Friday, December 24, 2010

पढ़िए उदय प्रकाश का मन



कवि-कथाकार उदय प्रकाश से यह बातचीत गत वर्ष जून में रेकार्ड की गई थी। उन्हें मिले सार्क सम्मान के बहाने हरियाणा साहित्य अकादमी की पत्रिका हरिगंधा के लिए यह बातचीत की गई थी। हरिगंधा का उपरोक्त अंक छप कर आने तक गोरखपुर का वह बहुचर्चित विवाद शुरू हो गया था, जो कई महीनों तक हिंदी साहित्य जगत में छाया रहा। उस दुखद प्रसंग के बाद हाल ही में साहित्य अकादमी पुरस्कार का सुखद संदर्भ भी जुड़ गया है। इन तमाम संदर्भों के साये में इस बातचीत से शायद कोई नया पाठ खुलकर सामने आए...

अच्छी रचना बहुत धीमी आवाज में बोलती है

उदय प्रकाश से अरुण आदित्य की बातचीत


पाठकों की कमी के इस संकटपूर्ण दौर में भी उदय प्रकाश एक ऐसे कहानीकार हैं, पाठक जिनकी रचनाओं का इंतजार करते हैं। पर कहानीकार से भी पहले वे एक बड़े कवि हैं। और कवि से भी पहले संवेदनशील मनुष्य हैं। उनकी संवेदना मनुष्यमात्र के प्रति ही नहीं घास, फूल, ओस और तितली के प्रति भी है। 'तिरिछ', 'पाल गोमरा का स्कूटर', 'और अंत में प्रार्थना', 'वारेन हेस्टिंग्स का सांड', 'पीली छतरी वाली लड़की', 'मोहनदास' जैसी चर्चित कथाकृतियों के अलावा उनके चार कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। 'सुनो कारीगर', 'अबूतर-कबूतर' और 'रात में हारमोनियम' के बाद उनका चौथा कविता संग्रह 'एक भाषा हुआ करती है', हाल ही में आया है। वे बहुपठित, बहुअनुवादित और बहुप्रशंसित लेखक हैं। और बहुविवादित भी। मोहनदास सहित उनकी कई कृतियों पर फिल्में भी बनी हैं। उन्होंने खुद भी कई महत्वपूर्ण डाक्यूमेंटरी फिल्में बनाई हैं। उदय प्रकाश को पाठकों ने जितना प्यार दिया है, हिंदी के साहित्यिक समाज से उन्हें उतनी ही शिकायत है। इसी प्यार और शिकायतों के बीच ही आप उस उदय प्रकाश को खोज सकते हैं, जो कलम का मजदूर तो है, मगर जिसकी कलम मजबूर नहीं है। जो सीतापुर से वैशाली तक अपने स्वाभिमान की गठरी में किसी को हाथ नहीं लगाने देता, बदले में कितना ही नुकसान क्यों न उठाना पड़े। पिछले साल जब उन्हें सार्क साहित्यकार सम्मान मिला तो इसी बहाने हरियाणा साहित्य अकादमी की पत्रिका हरिगंधा के (तत्कालीन ) संपादक देश निर्मोही ने उन पर एक विशेष खंड प्रकाशित करने की योजना बनाई। हमने उदय जी से पूछा, 'हरिगंधा के लिए एक बातचीत करनी है, किस समय आना ठीक रहेगा?' उदय जी अपनी चिरपरिचित हंसी हंस पड़े और हंसते हुए ही कहा, 'फ्रीलांसिंग करके घर चलाने में बहुत समय इधर-उधर भटकना पड़ता है, लेकिन इतना भी व्यस्त नहीं रहता हूं कि मित्रों को समय लेकर मिलना पड़े। जब मरजी हो चले आओ।' मैंने कहा, 'परसों सुबह आ जाता हूं।' और तीसरी सुबह हम वैशाली, गाजियाबाद स्थित उनके आवास पर मौजूद थे। उदय जी उसी उत्साह से मिले जैसे कि वे हर बार मिलते हैं। बात शुरू हुई तो बात से बात निकलती चली गई।

शुरुआत पुराने शहडोल और आज के अनूपपुर जिले के उस गांव से करते हैं, जहां उदय प्रकाश का जन्म हुआ। बचपन में कब आपको लगने लगा था कि कोई रचनाकार आपके भीतर कुलबुला रहा है? क्या आप सामान्य बच्चों से कुछ अलग थे?

