छोटे कुंवर की आवाज सुनाई दी-

''रमुआ जरा इधर आ।"

राम चंद्र पास आ गए। अब तक छोटे कुंवर ने साइकल नीम के पेड़ से टिका दी थी। आते ही रामचंद्र के गाल पर दो तमाचे जड़ दिए। राम चंद्र ी समझ में कुछ नहीं आया पर अगले ही क्षण उन्हें यह बता दिया गया कि उनका अपराध क्या है—

''ससुरऊ सारे गांव में घूम-घूम के बता रहे हो कि तुम फस्ट आए हो और मैं सेकंड। ई लो फस्ट आने का इनाम।" कहते हुए छोटे कुंवर ने दो थप्पड़ और जड़ दिए थे।

''पर मैं तो गांव में किसी के े यहां गया ही नहीं था। स्कूल से सीधा अपने घर गया था। पिता जी को रिजल्ट दिया और गाय-बछिया लेकर े इधर गया। इस बीच न कोई मुझसे मिला और न ही मैंने किसी को कुछ बताया।"

राम चंद्र ये सब कहना चाहते थे, लेकिन सुनता कौन? छोटे कुंवर को तो लात-जूते चलाने से ही फुर्सत नहीं थी। पीटते-पीटते थक गए तो पीठ पर एक लात मार कर बोले — भाग साले। पर भागने की ताकत किसमें थी? राम चंद्र की आंखों के े आगेr तो अंधेरा छाने लगा था।काले अंधेरे में लाल-नीले पीले छल्ले नाचते हुए नजर आ रहे थे। जमीन गोल-गोल घूमती लग रही थी। हिम्मत बटोरकर खड़े हुए। दो कदम चले और फिर गिर पड़े।
इसके बाद वे कैसे अपने घर तक पहुंचे थे, यह एक पहेली है।

राम चंद्र का कहना है- ''जब मैं गिर पड़ा तो एक बड़ा सा बंदर और उसने मुझे अपने कंधे पर उठा लिया। इस·े बाद मुझे कुछ होश नहीं रहा। होश आया तो मैं अपने घर के सामने पड़ा था।"

''निश्चित ही वे हनुमान जी थे, जो मेरे राम की मदद के लिए आए थे।" यह मां का विश्वास था। मां अत्यंत धार्मिक महिला थीं। एक डेढ़ घंटे रोज पूजा-पाठ करती थीं।रामचरित मानस का सुंदर कांड और गीता का आठवां अध्याय रोज पढ़ती थीं। हनुमान जी पर उनका विश्वास अटल था। पर गांव में दो-तीन लोग ऐसे भी थे जिनका दावा था कि उन्होंने राम चंद्र को गिरते-पड़ते, उठते-संभलते-घिसटते हुए झोपड़ी तक आते अपनी आंखों से देखा था।

बहरहाल यह आपबीती और आंखों-देखी की विश्वसनीयता का द्वंद्व था और लोग किसी एक पर एकमत नहीं थे। कुछ लोग आपबीती के े पक्ष में खड़े थे तो कुछ आंखिन-देखी के े समर्थन में। सबके पास अपने-अपने तर्क थे और तर्कों की पेंच-लड़ाई के े बीच सच की पहचान मुश्किल हो गई थी।
लेकिन माया राम इस सच को समझ गए थे कि रामचंद्र का कस्तूरी होना अब रंग दिखाने लगा है। इस घटना के बाद से वे इस कस्तूरी को अपने भय की गोदड़ी में छुपा कर रखने लगे थे। पर वे इसे छुपाने की जितनी कोशिश कर रहे थे, सुगंध उतनी ही तेजी से फैलती जा रही थी।

11 comments:

ravindra vyas said...

नए साल की बधाई और शुभकामनाएं। यह सचमुच एक खुशखबरी है कि २००८ में आपने उपन्यास पूरा किया और अब वह छपकर आ रहा है। दोस्तों की किताबें आना हमेशा रोमांचित करता है। इंतजार है।

मोहन वशिष्‍ठ said...

नये उपन्‍यास पूरा होने और जल्‍द छपने की बहुत बहुत बधाई ये नववर्ष ऐसी ही ढेर सारी खुशखबरी लाता रहे

rakeshindore.blogspot.com said...

Bhai Arun ji '
Iam waiting for your complete novel. Congratulation for its complistion.

vijay gaur/विजय गौड़ said...

उपन्यास का इंतजार है।

प्रकाश बादल said...

सचमुच कमज़ोर होना और ईमानदार होना आज के परिवेश में एक जैसी परिस्थिति है। आम आदमी को यही पता नहीं कि वो किस गुनाह के लिए पिस रहा है, चाहे मंदी की मार हो या आतंकवाद से मुम्बई का सीना छलनी हुआ हो, दरअसल मारे तो वही गए हैं जो रामचंद्र की तरह बेकसूर थे, नेता तो आज भी बयान देने में लगे हैं कि वो ख़ात्मा कर देंगे आतंकवाद का और आतंकवाद अभी भी पाकिस्तान की गोद में किलकारियां ले रहा है और रामचंद्र आज भी परेशान है।

अरुण भाई को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं। आपकी शब्द कविता भी सुनकर रहेंगे। कभी तो आपको पढ़ानी ही होगी।

Rohit Tripathi said...

achi post,,, navvarsh ki aapko shubhkamnae..

Rohit Tripathi

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प्रदीप कांत said...

बहते आंसुओं के बीच रामचंद्र ने खुद से पूछा— आखिर मेरा अपराध क्या है? तालों के शहर भोपाल के जनवादी कवि राजेश जोशी की कविता मारे जायेंगे तब तक नहीं लिखी गई थी, वर्ना वे बड़ी आसानी से समझ जाते कि इस समय सबसे बड़ा अपराध है निहत्थे और निरपराध होना / जो अपराधी नहीं होंगे / मारे जाएंगे। परंतु राम चंद्र के पास उस समय न तो समाजशास्त्रीय समझ थी और न ही राजेश जोशी की यह कविता, लिहाजा वे यह समझ पाने में असमर्थ थे कि उनका अपराध क्या?

अब आगे क्या कहें - प्रदीप व मधु कान्त

pallavi trivedi said...

upanyaas chhapne ki bahut bahut badhai...

pritima vats said...

आदरणीय अरुण जी,
अभिवादन,
उपन्यास अंश पढ़कर पूरा उपन्यास पढ़ने की बहुत इच्छा हो रही है। बहुत ही अच्छा थीम लिया है आपने।
समय निकाल कर मेरे ब्लाग पर भी तशरीफ लाएँ तो कृपा होगी।
धन्यवाद,

डॉ .अनुराग said...

दिलचस्प है......बंधा हुआ .कुछ संदेश भी है साथ साथ यही उम्मीद है...नये उपन्‍यास पूरा होने और जल्‍द छपने की बहुत बहुत बधाई

Arun Aditya said...

ravindra ji, mohan ji, rakesh ji, vijay ji, prakash badal, rohit tripathi, pradeep kant, pallavi ji, pritima ji aur dr. anurag ji aap sab ke prati hardik aabhaar.