कोई अद्वितीयता तो नहीं, लेकिन यह बात जरूर थी कि दूसरों से कुछ तो अलग था। जैसे, अकेलापन पहले भी अच्छा लगता था। और अपनी उम्र के बच्चों के बजाय बड़ी उम्र के बच्चों और बूढ़ों के साथ बातचीत में मैं ज्यादा सहज हो पाता था। जहां तक गांव की बात है, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा पर वह बहुत छोटा सा गांव है। नाम है सीतापुर। बहुत पिछड़ा इलाका है, जिसको सिंगल क्रॉप एरिया कहते हैं। एक फसली बलुहा जमीन है वहां। समृद्ध क्षेत्र नहीं है। 1972 में बिजली आई उस क्षेत्र में। उससे पहले हम लोगों की सारी पढ़ाई-लिखाई ढिबरी, लालटेन और कंदील की रोशनी में हुई। पुल नहीं बना था तो नदी में नाव और डोंगियां चलती थीं। जाहिर है कि बारिश में नदी भी पार करनी पड़ती थी। कई गांव थे जो बरसात में बिलकुल कट जाते थे। जंगल था। प्रकृति के बीच में रहना था। हमारे यहां बंदर थे, हिरन थे। तरह-तरह की चिडिय़ां, वन्य प्राणी सब बचपन के अनुभवों में शामिल थे। अब अगर मैं कहूं कि हमारे घर में शेर के बच्चे पले, या कहूं कि हाथी था हमारे घर पर, तो यह शहर के बच्चों को अटपटा लगेगा जो इन जानवरों को सिर्फ कॉमिक्स या किताबों में देख पाते हैं।
लिखने का सिलसिला ऐसे शुरू हुआ... जैसा कि मैं पहले भी बता चुका हूं, मेरी मां भोजपुर क्षेत्र की थीं। मिर्जापुर के पास विजयपुर नाम की जगह है। उस समय कम उम्र में शादी हो जाती थी। जब वे आईं तो अपने साथ एक कॉपी लाई थीं। उसमें मिर्जापुर और उस इलाके के गाने लिखे हुए थे। मां की हैंडराइटिंग बहुत सुंदर थी। वे छोटे-छोटे चित्र बनाती थीं। क्रोशिया, कढ़ाई-बुनाई का काम बड़ी कलात्मकता से करती थीं। वे गाती बहुत अच्छा थीं। वे अकसर गांव की स्त्रियों से घिरी रहती थीं। मां के आने के बाद गांव की स्त्रियों में बड़ा बदलाव आया। मैंने मां की उसी कॉपी को देखकर ही कविता लिखना शुरू की और चित्र बनाना भी उस कॉपी से ही सीखा। बहुत छोटी उम्र में मैं चित्र बनाने लगा था और कविता भी जब शुरू की तो छह सात साल का रहा होऊंगा। मेरी बहनों को मेरी तब की कविताएं याद हैं। पढऩे लिखने का संस्कार था घर में। पिताजी लगभग सारी पत्रिकाएं मंगाते थे। साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, कल्पना, बहुत सी पत्रिकाएं जो अब नहीं हैं.. अवंतिका, ज्योत्सना वगैरह। बच्चों की पत्रिकाएं भी आती थीं। पुरानी किताबें बहुत थीं। महाभारत वगैरह तो थी हीं, एक विचित्र किताब थी जिसके बारे में बताता हूं तो लोगों को ताज्जुब होता है। उसका नाम था 'करि कल्प लता'। वह हाथियों के बारे में थी। जैसे वात्स्यायन के काम-सूत्र में पद्मिनी, शंखिनी वगैरह के वर्गीकरण के आधार पर स्त्रियों के स्वभाव का वर्णन किया गया गया है, उसी तरह 'करि कल्प लता' में हाथियों के लक्षणों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां थीं। मुझे बहुत रोचक लगती थी वह किताब। मेरे गांव के पास से जब हाथियों के झुंड निकलते थे तो मैं उस किताब में दिए गए लक्षणों के आधार पर उनके स्वभाव का अंदाजा लगाता था। हाथी बड़ा मानवीय लगता था मुझे। हमारे घर का जो हाथी था, उसका नाम था भगवंता। सरगुजा और छत्तीसगढ़ का वह क्षेत्र जो आज नक्सलवाद और सल्वा जुडुम से प्रभावित है, वहां घने जंगल थे। आगे चलकर यह जंगली इलाका असम से जुड़ जाता था। यहां से वहां तक हाथियों का अभ्यारण्य था। सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी में जसपुर हाथियों का बहुत बड़ा ब्रीडिंग सेंटर था। जो लोग हाथियों को खरीदने जाते थे, उनके लिए ऐसा कोई शास्त्र या मैनुअल जरूरी था जिसके आधार पर वे अच्छे हाथी की पहचान कर सकें। अब वह किताब हमारे घर में नहीं है। मैं तो खैर बहुत बचपन में गांव से चला आया। जब मां की मृत्यु हुई मैं बारह साल का था और जब सोलह साल का था तो पिता की मृत्यु हो गई। दोनों की मृत्यु कैंसर से हुई। मां की मृत्यु के बाद ही मैंने घर छोड़ दिया था। तब से आप सब जानते है कितनी कठिनाइयों से मैंने जिंदगी जी है। बहुत संघर्ष करना पड़ा, लेकिन पेंटिंग और कविता का साथ लगातार बना रहा।

आपके सृजन में उस नदी की भी भूमिका रही है, जिसमें बाढ़ आने से तिब्बत जैसी कविता की भूमिका लिखी गई?

हां, यह तो उसी समय की बात है, जब मेरी मां थी। मेरे बचपन का अनुभव था वह। वह जो समय था पचास-साठ के दशक का, बड़ी दुविधा असमंजस और टकराहटों का समय था। मैं इतना छोटा था कि मुझे नहीं पता था कि तिब्बत का भारत से क्या संबंध है। अनूपपुर छोटा सा जंक्शन था, जहां एक ही लाइन थी। मेरी एक कविता भी है अनूपपुर जंक्शन। वहां से ट्रेन बदली जाती थी सरगुजा के लिए। जो तिब्बती शरणार्थी आते थे, उनका एक हिस्सा अनूपपुर में उतर जाता था। वहां से दूसरी ट्रेन लेता था। बरसात के दिनों में दूसरी ट्रेन कई-कई दिनों तक रद्द हो जाती थी, तो वे वहीं रुके रहते थे। और वे कई बार हमारे गांव की तरफ से गुजरते थे। बचपन से ही मुझे लामाओं से बहुत गहरा लगाव रहा। और बाद में बुद्ध भी बहुत आकर्षित करने लगे। बौद्ध धर्म में हम सबकी एक अलग तरह की आस्था है। यह लिबरेट करता है, जातिवाद से मुक्त करता है। और उसके पीछे जो अहिंसा है, वह बहुत सारे दूसरे दर्शनों, जो करुणापूर्ण हैं, से जोड़ती है। इसकी तुलना में हिंदू धर्म को लेकर शुरू से ही मेरे मन में संदेह रहा कि यह हिंदू धर्म है या ब्राह्मणवाद है। बाद में जब देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय और भगवत शरण उपाध्याय वगैरह को पढ़ा तो स्पष्ट होने लगा कि ब्राह्मण ग्रंथों, स्मृतियों, कर्मकांडों की जो परंपरा है वह उपनिषदों के विरोध में है। जबकि महावीर और बुद्ध दोनों का दर्शन उपनिषदों से निकला हुआ है। इसलिए आश्चर्य नहीं होता कि ज्योतिबा फुले से लेकर अंबेडकर तक ने बुद्ध में ही मुक्ति का मार्ग क्यों देखा। तिब्बत मेरी चेतना में अहिंसा और बौद्ध दर्शन का केंद्र था। अगर वेटिकन सिटी अक्षत रह सकता है। येरुसलम को लेकर दुनिया इतनी सेंसिटिव है तो तिब्बत को लेकर क्यों नहीं? जबकि कहा भी गया कि तिब्बत को भारत और चीन के बीच एक बफर स्टेट के रूप में बना रहना चाहिए था। जब मैंने तिब्बत कविता लिखी तो बहुत विरोध हुआ, क्योंकि मैं कम्युनिस्ट था।

आपको नहीं लगा कि गैर प्रगतिशील घोषित कर दिया जाएगा?

कर ही दिया गया था लगभग। लेकिन ये गनीमत थी कि प्रगतिशील और जनवादियों के बीच कुछ सचमुच बहुत प्रबुद्ध माक्र्सवादी भी हैं। जिनके विचार सिर्फ राजनीतिक दृष्टिकोण से ही तय नहीं होते। तिब्बत की स्वायत्तता को मानने वाले बहुत से मार्क्सवादी हैं। और तिब्बत ही नहीं फिलिस्तीन या कहीं के भी सांस्कृतिक समुदाय की सार्वभौमता का सम्मान करते हैं। और कोई उसका हनन करके उपनिवेश बनाता है, तो उसका विरोध करते हैं। मैंने जब तिब्बत कविता लिखी तो बड़ी बहस हुई कि यह तो एंटी कम्युनिस्ट कविता है और केदार जी ने इसे पुरस्कार दे दिया। जब 78 में वियतनाम पर चीन ने हमला किया तो हमने पूछा कि जो वियतनाम साम्राज्यवाद के विरुद्ध युद्ध का एक प्रतीक रहा है, उसके साथ ऐसा सुलूक। इसे क्या कहेंगे। उनके पास कोई उत्तर नहीं था। कई बार जिस राज्य को हम मान लेते हैं कि यह समाजवादी राज्य है, उसके भीतर भी बहुत से कंट्राडिक्शन्स हो सकते हैं। चीन का विस्तारवाद भी एक चिंता का विषय रहा है। रूस भी इससे चिंतित था। पाब्लो नेरूदा के संस्मरण पढि़ए। वहां भी यह चिंता दिखेगी। नेहरू भी इस बात को समझ पाए थे। आज भी हम जानते हैं कि चीन या वेनेजुएला या क्यूबा एक जैसे नहीं हैं। क्यूबा अपनी अस्मिता बचाने के लिए अमेरिका से लड़ रहा है जबकि चीन अपने विस्तार के लिए। और उसका विस्तारवाद कई क्षेत्रों में है, सिर्फ तिब्बत के इनवैजन में नहीं है। व्यापार में देख लीजिए, इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन में देख लीजिए, इंटरनेशनल डिप्लोमैटिक पावर में देख लीजिए, वह तमाम क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। मुझे तो अब भी चीन के प्रति संदेह है। रोजा लक्जमबर्ग ने जब नेरूदा को भेजा था लेनिन पीस प्राइज लेने के लिए, तो माओ का इंटरव्यू करने और चीन में रहने के बाद उन्होंने निष्कर्ष दिया कि माओ मार्क्सवादी नहीं हैं।

आपने डिबिया कहानी में लिखा है कि वे लोग चाहते हैं कि अगर मुझे अनुभव की सत्यता सिद्ध करनी है तो मैं उन लोगों के सामने डिबिया का ढक्कन हटा दूं। साहित्यकार के अनुभव की सत्यता की पड़ताल करने की इस प्रवृत्ति के पीछे कौन सा आग्रह या दुराग्रह काम करता है?

मैं पहले भी कहता रहा हूं कि साहित्यकार को बहुत प्रचीन अर्थों में लिया जाना चाहिए। कई बार मैंने कहा है कि राइटर और ऑथर में अंतर होता है। रचनाकार और लेखक में फर्क होता है। राइटर कोई भी हो सकता है: एक नेता हो सकता है, डॉक्टर हो सकता है, वकील हो सकता है। विज्ञापन लिखने वाला भी हो सकता है। प्रसून जोशी भी लेखक है जो ठंडा मतलब कोका कोला लिखता है और पूरी मानवता को जहर पिलाता है। और उसकी बड़ी चर्चा होती है अखबारों में। ऑथर जो होता है, वह भिन्न होता है। उसी को साहित्यकार कहा जाता है। रोलां बाथ ने बहुत अच्छी तरह राइटर और ऑथर का फर्क बताया है। टॉलस्टाय ऑथर थे, मुरली बाबू या मैनेजर पांडे लेखक हैं। ये जो अंतर है, यह वैज्ञानिक और पूर्व वैज्ञानिक युग का अंतर है। जब हमारे पास समाज परिवर्तन और प्रगति के नियमों को जानने के इतने साधन नहीं थे तब बहुत कुछ हमारी प्रज्ञा काम देती थी। हमारा जो पारंपरिक ज्ञान है, वो काम आता था। उस समय गलतियां करता था ऑथर, लेकिन उसका उद्देश्य होता था चराचर का कल्याण। मानव समाज का उत्थान। बाइबिल, गीता या दूसरे पुराने स्क्रिप्चर्स को देखें तो पाएंगे कि वे बेहतरीन पाठ हैं। उनमें एक समान भावना यही थी कि उसमें मनुष्य का कल्याण हो, कुछ नियम हों, कुछ संहिताएं हों, जिससे मनुष्य दूसरे का अहित न करे। जबकि राइटर बहुत तात्कालिक उद्देश्य के लिए लिखता है। जैसे कि आज जनसत्ता में अजेय कुमार का एक लेख छपा है, जिसका उद्देशय ये है कि सीपीएम को वोट दीजिए। ये जो सवाल आपने पूछा है अनुभव की सत्यता वाला, तो साहित्यकार को हमेशा लेखकों से टकराना पड़ता है। आप देखेंगे कि मेरे लेखन को लेकर जो भी विवाद पैदा हुआ है, वह पाठकों की तरफ से नहीं हुआ है। ये कुछ लेखक यानी राइटर हैं, जो कुटिल षड्यंत्र करते रहते हैं। ये कोई प्रतिद्वंद्विता भी नहीं है। ये बहुत मीडियॉकर किस्म के लोग हैं लेकिन इनके षड्यंत्रों ने मेरे जीवन को प्रभावित किया है। बहुत कठिनाइयां झेलनी पड़ी हैं। चीजों को डिस्टॉर्ट करने का सिलसिला तिब्बत कविता या टेपचू कहानी से लेकर आज तक चला आ रहा है। कहानियों में लोग व्यक्तियों को ढूंढऩे लगते हैं। यह फासिस्ट प्रवृत्ति है, जैसे कुछ लोगों ने रामायण में अयोध्या और राम की जन्मभूमि खोज डाली और दंगा मचा दिया, वही काम आप यहां कर रहे हैं। तो आप में और आरएसएस में क्या अंतर है। अगर आप मेरी कहानी में किसी प्रोफेसर को ढूंढ़ लेंगे, किसी पुलिस वाले को ढूंढ़ लेंगे, फिर उससे जाकर शिकायत करेंगे और वह मुझको प्रताडि़त करेगा, तो यह फासीवादी प्रवृत्ति नहीं तो क्या है। इन लोगों ने मुझे बहुत नुकसान पहुंचाया। मेरे पास गोल्ड मेडल थे, अच्छा एकैडमिक रेकार्ड था, लेकिन मीडियाकर किस्म के लोगों ने मेरे साथ क्या किया? जातिवाद और मीडियॉक्रिटी और ब्यूरोक्रेसी व राजनीति के इस नेक्सस ने अपने समय के हर रचनाकार को आहत किया है। बाबा नागार्जुन से लेकर राहुल सांकृत्यायन तक तमाम बड़ी प्रतिभाओं के साथ ऐसा किया गया।

अकसर कवि उदय प्रकाश के खिलाफ कहानीकार उदय प्रकाश को खड़ा कर दिया जाता है। आपके खिलाफ आप को ही खड़ा कर देने की इस रणनीति पर क्या कहेंगे?

यह बड़ा विचित्र है। आप पाएंगे कि दोनों सूचियों में मेरा नाम नहीं रहता। जब तक मैंने अपनी कहानियों को छुपाए रखा तब तक नव प्रगतिशील कविता की जो त्रयी बनती थी उसमें सबसे पहले मेरा नाम आता था- उदय प्रकाश, अरुण कमल, राजेश जोशी। फिर कैसे उस सूची से मैं गिरा..और नामों की एक लाइन लग गई।

राजेंद्र यादव ने आजादी के बाद दस महत्वपूर्ण कवियों और दस कहानीकारों की लिस्ट दी थी। उन्होंने कहा था कि दस कवियों में आठ ब्राह्मण हैं और दस कहानीकारों में आठ गैर ब्राह्मण हैं। इसका कारण यह बताया था कि कविता ब्राह्मणी विधा है जिसमें अमूर्तन के चलते छद्म मूल्यांकन की ज्यादा गुंजाइश रहती है। आपको क्या लगता है?

एक हद तक मैं इससे सहमत हूं। कविता में और किसी भी ऐसे इलीट आर्ट फार्म या अभिजन कला रूप में मैनिपुलेशन संभव है। उसका छद्म मूल्यांकन संभव है क्योंकि बृहत्तर समाज तक वह नहीं पहुंच रही है। दस लोगों के बीच ही अगर कोई कला बरती जाती है, तो उसमें किसी को भी महान बना सकते हैं। लेकिन कहानी या उपन्यास सार्वजनिक विधाएं हैं। इनकी पहुंच ज्यादा है। वहां पर आप मनमानी नहीं कर सकते।

मनमानी करेंगे तो पाठक पकड़ लेगा?

बिलकुल, पाठक समझ जाएगा। विजयमोहन सिंह ने मेरे खिलाफ कुछ टिप्पणियां कीं तो पाटकों के तमाम पत्र आए मेरे पास। मतलब यह कि कहानी-उपन्यास में आप पकड़ लिए जाते हैं। आप देखिए कि प्रेमचंद का साथ किसी आलोचक ने नहीं दिया। आचार्य शुक्ल से लेकर उस समय के सारे सशक्त आलोचक थे सबके द्वारा अस्वीकृत होने के बावजूद प्रेमचंद कथा सम्राट कहलाए।

ऐसा तो नहीं कि कविता में आलोचना ने एक ऐसा भ्रम पैदा कर दिया कि पाठक भी भ्रमित हो जाता है?

कविता के पाठक कितने हैं। लोठार लुत्से ने पूछा था कि कविता की भाषा कौन सी है। और वह भाषा कितने लोगों तक संप्रेषित हो रही है। हिंदी के ही संदर्भ में बात करें तो हमारी कविता की हिंदी, क्या वही हिंदी है जो आज का जीवित हिंदी भाषी समुदाय बोल रहा है। अमीर खुसरो जिस हिंदवी में लिख रहे थे वह ऐसी भाषा थी जो दिल्ली से लेकर आगरा और उसके आगे तक बोली जाती थी। आज हिंदी कविता की जो भाषा है, वह हिंदी विभागों की भाषा है। ये आम जनता की भाषा नहीं है। आप आज की कविताओं को पढ़कर देखिए, उनकी भाषा कोई नहीं समझता है।

आपकी जो लंबी कविता है एक भाषा हुआ करती है, उसमें भी आपने भाषा का सवाल उठाने की कोशिश की है...

बिल्कुल। दुनिया के हर देश में बड़े कवि चाहे वे नाजिम हिकमत हों या कोई और, ऐसी भाषा में लिख रहे थे जो लोगों को समझ में आए। भाषा को बचाना जरूरी है और भाषा को मुक्त करना जरूरी है। भाषा में भी वर्ग वर्ण और जाति के जो वर्चस्व हैं, उनसे भी मुक्ति चाहिए। ये लोग सांप्रदायिकता के विरुद्ध लेख लिखते हैं, लेकिन आप उस भाषा को देखिए, जिसमें ये लिखते हैं, वह पूरी तरह सांप्रदायिक भाषा है। सेकुलर पोएट्री, सेकुलर राइटिंग हिंदी में कम्युनल लैंग्वेज में हो रही है। वो ब्राह्मीसाइज्ड लैंग्वेज में हो रही है। एक खास जाति की भाषा में यहां सेकुलरिज्म आ रहा है। इसीलिए आज गुलजार ज्यादा लोकप्रिय हैं, नीरज ज्यादा लोकप्रिय हैं।
एक क्लोज सोसायटी है, कुछ अफसरों, कुछ राजनीतिक दलों के लेखक संगठनों की और कुछ प्रोफेसरों की, जिसके बीच में कविता फल फूल रही है। ये क्लेप्टोक्रेसी है। ये संस्थानों से इतने सरकारी पैसे हड़प रहे हैं कि इन्हें शर्म आनी चाहिए। हिंदीभाषी क्षेत्र से वामपंथ का जनाधार गायब हो चुका है और जनाधार गायब हो जाने के कारण इनकी कोई सोशल मॉनिटरिंग भी नहीं हो पा रही है। समाज इनकी निगहबानी नहीं कर रहा है, इसलिए खुला खेल खेल रहे हैं। कोई अर्जुन सिंह की चमचागिरी कर रहा है तो कोई किसी और के जूते ढो रहा है। हिंदी दुर्भाग्य से या सौभाग्य से ऐसी भाषा है, जिसे बोलने वाली दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या का दो तिहाई हिस्सा 2 डॉलर प्रतिदिन से भी कम पर गुजारा करता है। इतनी गरीब जनसंख्या के बीच अगर ये लोग एक्सेल कर रहे हैं तो इसे क्या कहेंगे। ऐसा नहीं है कि मैं एलीट साहित्य का विरोधी हूं। अभिजात्य साहित्य बहुत जरूरी होता है किसी भी भाषा के विकास के लिए। लेकिन ये तो आभिजात्य भी नहीं है। आपके पास अज्ञेय या निर्मल वर्मा जैसे साहित्यकार हैं जो आपकी पोलिटिकल विचारधारा से मेल नहीं खाते, लेकिन वो ऐसे साहित्य का निर्माण करते हैंजिसे आज भी आप ईमानदारी से पढ़ेंगे तो कहेंगे कि यह श्रेष्ठ साहित्य है। विनोद कुमार शुक्ल की रचनाओं में कौन सी राजनीति है। मेरा मानना है कि कोई भी अच्छी रचना मूलत: प्रगतिशील होती है और मूलत: मानवतावादी होती है और मूलत: सामाजिक विषमता के विरोध में होती है। जो निर्मल वर्मा की भाषा है या विनोद कुमार शुक्ल की भाषा है, वह आपको ज्यादा संवेदनशील बनाती है। जैसे मुक्तिबोध आपको अधिक प्रबुद्ध करते हैं, आपकी प्रज्ञा को उत्तेजित करते हैंतो निर्मल वर्मा आपको ज्यादा संवेदनशील बनाते हैं। और ऐसा नहीं कि सिर्फ भाषा के प्रति संवेदनशील बनाते हैं, आपको अपने इर्द-गिर्द के प्रति भी संवेदनशील बनाते हैं। अगर आप तितली के बारे में नहीं संवेदित हो रहे हैं या घास के बारे में नहीं संवेदित हो रहे हैं, सिर्फ अमेरिका या वियतनाम के बारे में संवेदित हो रहे हैं तो मुझे आप पर डाउट है। आप फिलिस्तीन, अमेरिका को लेकर संवेदनशील हैं, लेकिन अगर आप जूतों से घास रौंद रहे हैं, पर्यावरण की कोई चिंता नहीं है, सूर्योदय और सूर्यास्त से आप संवेदित नहीं हो रहे हैंतो यह कौन सी संवेदनशीलता है।

इस तरह की संवेदनशीलता के संदर्भ में आप वान गॉग की पेंटिंग मेज़ अंडर स्टॉम्ड स्काई का हवाला देते हैं जिसमें आसमान में गहराते तूफान की आशंका में मकई के पौधे डर कर सिहर गये हैं...

हां, बिलकुल। यह सच है कि किसी भी कलाकार या मनुष्य के लिए अपने इर्द-गिर्द के प्रति संवेदनशील होना बहुत जरूरी है। अभी पिछले दिनों सार्क साहित्य सम्मेलन में यहीं के एक अंगरेजी कवि ने बहुत अच्छी कविता पढ़ी। जिसका भाव यह था-
वो लोग जो दावा करते हैं कि हम शेर को बचा लेंगे
वो झूठ बोलते हैं
क्योंकि वो घास के बारे में चुप हैं
शेर को बचाएगी घास
क्योंकि घास बचाएगी हिरन को
और हिरन बचाएगा शेर को
आपको घास के बारे में सोचना पड़ेगा। ऐसा नहीं होगा कि ऊंची-ऊंची लफ्फाजी करके अपनी प्रगतिशीलता प्रमाणित कर लेंगे और बहुत छोटे-छोटे निरीह निर्बल और लगभग बध्य प्राणियों और वनस्पतियों के बारे में क्रूर बने रहेंगे। आप आज लिखी जा रही हिंदी की कहानियां पढि़ए, उनमें घटनाएं तो होंगी लेकिन मनुष्य की संवेदना के रोजमर्रा के जो प्रमाण हैं, आस पास के परिवेश से उसका संबंध, वो एक सिरे से नदारद मिलेंगे।

क्या यही वजह है कि पाठक के मन से उनका जुड़ाव नहीं हो पाता? तिरिछ कहानी को पढ़कर जिस तरह पूनम वर्मा की चिट्ठियां आती हैं, क्या कविताएं भी वैसी संवेदनशीलता जगा पाती हैं?

कविताओं का क्या कहूं.. आप पुरानी कविताएं देखिए, सरोज स्मृति पढि़ए... राम की शक्ति पूजा पढि़ए। मुक्तिबोध की कई कविताएं हैं। शमशेर की टूटी हुई बिखरी हुई, अमन का राग पढि़ए। इन्हें पढ़ते हुए आप भूल जाते हैं कि किसकी रचना है, वह आपको अपनी लगने लगती है। ऐसा क्यों हुआ है कि पिछले कुछ समय से बहुत स्मार्ट पोलिटिकल कमेंट्स तो आए हैं कविताओं में, अपने समय के कनफिल्कट्स जो सतह पर हैं, जिनको सिर्फ पोलिटिकली भी समझा जा सकता है, वही-वही कविताओं में दिखते हैं। उसकी जो गहराई थी, वह गायब है। जैसे शमशेर की पंक्ति है- कबूतरों ने गजल गुनगुनाई, मैं नहीं जानता कि रदीफ काफिया क्या है? एक और पंक्ति है- आइनों मुस्कराओ और मुझे मार डालो। ये पंक्तियां लगभग अमूर्तन की ओर बढ़ती हुई भी पूरे प्रभाव के साथ बहुत ठोस भौतिकता की हद तक संवेदना को व्यक्त करती हैं। ऐसी सारी स्थितियां ही गायब होती जा रही हैं हिंदी कविता में। जो कविताएं बहुत प्रमुखता से आई हैं, वे बहुत स्मार्ट हैं। उनकी भाषा ब्राह्मणीकृत है। उसमें बहुत सारे शब्दों का दखल नहीं है, आवाजाही नहीं है। वो हिंदी समाज की जीवित भाषा को वर्जित करती हैं। और जब तक वो अपने को इस भाषा से मुक्त नहीं करेंगी, वे समाज में स्वीकृत नहीं हो पाएंगी। आप पोलिस कवि ताद्दिस रोजोविच को पढि़ए, उसकी कविता बहुत सरल कविता है। पोलिस भाषा का हर पाठक उस कविता को पढ़-समझ सकता है। ये सभी बड़े कवियों पर लागू होता है। लेकिन हिंदी में जिस तरह की कविताएं आ रही हैं, उनकी भाषा को लेकर मुझे आपत्ति है। मेरे विचार से ऐसी भाषा नहीं लिखी जानी चाहिए।

जादुई यथार्थवाद से आपका साबका कब पड़ा। लोग कहते हैं कि एक प्रविधि के रूप में सायास अपनाया । पर वास्तविकता क्या है, क्या आपने पहले लिख लिया और बाद में लोगों ने उसमें जादुई यथार्थवाद को ढूंढ़ा?

लोग क्या कहते हैं, यह सुन-सुन कर मेरे कान पक चुके हैं। जादुई यथार्थवाद जैसी चाज से न मेरा पहले कोई संबंध था, न आज है। मेरी रचनाओं में कुछ लोगों ने इसे ढूंढ़ा। लेकिन आप से मैं पहले भी कह चुका हूं, टेपचू मैंने लिखी 1976 में आपातकाल के दौर में। तब तो जादुई यथार्थवाद कोई नहीं जानता था, मेरे ख्याल से नामवर सिंह भी नहीं जानते थे। तब कहीं इसका कोई हल्ला ही नहीं था। टेपचू के बाद एक और कहानी लिखी गई। मेरी कहानियों में कहीं न कहीं कुछ ऐसा था जिसे पश्चिमी भाषा में मैजिकल कहा जा सकता है। और अगर भारतीय संदर्भ में देखें तो हमारी जो पूरी परंपरा रही है आख्यान की, जिसमें जातक, पंचतंत्र, दादी नानी की कहानियां, लोक कथाएं आती हैं, उसमें पहले से यह बात है। मैं तो जानता भी नहीं था कि कुछ अनोखा काम कर रहा हूं। लेकिन मेरी कहानियों में जादुई यथार्थवाद ढूंढऩे का यह काम किया कुछ आलोचकों ने। जहां तक मुझे याद है, जिस आलोचक ने मुझ पर सबसे पहले जादुई यथार्थवाद चिपकाया वह थे चंचल चौहान। मेरे खयाल से यह बयासी-चौरासी की बात है। तिरिछ जब आई, उसके आस-पास की बात है। जब लोग मुझसे पूछते थे, तो कई बार मैं गुस्से में कहता था कि हां, मैं जादुई यथार्थवादी हूं। कुछ इतनी वितृष्णा से मुझे जादुई यथार्थवादी बताया जाता था जैसे मैं यथार्थवाद का विरोध करने वाला, प्रेमचंद की परंपरा का विरोध करने वाला, वामपंथ का विरोध करने वाला कलावादी किस्म का व्यक्ति हूं। मैंने उनको समझाने की कोशिश की कि अगर ऐसा है भी तो जादुई यथार्थवाद तो आया ही है यूरोप और अमेरिका के वर्चस्व के विरोध में। लैटिनी-अमरीकी देशों की जनता ने अपने साहित्य को, अपने यथार्थ को यूरोप के रीयलिज्म से अलग करने के लिए एक नाम दिया, जादुई यथार्थवाद। उन्होंने कहा कि चूंकि हमारा समाज आज भी आधुनिक नहीं हुआ है, यहां आज भी भूत प्रेत हैं, अंधविश्वास है, मिथक की मौजूदगी है, इसलिए हमारे किसी भी आख्यान में ये तत्व शामिल हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि ये अजब आख्यान हैं। इनमें एक कौतुक है। इसको अलग से चिन्हित करने के लिए उन्होंने जादुई यथार्थवाद का नाम दिया। इसके पीछे बहुत बड़ी चेतना थी कि साम्राज्यवादी, यूरोपीय, पश्चिमी साहित्य के प्रभाव से अपने को मुक्त करें। और देखिए कि उसके बाद बड़े उपन्यासकारों कथाकारों की एक पूरी पीढ़ी उभर कर आई। जिसमें बोर्खेज हैं, मारक्वेज हैं, अस्तूरियास हैं। ऐसे साहित्यकारों की लंबी लाइन है। हमारे यहां भी इस तरह के कौतुक हैं, अजब आख्यान हैं, लेकिन हमारे यहां उसे अलग से चिन्हित करने का काम नहीं किया गया। हमारे यहां तो नकल ही करते रहे। हमारे प्रेमचंद मौलिक हैं, लेकिन कहा गया कि वे हिंदी के गोर्की हैं। क्या जरूरत है उन्हें गोर्की कहने की। प्रेम चंद क्या प्रेमचंद के रूप में ही महान नहीं हैं।

प्रेमचंद की मंत्र कहानी को देखिए, वहां भी तो जादुई चमत्कार है कि मंत्र की शक्ति से सांप का जहर उतर जाता है...

कितनी-कितनी कहानियांहैं। मंगलसूत्र को देखिए, और भी तमाम कहानियां हैं। इस तरह देखेंतो कोई सैद्धांतिकी किसी रचना को जन्म नहीं देती है। रचना ही नहीं, कोई यह सोचे कि सिद्धांत पढ़कर मैं अच्छा मनुष्य बन जाऊंगा तो वह भी संभव नहीं है। सिद्धांत सबसे पहले मनुष्य को डिह्यूमनाइज करते हैं। इनडॉक्ट्रिनेशन इसीलिए जेहादियों की चीज है। उनके मन में इस तरह सिद्धांत बिठा दिया गया है कि वे भीड़ में जाकर बम लगा देते हैं। मैं तो गांधी जी की तरह किसी भी सैद्धांतिकी के द्वारा मनुष्य की समूची आत्मा के अपहरण के विरुद्ध हूं। असैया बर्लिन ने कहा कि जब मैं 1917 की क्रांति की याद करता हूं,तो मुझे कुछ याद नहीं आता, सिर्फ इतना याद आता है कि पचपन साठ साल का एक ह्वाइट गार्ड था जो जार का कर्मचारी रहा होगा, उसको पीटते हुए रेड गाड्र्स लिए जा रहे थे। उसकी नाक से खून बह रहा था। उसकी एक आंख बाहर निकल आई थी। जो पिट रहा था, वह भी गरीब था और जो पीट रहे थे, वे भी गरीब थे। वे कहते हैं, तब से मुझे लगा कि क्रांति कुछ नहीं है, इनडॉक्ट्रिनेटेड फौजों की लड़ाई है। लेनिन की अंतिम दिनों की डायरी पढि़ए, जिस पर हम लोगों ने नाटक तैयार किया था 'लाल घास पर नीले घोड़े', लेनिन ने साफ लिखा था- ये जो क्रांति हुई और हमारी पार्टी बनी, यह दो विश्वयुद्धों के बीच बनी, इस कारण इसमें मिलिटरिज्म आ गया। इससे लगता है कि सेना, सैन्यवाद हमारे दर्शन का ही हिस्सा है, जबकि हम बंकर सोशलिज्म नहीं चाहते। हम खंदकों और खाइयों वाला समाजवाद नहीं चाहते। उस समय वे विचारों से गांधी के बहुत करीब हो गए थे। अभी भी हमारे यहां लोग मानते हैं कि मार्क्सवाद का मतलब रेड आर्मी, हथियार और जेहाद और नारेबाजी है। मेरा मानना है कि सबसे अच्छी रचना वही होती है, जो सबसे धीमी आवाज में अपने समय की किसी भी यातना या पीड़ा को व्यक्त करती है।

गांधी और बुद्ध आपको बहुत करीब लगते हैं। आपकी चर्चित कहानी है 'मोहनदास'। यह एक आदमी की पहचान या अस्मिता छीन लिए जाने की कहानी है। इसके मुख्य पात्र का नाम मोहनदास क्या गांधी जी के प्रभाव के कारण है?

देखिए प्रभाव तो मार्क्स का भी है। लेकिन मैं इनडॉक्ट्रिनेशन के खिलाफ हूं। मोहनदास नाम मैंने जानबूझकर रखा था। मोहनदास ही क्यों, उसके घर के हर सदस्य के नाम देखिए काबा, पुतली देवदास सब गांधी परिवार के नाम हैं। यह एक डिवाइस है यथार्थ को व्यक्त करने की। इसके पीछे लॉजिक यह था कि गांधी अंतिम आदमी की बात करते थे। गांधीजी की लड़ाई औपनिवेशिक दासता से राजनीतिक मुक्ति की ही लड़ाई नहीं थी। उनके आर्थिक दृष्टिकोण भी थे। औद्योगीकरण के जवाब में कुटीर उद्योगों की तरफ उनका ध्यान था। दूसरी तरफ वे मनुष्य को गांव के साथ-साथ स्वावलंबी बनाना चाहते थे। वे हर स्तर पर स्वाधीनता चाहते थे। छोटी से छोटी इकाई यानी परिवार, फिर गांव, फिर देश, सब की स्वाधीनता चाहते थे। उनका मशहूर कथन है कि जो कदम आप उठाते हो क्या वह अंतिम आदमी के आंसू को पोछता है। मोहनदास की जो कहानी है वह सत्य घटना पर आधारित है। और कहानी के बाहर जो असली मोहनदास है, उसे अभी तक न्याय नहीं मिल पाया है। तो गांधी के बहाने मैं यह कहना चाहता था कि जो लोकतंत्र है, वह असफल हो चुका है। लोग कहते हैं कि समाजवाद असफल हो चुका है, मैं कहता हूं कि समाजवाद और पूंजीवादी लोकतंत्र दोनों औद्योगीकरण के ही गर्भ से पैदा हुए थे, और दोनों ही असफल हो चुके हैं। डेमोक्रेसी क्लेप्टोक्रेसी में बदल चुकी है और कोई भी नागरिक जो सत्ता से नहीं जुड़ा है, और अपराधी नहीं है, वह मोहनदास है। मैं खुद को मोहनदास मानता हूं। और मोहनदास की लोकप्रियता का कारण भी यही है कि आम आदमी जो सत्ताहीन है, वह खुद को मोहनदास से आइडेंटिफाई कर पाता है। आज एक बड़ा अधिकारी, मंत्री हमारी पहचान, हमारी विचारधारा तक छीन ले जाता है। अगर वह कह दे कि उदय प्रकाश सांप्रदायिक हैं तो हमारा बौद्धिक समाज भी वही दुहराने लगेगा। सत्ता के सामने हमारे बौद्धिक समुदाय ने पूरी तरह सरेंडर कर दिया है।

14 comments:

विनीता यशस्वी said...

bahut achha interview...

सुशीला पुरी said...

एक बड़े रचनाकर का बड़ा इंटरव्यू !!! आभार आपका !

मनोज पटेल said...

अपने प्रिय लेखक का यह इंटरव्यू पढवाने के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद !

Anonymous said...

साक्षात्कार शानदार है और उदय जी को समझने में सहायक है. आपकी अनुमति हो तो हम इसे 'आखर ' में देना चाहेंगे.
आपके उतर की प्रतीक्षा है.
आपका
चंद्रपाल सिंह
मुंबई
9867777284

अजेय said...

beshkeematee! फिर फिर पढ़ूँगा .

सुनील गज्जाणी said...

एक बड़े रचनाकर का बड़ा इंटरव्यू !!! आभार आपका !

प्रदीप कांत said...

यह उदय प्रकाश जी के साथ एक गम्भीर बातचीत है। बधाई

satyapal said...

yah blog lagaatar lokpriya hota ja raha hai, is ka pata google khoj se lagata hai...a aa likhte hi blog hajir...

aasha uday prakaash se kuchh naye swaal bhi poochhe jaayenge jaldi...

जयकृष्ण राय तुषार said...

bhai arun aadityaji uday prakashji se batchet behad saarthak lagi badhai

जयकृष्ण राय तुषार said...

bhai arun aadityaji uday prakashji se batchet behad saarthak lagi badhai

iqbal abhimanyu said...

अच्छा लगा, विशेषकर जादुई यथार्थवाद वाला हिस्सा..

Arun Aditya said...

shukriya dost.

gayatree arya said...

bahut hi achcha laga, gyaan vardhak aur uday prakash ko janne me sahayak

gayatree arya said...

bahut achcha laga, gyaanvardhak aur uday prakasha ko janne me sahayak